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Headlines :
 

"भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन"
विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार संपन्न


'परिपूर्ण रेलवे समाचार' द्वारा "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के मंच पर उपस्थित दाएं से द. रे. के सीटीएम श्री अजीत सक्सेना, म. रे. के सीपीओ/ए श्री रविन्द्र कुमार, एनआरएमयू के महासचिव का. पी. आर. मेनन, आईआरपीओएफ के महासचिव श्री जीतेन्द्र सिंह, एआईआरपीएफए के महासचिव श्री यू. एस. झा, एआईआरएफ के महाचासचिव का. शिवगोपाल मिश्रा, म. रे. के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन, प. रे. के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार, डीएफसीसी के निदेशक श्री पी. एन. शुक्ल, आईआरपीओएफ के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह, डब्ल्यूआरएमएस के महासचिव श्री जे. जी. माहुरकर और एआईआरपीएफए के अध्यक्ष श्री एस. आर. रेड्डी.

भारतीय रेल का राजनीतिक दोहन बंद किया जाए -शिवगोपाल मिश्रा


'परिपूर्ण रेलवे समाचार' के सेमिनार विशेषांक का विमोचन करते हुए बाएँ से आईआरपीओएफ के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह, डीएफसीसी के निदेशक श्री पी. एन. शुक्ल, प. रे. के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार, म. रे. के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन, एआईआरएफ के महाचासचिव का. श्री शिवगोपाल मिश्रा और एआईआरपीएफए के महासचिव श्री यू. एस. झा. इस अवसर पर श्री रविन्द्र कुमार, श्री पी. आर. मेनन, श्री अजीत सक्सेना, श्री एस. आर. रेड्डी, श्री जे. जी. माहुरकर और श्री जीतेन्द्र सिंह भी उपस्थित थे.

मुंबई : राष्ट्रीय पाक्षिक 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' द्वारा "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" जैसे अत्यंत समसामयिक विषय पर बुधवार, 9 मई को वाई. बी. चव्हाण प्रतिष्ठान सभागृह, मंत्रालय के पास, जनरल जे. एन. भोसले मार्ग, नरीमन पॉइंट, मुंबई में राष्ट्रीय सेमिनार का सफल आयोजन किया गया. इस महत्वपूर्ण सेमिनार में भारतीय रेल के उच्च अधिकारी और सभी पांचो मान्यताप्राप्त फेडरेशनों के पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में रेल कर्मचारी और यात्री संगठनों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया. सेमिनार में मुंबई से म. रे. के मुख्य कार्मिक अधिकारी/प्रशासन श्री रविन्द्र कुमार, 'नवभारत टाइम्स' के संपादक श्री सुंदर चंद ठाकुर, पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार, मध्य रेलवे के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन, दिल्ली से डेडिकेटेड फ्रेट कारीडोर कारपोरेशन इंडिया लिमिटेड (डीएफसीसी) के निदेशक श्री पी. एन. शुक्ल, आल इंडिया रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स एसोसिएशन (एआईआरपीएफए) के महासचिव श्री यू. एस. झा, अध्यक्ष श्री एस. आर. रेड्डी, लखनऊ से आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआईआरएफ) के महासचिव का. शिवगोपाल मिश्रा, आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआईआरएफ) के सहायक महासचिव और नेशनल रेलवे मजदूर यूनियन (एनआरएमयू) के महासचिव का. श्री पी. आर. मेनन, नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन रेलवेमेंस (एनएफआईआर) के सहायक महासचिव और पश्चिम रेलवे मजदूर संघ के महासचिव श्री जे. जी. माहुरकर, पटना से इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह, और महासचिव श्री जीतेन्द्र सिंह, चेन्नई से दक्षिण रेलवे के मुख्य यातायात प्रबंधक श्री अजीत सक्सेना आदि प्रबुद्ध वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए.


'परिपूर्ण रेलवे समाचार' द्वारा "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार के मंच पर उपस्थित दाएं से एआईआरपीएफए के महासचिव श्री यू. एस. झा, एआईआरएफ के महाचासचिव का. श्री शिवगोपाल मिश्रा, म. रे. के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन, प. रे. के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार, डीएफसीसी के निदेशक श्री पी. एन. शुक्ल.

रेल प्रबंधन के उपरोक्त सभी विशेषज्ञ और औद्योगिक शांति एवं उत्पादन में भागीदार सभी कर्मचारियों एवं अधिकारी संगठनों के पदाधिकारियों ने इस सेमिनार में शामिल होने की अपनी पूर्व सहमति प्रदान की थी. सभी वक्ताओं ने कहा कि इस अत्यंत समसामयिक परिचर्चा में बहुत महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए हैं, जिन पर विचार और अमल करने से भारतीय रेल के उत्थान में रेल प्रशासन को अवश्य मदद मिलेगी. सभी कर्मचारियों एवं अधिकारी संगठनों के पदाधिकारियों ने कहा कि जो पहल हम लोगों को करनी चाहिए थी, वह 'परिपूर्ण रलवे समाचार' ने की है. इसे अब और आगे बढ़ाया जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि भारतीय रेल विषय पर पिछले 15 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रहे एकमात्र पाक्षिक 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' ने भारतीय रेल के पुनरुत्थान जैसे विभिन्न समसामयिक विषयों पर सेमिनारों का आयोजन करके रेल प्रशासन और रेल व्यवस्था के हित में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है. मंच पर उपस्थित सभी अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों के पदाधिकारियों ने गलत नीतियों और भारतीय रेल के राजनीतिक दोहन के खिलाफ एकजुट होकर अपनी एकता को मजबूत करने पर जोर दिया. श्री रविन्द्र कुमार ने मानव संसाधन विषय पर अपने महत्वपूर्ण विचार रखे, जबकि श्री सुंदरचंद ठाकुर ने सर्वसामान्य यात्रियों की सुविधाएं बढाए जाने और फालतू खर्चों में कटौती की बात कही. श्री पी. एन. शुक्ल ने डीएफसीसी की प्रगति के माध्यम से भारतीय रेल में काम करने और श्री अजीत सक्सेना ने आध्यात्मिक तरीके से व्यक्तिगत चरित्र के निर्माण की बात कही.

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भारतीय रेल का पुनरुत्थान...

ऐसा क्या हो गया है कि आज सब तरफ भारतीय रेल के पुनरुत्थान की बात की जा रही है? पुनरुत्थान की बात क्यों हो रही है, क्या संसाधन कम हो गए हैं? इस चिंता का कारण आखिर क्या है? क्या इस महान संस्था के प्रति हमारी संवेदना कम हो रही है? क्या हमारा स्वार्थ हम पर हावी हो रहा है? संस्था के लिए हमारी जवाबदेही और वफादारी क्यों कम हो रही है? आखिर क्या कारण है की आज एक अख़बार (परिपूर्ण रेलवे समाचार) को इसके पुनरुत्थान के लिए आगे आकर सार्वजनिक परिचर्चा का आयोजन करना पड़ रहा है? इसका कारण शायद यह है कि इस महान संस्था के अधिकतर लोग परजीवी हो गए हैं. यह परजीवी लोग दूसरों पर निर्भर हो गए हैं. यह बात इस संस्था से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति पर लागू होती है, वह चाहे मंत्री हो, चाहे अधिकारी हो या कर्मचारी हो, इसके लिए इनमें से कोई एक व्यक्ति दोषी नहीं है. सब एक-दूसरे की आड़ ले रहे हैं, किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि करना क्या है? किसी को सही गलत का भान नहीं रह गया है. कोई यह सोचकर कि वह सिर्फ टहनी काट रहा है, इससे पेड़ को कोई फर्क नहीं पड़ेगा. कोई पत्ते नोंच रहा है, तो कोई छाल छील रहा है, और कोई अगर मजबूत स्थिति में है तो वह तना काटने पर तुला है, और जो जड़ों में मट्ठा डालने की हालत में है, तो वह वैसा भी कर रहा है. अपने इस तरह के कृत्य से सब यह मानकर चल रहे हैं कि इससे पेड़ (संस्था) को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है. मगर इनमें से कोई यह नहीं सोच रहा है कि जब संस्था (भारतीय रेल) ही नहीं बचेगी, तब उनका क्या अस्तित्व रह जाएगा?

जो कुछ तथाकथित अच्छे लोग हैं, वह कोई वाजिब निर्णय नहीं लेना चाहते हैं, वह डरे हुए हैं. वह या तो अधर्म का साथ दे रहे हैं अथवा उसकी खुशामद में लगे हैं, या फिर कुछ पाने की इच्छा या खोने के डर से निहितस्वार्थवश चुप्पी साधे हुए हैं और निरीह जिंदगी जी रहे हैं. मगर जो ख़राब लोग हैं उन्हें कोई डर नहीं है, वह निःशंक भाव से अधर्म में लगे हैं. दूर-दूर तक ऐसा कोई व्यक्तित्व नजर नहीं आ रहा है, जिससे कोई उम्मीद की जा सके. पिछले 15 वर्षों में जब से यह 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' प्रकाशित हो रहा है, तब से लेकर अब तक भारतीय रेल में एक भी व्यक्तित्व ऐसा नजर नहीं आया है, जिसे प्रेरणा स्रोत माना जा सके. हम यहाँ रेलवे के मान्यताप्राप्त फेडरेशनों के पदाधिकारियों की बात नहीं कर रहे हैं, क्योंकि वह कोई प्रशासकीय निर्णय लेने की जगह पर नहीं हैं. हम यहाँ उच्च प्रशासनिक पदों पर विराजमान अधिकारियों की बात कर रहे हैं, जो वास्तव में तमाम प्रशासनिक निर्णय लेने की स्थिति में हैं. परन्तु फिर भी वे दिशाहीन हैं और उनमें दूरदर्शिता एवं पारदर्शिता का भारी आभाव है. वे राजनीतिक नेतृत्व की हाँ में हाँ मिला रहे हैं और संस्था को डुबा रहे हैं. यहाँ तक कि जब मान्यताप्राप्त फेडरेशनों ने बढ़ा हुआ रेल किराया वापस लिए जाने की स्थिति में उसकी भरपाई केंद्रीय बजट से किए जाने की मांग की, तब भी यह लोग उनके साथ एकजुट नहीं हुए. इसको क्या समझा जाए, क्या इसका मतलब यह नहीं लगाया जाना चाहिए कि ये लोग सिर्फ अपनी नौकरी बचाने और अपना स्वार्थ सिद्ध करने में लगे हुए है?

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"आप सभी सादर आमंत्रित हैं"

 


"भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन"
विषय पर 'रेलवे समाचार' द्वारा आयोजित सेमिनार में
रेलवे के सभी मान्यताप्राप्त फेडरेशन शामिल

मुंबई : करीब ढाई साल के एक लम्बे अंतराल के बाद 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' द्वारा "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" जैसे अत्यंत समसामयिक विषय पर बुधवार, 9 मई को वाई. बी. चव्हाण प्रतिष्ठान सभागृह, मंत्रालय के पास, जनरल जे. एन. भोसले मार्ग, नरीमन पॉइंट, मुंबई में राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है. इस महत्वपूर्ण सेमिनार में भारतीय रेल के उच्च अधिकारी और सभी पांचो मान्यताप्राप्त फेडरेशनों के उच्च पदाधिकारियों सहित बड़ी संख्या में रेल कर्मचारी और यात्री संगठनों के प्रतिनिधि भाग लेंगे. सेमिनार में मुंबई से 'नवभारत टाइम्स' के संपादक श्री सुंदर चंद ठाकुर, पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार, मध्य रेलवे के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन, दिल्ली से डेडिकेटेड फ्रेट कारीडोर कारपोरेशन इंडिया लिमिटेड के निदेशक श्री पी. एन. शुक्ल, उत्तर रेलवे के मुख्य अभियंता/मुख्यालय श्री ए. के. वर्मा, रेलवे बोर्ड के कार्यकारी निदेशक और फेडरेशन ऑफ़ रेलवे ऑफिसर्स एसोसिएशंस (एफआरओए) के महासचिव श्री शुभ्रांशु, आल इंडिया रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स एसोसिएशन (एआईआरपीएफए) के महासचिव श्री यू. एस. झा, लखनऊ से आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआईआरएफ) के महासचिव का. श्री शिवगोपाल मिश्रा, सिकंदराबाद से नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन रेलवेमेन (एनएफआईआर) के महासचिव श्री एम. राघवैया, पटना से इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह और चेन्नई से दक्षिण रेलवे के मुख्य यातायात प्रबंधक श्री अजीत सक्सेना शामिल हैं.

रेल प्रबंधन के विशेषज्ञ और औद्योगिक शांति एवं उत्पादन में भागीदार इन सभी अधिकारियों और संगठनों के पदाधिकारियों ने सेमिनार में शामिल होने की अपनी सहमति प्रदान की है. इनके अलावा भी कुछ और लोग अपने विचार इस अवसर पर रखेंगे. उम्मीद है कि इस अत्यंत समसामयिक परिचर्चा में कुछ बहुत महत्वपूर्ण सुझाव - प्रस्ताव सामने आएँगे, जिन पर विचार और अमल करने से भारतीय रेल के उत्थान में रेल प्रशासन को अवश्य मदद मिलेगी. भारतीय रेल विषय पर पिछले 15 वर्षों से लगातार प्रकाशित हो रहे एकमात्र पाक्षिक 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' का भारतीय रेल के पुनरुत्थान में यह एक महत्वपूर्ण योगदान होगा. उल्लेखनीय है कि वर्ष 1997 में अपने प्रकाशन के बाद से सन 2000 में 'भारतीय रेल व्यवस्था में मीडिया की भूमिका' विषय पर कल्याण में पहला सेमिनार आयोजित करके 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' ने रेल व्यवस्था में अपने योगदान की शुरुआत की थी. तत्पश्चात समय-समय पर मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम स्थित गरवारे क्लब में 'रेल संरक्षा पर सार्वजनिक संगोष्ठी' (वर्ष 2003), 'इम्प्रूविंग सेफ्टी इन रेल इंजीनियरिंग वर्क्स' (वर्ष 2004), 'सिक्योरिटी ऑफ़ सबर्बन रेल यूजर्स' (वर्ष 2005), 'रोल ऑफ़ विजिलेंस आर्गनाइजेशन इन रेलवे सिस्टम' (सिडनहम कॉलेज मुंबई, वर्ष 2006), 'सिक्योरिटी ऑफ़ रेल यूजर्स एंड डिजास्टर मैनेजमेंट' (म्यूजियम हाल, पटना, वर्ष 2007), 'सबर्बन ट्रांसपोर्ट सिनारियो इन मुंबई - प्रोजेक्ट्स एंड प्लानिंग्स' (वर्ष 2008), 'इकनामिक वायबिलिटी थ्राफ डेवेलपमेंट ऑफ़ नान-कन्वेंशनल रेवेन्यु रिसोर्सेस ऑफ़ इंडियन रेलवेज' (सिडनहम कॉलेज मुंबई, वर्ष 2009) आदि समसामयिक विषयों पर सेमिनारों का आयोजन करके 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' ने रेल प्रशासन और रेल व्यवस्था के हित में अपना अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान दिया है.


 

आगामी 17 जून 2012 को मुरादाबाद के रेलवे स्टेडियम में देश भर से हजारो की संख्या में रेलवे के टिकट जाँच कर्मचारी जमा होंगे,क्योंकि मुरादाबाद के रेलवे स्टेडिंयम में "प्रथम नेशनल टिकट चेकिंग मीट" का आयोजन किया जारहा है. यह मीट टिकट चेकिंग स्टाफ में भाईचारा पैदा करने के उद्देश्य से आयोजित की गयी है. इस टिकट चेकिंग मीट में वरिष्ट एवं युवा टिकट जाँच कर्मचारी इकठ्ठा होकर अपने कैडर की समस्याओं पर चर्चा करेंगे. टिकट चेकिंग मीट की तैयारी को देखते हुए लगता है कि इस मीट में हजारो की संख्या में टिकट जाँच कर्मचारी हिस्सा लेंगे और यह मीट अपने आप में एक ऐतिहासिक मीट साबित होने वाली है. टिकट चेकिंग मीट के बारे में जानकारी देते हुए मध्य रेलवे के मुख्य टिकट निरीक्षक डॉ. मुकेश गौतम ने बताया कि इस मीट को लेकर सम्पूर्ण भारतीय रेल के टिकट चेकिंग स्टाफ में भारी उत्साह है. यह मीट रेलवे के टिकट चेकिंग कैडर के लोगो में आपसी भाईचारा पैदा करने और उनकी समस्याओं पर चर्चा करने के लिए बुलाई गयी है. उन्होंने बताया कि बहुत दिनों से यह विचार किया जा रहा था कि रेलवे के इस अत्यंत महत्त्वपूर्ण कैडर के लोगों को एक मंच पर आकर आपसी भाईचारा बढ़ाने के प्रयत्न के साथ ही कैडर कि तमाम समस्याओं पर मिलकर चर्चा करनी चाहिए. उन्होंने मुरादाबाद, दिल्ली और उसके आसपास के सभी चेकिंग स्टाफ, टिकट चेकिंग स्टाफ आर्गनाइजेशन के पदाधिकारियों को धन्यवाद् दिया कि उनके प्रयासों से ही पहली बार इस तरह की मीट का आयोजन बड़े पैमाने पर किया जा रहा है. डॉ गौतम ने अधिक से अधिकं संख्या में टिकट चेकिंग स्टाफ से इस मीट में भाग लेने की अपील की है.


कंट्रोलर्स को तो हम बचा लेंगे, मगर हमें कौन बचाएगा...?

कोलकाता : दो कार्पोरेट घरानों की आपसी लड़ाई में दक्षिण पूर्व रेलवे के निचले स्तर के ट्रैफिक अधिकारी उत्पीड़ित किए जा रहे हैं, जबकि जो अधिकारी वास्तव में इसके लिए जिम्मेदार रहे हैं, उनको विजिलेंस और सीबीआई की कार्रवाई से न सिर्फ बचाया जा रहा है, बल्कि आज उन्हीं के मार्गदर्शन में विजिलेंस और सीबीआई की कार्रवाई चल रही है. वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों को बचाने एवं उनकी कुटिल करतूतों को ढंकने के लिए निचले स्तर के अधिकारियों को फंसाया जा रहा है.. इससे यहाँ सभी ट्रैफिक अधिकारियों में एक प्रकार की दहशत व्याप्त है. शायद किसी को भी इस बात पर यकीन नहीं होगा कि रेक का आवंटन कंट्रोलर्स द्वारा किया जाता है, मगर द. पू. रे में यह करिश्मा हुआ है, क्योंकि वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों को बचाना है. प्राप्त जानकारी के अनुसार जो सवाल सीबीआई द्वारा सीओएम को पूछा गया था, उसका जवाब डिप्टी सीओएम/प्रोजेक्ट एंड प्लानिंग ने दिया है. सीओएम कार्यालय, गार्डेन रीच से यह जवाब 21 मार्च 2012 को सीबीआई/कोलकाता को भेजा गया है, जिसमें कहा गया है कि रेक का आवंटन चक्रधरपुर मंडल के चीफ कंट्रोलर/मिनरल श्री एम. के. राय और श्री एस. के. तिवारी ने किया था. सीबीआई ने सीओएम/द.पू.रे. को पूछा था कि मेसर्स रश्मि सीमेंट लि. को रेकों का वास्तविक आवंटन किन अधिकारियों ने किया था, उनका नाम, पदनाम, वेतनमान और वर्तमान पोस्टिंग कहाँ है, आदि जानकारी सीबीआई को मुहैया कराई जाए. इसी का उपरोक्त जवाब डिप्टी सीओएम/पीपी श्री पी. एल. हरनाथ ने दिया है. यह कितना हास्यास्पद है.

इसी प्रकार बराजाम्दा और बड्विल के बीच ओएमडीसी साइडिंग के पास अपनी साइडिंग बनाने के लिए रश्मि सीमेंट को द. पू. रे. द्वारा भूमि का आवंटन किया गया था. यह आवंटन तत्कालीन सीओएम और सीटीपीएम ने किया था, क्योंकि इस प्रकार के काम के लिए भूमि आवंटन का अधिकार उन्हीं के पास होता है. मगर इस मामले में तत्कालीन सीओएम और सीटीपीएम को बचाने के लिए विजिलेंस ने तत्कालीन डिप्टी सीओएम/पीपी को इसमें फंसाया. टैफिक अधिकारियों में इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया जा रहा है कि साइडिंग या लैंड एलाटमेंट के लिए डिप्टी सीओएम/पीपी को कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जो कि सिर्फ फाइल पुटअप करता है? यह अधिकार तो सीओएम और सीटीपीएम का है. यहाँ यह भी जान लेना आवश्यक है कि तत्कालीन डिप्टी सीओएम/पीपी को रेलवे छोड़े (वीआरएस लिए) हुए भी कई साल हो चुके है. कोई भी अधिकारी यह नहीं बता पा रहा है कि रेक और भूमि आवंटन में गड़बड़ी कहाँ और क्या हुई है. इस मुद्दे को सभी अधिकारी एक - दूसरे पर ढ़केल रहे हैं, और अंततः अपने आपको बचाने के लिए सारा दोष इन अधिकारियों ने कंट्रोलर्स के सिर मढ़ दिया है. डिप्टी सीओएम/पीपी हरनाथ द्वारा सीबीआई को दिया गया जवाब भी कुछ इस तरह जलेबी टाइप बनाया गया है कि सीबीआई वाले खुद उसमें चकरघिन्नी बनकर रह जाएँ. इस सबका अर्थ यह लगाया जा रहा है कि जो सांप वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों की मिलीभगत से द. पू. रे. विजिलेंस ने रेंगाया था, उसे किसी तरह बिल के अन्दर घुसाया जाए, इसीलिए रश्मि ग्रुप से सम्बंधित मामलों को चकरघिन्नी की तरह घुमाया और जलेबी की तरह लपेटा जा रहा है.

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पश्चिम रेलवे का 57वाँ रेल सप्ताह पुरस्कार समारोह सम्पन्न

सर्वोत्त्म कार्य निष्पादन के लिए 189 व्यक्तिगत तथा 17 सामूहिक पुरस्कार

पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार 20 अप्रैल, 2012 कोवाई. बी. चव्हाण सभागृह में प्रबंधक श्री लोकेश नारायण तथा उनके अधिकारियों की टीम को सर्वश्रेष्ठ डिवीजन की शील्ड प्रदान करते हुए.
पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार 20 अप्रैल, 2012 को वाई बी चव्हाणसभागृह में वडोदरा मंडल की नैरो गेज प्रणाली के 150 वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर एक विशेष डाक आवरण का विमोचन के पश्चात उसके बड़े प्रतिरूप का अनावरण करते हुए. साथ में हैं पश्चिम रेलवे के अपर महाप्रबंधक श्री दीपक गुप्ता, निदेशक, डाक सेवाएँ (मुख्यालय) श्रीमती आभा सिंह तथा पश्चिम रेलवे के मुख्य जनसम्पर्क अधिकारी श्री शरत चंद्रायन.

पश्चिम रेलवे का 57वाँ रेल सप्ताह पुरस्कार समारोह शुक्रवार, 20 अप्रैल, 2012 को मुंबई के वाई. बी. चव्हाण सभागृह में सम्पन्न हुआ. मुंबई सेंट्रल मंडल ने वाणिज्य, यांत्रिक, परिचालन एवं बिजली विभागों में उत्कृष्ट कार्य-निष्पादन के लिए 5 शील्डें प्राप्त कीं. पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार ने मुंबई सेंट्रल के मंडल रेल प्रबंधक श्री गिरीश पिल्लई तथा सम्बंधित शाखा अधिकारियों को ये शील्डें प्रदान कीं. पश्चिम रेलवे की सर्वोत्तम रख-रखाव वाली ट्रेन का पुरस्कार 12915/16 अहमदाबाद-नई दिल्ली आश्रम एक्सप्रेस को, जबकि सर्वोत्तम रख-रखाव वाली ट्रेन का द्वितीय पुरस्कार 19023/24 मुंबई सेंट्रल-फिरोजपुर जनता एक्सप्रेस को प्रदान किया गया.

वर्ष 2011-12 के दौरान उत्कृष्ट कार्य-निष्पादन हेतु समग्र कार्यकुशलता के लिएमहाप्रबंधक की प्रतिष्ठित सर्वश्रेष्ठ डिवीजन की शील्ड रतलाम मंडल को प्रदान की गई. रतलाम मंडल के मंडल रेल प्रबंधक श्री लोकेश नारायण ने यह शील्ड पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार से प्राप्त की. श्री महेश कुमार ने वर्ष 2011-12 के दौरान उत्कृष्ट कार्य करने के लिए 20 और कार्यकुशलता शील्डें विभिन्न मंडलों तथा इकाइयों को प्रदान कीं, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों में अच्छी कार्यकुशलता का परिचय दिया है. पश्चिम रेलवे के वडोदरा मंडल पर नैरो गेज प्रणाली के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर एक विशेष डाक आवरण का भी विमोचन किया गया. इस अवसर पर निदेशक, डाक सेवाएँ (मुख्यालय) श्रीमती आभा सिंह विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित थीं.

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उत्कृष्ट कार्य निष्पादन के लिए पश्चिम रेलवे को
मिली रेलवे बोर्ड की चार रनिंग शील्ड

16 अप्रैल, 2012 को नई दिल्ली में आयोजित 57वें राष्ट्रीय रेल सप्ताह समारोह में रेलमंत्री के हाथों संरक्षा शील्ड ग्रहण करते हुए पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार और मुख्य संरक्षा अधिकारी श्री एस. के. कुलश्रेष्ठ. इस अवसर पर रेल राज्यमंत्री श्री भरतसिंह सोलंकी भी उपस्थित थे.
16 अप्रैल, 2012 को नई दिल्ली में आयोजित 57वें राष्ट्रीय रेल सप्ताह समारोह में रेलमंत्री के हाथों वाणिज्यिक शील्ड ग्रहण करते हुए पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार और मुख्य वाणिज्य प्रबंधक श्री जी. एस. बैनर्जी. इस अवसर पर रेल राज्यमंत्री श्री भरतसिंह सोलंकी भी उपस्थित थे.

पश्चिम रेलवे ने वर्ष 2011-12 के दौरान उत्कृष्ट कार्य निष्पादन के लिए रेल मंत्रालय द्वारा दी जाने वाली समग्र कार्यकुशलता शील्ड और संरक्षा शील्ड सहित कुल चार प्रतिष्ठित चल वैजयंतियाँ हासिल करके उल्लेखनीय उपलब्धि अर्जित की है. ये वैजयंतियाँ पश्चिम रेलवे के महाप्रबंधक श्री महेश कुमार ने सम्बंधित विभागाध्यक्षों के साथ सोमवार, 16 अप्रैल, 2012 को नई दिल्ली में आयोजित 57वें राष्ट्रीय रेल सप्ताह समारोह में रेलमंत्री के हाथों प्राप्त की. इस अवसर पर रेल राज्यमंत्री श्री के.एच. मुनियप्पा और श्री भरतसिंह सोलंकी भी उपस्थित थे. पश्चिम रेलवे को मिली चार चल-वैजयंतियों में रेलवे कार्य प्रणाली के सभी क्षेत्रों में समग्र कार्यकुशलता के लिए प्रदान की जाने वाली गोविंद वल्लभ पंत शील्ड, संरक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्ट निष्पादन के लिए दी जाने वाली संरक्षा शील्ड तथा वाणिज्यिक गतिविधियों में उल्लेखनीय कार्य के लिए निर्धारित वाणिज्य शील्ड मुख्य रूप से शामिल हैं. भारतीय रेल प्रणाली की सभी 17 क्षेत्रीय रेल इकाइयों में वर्ष 2011-12 के दौरान पश्चिम रेलवे का संरक्षा निष्पादन कार्य सर्वश्रेष्ठ रहा तथा पश्चिम रेलवे पर पिछले वित्तीय वर्ष के मुकाबले गम्भीर दुर्घटनाओं की संख्या में 50 प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई. संरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पश्चिम रेलवे द्वारा डाटा लागर्स, विजिलेंस कंट्रोल डिवाइस तथा रेल समपारों पर बुनियादी संरचना में सुधार सहित विभिन्न महत्त्वपूर्ण कदम उठाये गये हैं. रेल यात्रियों को संरक्षित यात्रा सुलभ कराने के लिए उठाये गये विभिन्न कारगर उपायों को दृष्टिगत रखते हुए पश्चिम रेलवे का चयन संरक्षा शील्ड के लिए किया गया. पश्चिम रेलवे द्वारा टिकटिंग, यात्री सुविधाओं और पार्सल बुकिंग इत्यादि वाणिज्यिक गतिविधियों में उल्लेखनीय कार्य निष्पादन के लिए वर्ष 2011-12 की वाणिज्यिक शील्ड हासिल की गई. उल्लेखनीय है कि पश्चिम रेलवे पर समग्र प्रारम्भिक आय में पिछले वर्ष के मुकाबले 16 प्रतिशत की सराहनीय वृद्धि दर्ज की गई है. इन तीनों रनिंग शील्डों के अलावा पश्चिम रेलवे के बांद्रा स्थित रनिंग रूम का चयन भारतीय रेल के सर्वश्रेष्ठ रनिंग रूम के रूप में किया गया, जिसके फलस्वरूप रेलवे बोर्ड की रनिंग रूम शील्ड भी पश्चिम रेलवे को प्रदान की गई. यह शील्ड दक्षिण मध्य रेलवे के गुंटूर रनिंग रूम के साथ संयुक्त रूप से हासिल हुई.


वित्त वर्ष 2011-12 में भा. रे. की आय 10.15% बढ़ी

वित्तवर्ष 2011-12 में भारतीय रेल की कुल अनुमानित आय 104278.79 करोड़ रु. हुई है, जो कि इससे पहले वित्तवर्ष 2010-11 की कुल आय 94670.76 करोड़ रु. से 10.15% ज्यादा है. आलोच्य अवधि में भा. रे. की कुल गुड्स आय पिछले वित्तवर्ष 2010-11 की 62940.81 करोड़ रु. की अपेक्षा 10.70% बढ़कर 69675.97 करोड़ रु. हुई है. जबकि इस दौरान कुल यात्री आय में 10.15% वृद्धि हुई है. इस दौरान कुल यात्री आय 28645.52 करोड़ रु. (26006.77 करोड़ रु.) हुई. वर्ष 2011-12 में भा. रेल. की अन्य आय 11.98% बढ़कर 2825.16 करोड़ रु. (2522.81 करोड़ रु.) रही है. जबकि इस दौरान कुल यात्री संख्या 5.29% की वृद्धि के साथ 8306.16 मिलियन (7888.91 मिलियन) रही. इसी प्रकार उपनगरीय और गैर-उपनगरीय यात्रियों की संख्या क्रमशः 4383.17 मिलियन और 3922.99 मिलियन रही, जबकि इससे पिछले वर्ष या क्रमशः 4228.53 मिलियन और 3660.38 मिलियन रही थी. इस प्रकार आलोच्य अवधि में उपनगरीय और गैर-उपनगरीय यात्रियों की संख्या में क्रमशः 3.66% और 7.17% की वृद्धि दर्ज हुई है. वित्तवर्ष 2011-12 में भा. रे. ने कुल 967.78 मिलियन टन माल की लोडिंग की है. जो की इससे पिछले वर्ष 2010-11 में कुल 921.51 मिलियन टन था. आलोच्य अवधि में माल लोडिंग में 5.24% की बढ़ोत्तरी हुई है. वित्त वर्ष 2011-12 के अंतिम महीने मार्च 2012 में भा. रे. ने 93.85 मिलियन टन माल की ढुलाई की, जो की पिछले वर्ष 2010-11 की सामान अवधि के 88.84 मिलियन टन से 5.64% ज्यादा है.


रेल परिसर में पत्रकार पर हमला..

जहाँ तक रेलवे का क्षेत्र है,
वहां तक आरपीएफ का कार्यक्षेत्र है

मुंबई : मध्य एवं पश्चिम रेलवे के दादर स्टेशन पर दोनों रेलों के बीच स्थित मध्य रेलवे सीनियर इंस्टीट्यूट की दीवार और चारदीवारी के बीच बनाई गई अवैध कैंटीन की खबर लेने जब एक स्थानीय हिंदी दैनिक 'नवभारत टाइम्स' के वरिष्ठ पत्रकार श्री आनंद मिश्रा गुरुवार, 12 अप्रैल को वहां गए तो कुछ लोगों ने उसके साथ धक्का-मुक्की और गाली-गलौज किया, उन्हें प्रताड़ित भी किया. उनका पर्स और परिचय पत्र छीनकर फेंक दिया, उन्हें फर्जी पत्रकार बताकर दुबारा वहां आने पर जान से मारने की धमकी दी गई. यह सब उक्त अवैध कैंटीन चलाने और चलवाने वालों ने किया. पुलिस की असंवेदनशीलता एक बार फिर उजागर हुई, श्री मिश्रा को अपनी शिकायत दर्ज कराने के लिए चार-पांच घंटे तक तीन पुलिस स्टेशनों के चक्कर काटने पड़े. जब एक पत्रकार को अपनी शिकायत लिखाने के लिए इतनी मशक्कत करनी पड़ती है, तो आम आदमी की स्थिति का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है. इस सम्बन्ध में सूचना मिलते ही म. रे. के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन ने मामले का पूरा संज्ञान लिया. उन्होंने तुरंत इस बारे में मंडल प्रशासन को आवश्यक निर्देश दिए. श्री जैन ने उक्त इंस्टीट्यूट की इमारत को ही ढहा दिए जाने और वहां कोई उपयोगी निर्माण कराए जाने का फरमान भी जारी कर दिया. महाप्रबंधक श्री जैन ने स्पष्ट रूप से कहा कि जिन रेलकर्मियों को यह इंस्टीट्यूट सामाजिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए दिया गया था, उन्होंने इसे अवैध गतिविधियों का अड्डा बना दिया, हम इस सबको हमेशा के लिए ख़त्म करना चाहते हैं. परन्तु मंडल प्रशासन इस पूरे मामले में सिर्फ हीलाहवाली करता रहा और यूनियनों से समन्वय स्थापित करने की बात करता रहा, देर शाम तक उसके द्वारा इंस्टीट्यूट को सील किए जाने के दिए गए आदेश का पालन भी आरपीएफ द्वारा नहीं किया गया था.

इस मामले की गंभीरता का सबसे ज्यादा संज्ञान राज्य के गृहमंत्री श्री आर. आर. पाटिल ने लिया, मुंबई के सैकड़ों पत्रकार एकजुट होकर उन्हें मिलने के लिए मंत्रालय में उनके चेंबर में पहुँच गए थे. श्री पाटिल तुरंत श्री आनंद मिश्रा को अपनी कार में बैठाकर बिना किसी लाव-लश्कर के ही घटना स्थल का निरीक्षण करने पहुँच गए. श्री पाटिल के इस त्वरित कदम से न सिर्फ पूरा पुलिस महकमा हड़बड़ा गया, बल्कि रेल प्रशासन को भी मामले की गंभीरता का अब अहसास हुआ. गृहमंत्री श्री पाटिल ने न सिर्फ पुलिस को चौबीस घंटों के अन्दर सम्बंधित असली आरोपियों को गिरफ्तार करने का कड़ा निर्देश दिया, बल्कि पुलिस द्वारा अपनी खाल बचाने के लिए पकड़े गए चार स्कूली बच्चों और कैंटीन में काम करने वाले दो लोगों को भी तुरंत छोड़ देने को कहा, जो कि इंस्टीट्यूट में खेलने आए थे और जिनका इस मामले से कोई सम्बन्ध नहीं था. श्री पाटिल के सामने ही इस बच्चों ने पुलिस की असलियत उजागर कर दी. इससे पहले श्री पाटिल ने दादर स्टेशन के पैदल उपरी पुल पर जीआरपी की मेहरबानी से वर्षों से काबिज अवैध फेरीवालों को भी स्थाई रूप से हटाने का निर्देश मुंबई रेल पुलिस आयुक्त को मोबाइल पर वहीं खड़े रहकर दिया. यही नहीं, श्री पाटिल ने वह काम किया जो मंडल रेल प्रशासन ने नहीं किया था, उन्होंने घटना स्थल को अपने सामने पूरी तरह से सील करवा दिया. रेल परिसरों में इस तरह की तमाम अवैध गतिविधियों को रोकने और यात्रियों को इससे होने वाली परेशानी के सम्बन्ध में रेलवे बोर्ड को पत्र लिखने की बात भी श्री पाटिल ने इस मौके पर कही.

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सेवानिवृत्ति के बाद पदाधिकारी बने रहने
का कोई सवाल ही नहीं है - जे. पी. सिंह

मुंबई : सेवानिवृत्ति के बाद इंडियन रेलवे प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) का पदाधिकारी बने रहने अथवा सेवानिवृत्त अधिकारियों को पदाधिकारी बनाए जाने का एक शगूफा छोड़ा गया है. जिससे आजकल भारतीय रेल के तमाम प्रमोटी अधिकारियों में एक प्रकार की खिन्नता देखी जा रही है और इस शगूफे पर वह अपनी नाराजगी व्यक्त कर रहे हैं. उनका कहना है कि पिछले पांच - छह सालों के दौरान एक पदाधिकारी के कारण वैसे ही फेडरेशन की सारी गरिमा मिट्टी में मिल गई है, और लगभग हर जोन में गंदी राजनीति फ़ैल गई है तथा फेडरेशन की अधिकतर कार्रवाई झूठ पर आधारित हो गई है. ऐसे में अगर वर्तमान महासचिव जैसे झूठों के सरताज पदाधिकारी को सेवानिवृत्ति के बाद भी पदाधिकारी बनाए रखा गया, तो फेडरेशन की बची-खुची अस्मिता भी धूल में मिल जाएगी. इस मुद्दे पर 'रेलवे समाचार' द्वारा जब यह पूछा गया कि क्या ऐसा कोई विचार फेडरेशन में चल रहा है, तो आईआरपीओएफ के अध्यक्ष श्री जे. पी. सिंह ने इसका सिरे से खंडन करते हुए कहा कि ऐसा कोई विचार नहीं चल रहा है. उन्होंने यह भी कहा कि सेवानिवृत्ति के बाद पदाधिकारी बने रहने या सेवानिवृत्त अधिकारी को पदाधिकारी बनाए जाने का कोई सवाल ही नहीं है. सबसे पहले वे स्वयं इस विचार के विरोधी हैं.

श्री जे. पी. सिंह ने आगे बताया कि इलाहबाद में 15 - 16 मार्च को हुई ईसीएम की दूसरे दिन की बैठक समाप्त होने के बाद एक सदस्य ने इस पर अवश्य कुछ विचार व्यक्त किया था. उन्होंने कहा कि उसका यह विचार बैठक का हिस्सा नहीं था. तथापि उक्त सदस्य के यह विचार व्यक्त करते ही उस पर वहां उपस्थित सभी अधिकारियों ने तुरंत इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया था. उसके बाद यह बात वहीं ख़त्म हो गई थी. श्री सिंह का कहना था कि कुछ लोग हैं जो बात का बतंगड़ बनाते रहते हैं. उन्होंने आगे यह भी कहा कि इस मुद्दे पर कोई भी अधिकारी सहमत नहीं होगा और सबसे पहले वह खुद इस तरह के किसी विचार या प्रस्ताव का समर्थन नहीं करेंगे. उन्होंने बताया कि सबसे लम्बे समय तक निर्विरोध निर्वाचित होते रहे पूर्व महासचिव श्री के. हसन को सेवानिवृत्ति के बाद फेडरेशन का महासचिव बनाए रखने पर सहमति नहीं हो पाई थी, जबकि तत्कालीन रेलमंत्री उन्हें सेवानिवृत्ति के बाद महासचिव पद पर बने रहने की मंजूरी देने को तैयार थे, मगर प्रमोटी अधिकारी इसके लिए सहमत नहीं हुए थे और तब गोरखपुर में हुई फेडरेशन की सर्वसाधारण सभा में इसका प्रस्ताव गिर गया था.

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आसनसोल मंडल को समग्र कार्य-कुशलता शील्ड

कोलकाता : पूर्व रेलवे ने अपना 57वां रेल सप्ताह शुक्रवार, 13 अप्रैल को डा. बी. सी. राय इंस्टीट्यूट, सियालदह, कोलकाता में मनाया. इसके साथ ही इसके चार मंडलों - सियालदह, हावड़ा, आसनसोल और मालदा सहित तीनों वर्कशाप लिलुआ, कचरापारा और जमालपुर - में भी 10 से 16 अप्रैल के दरम्यान रेल सप्ताह का आयोजन किया गया. 13 अप्रैल को पू. रे. के महाप्रबंधक श्री जी. सी. अग्रवाल ने वर्ष 2011-12 के दौरान अच्छा काम करने करने के लिए विभिन्न मंडलों, स्टेशनों और कारखानों सहित व्यक्तिगत तौर पर कुल 30 शील्ड एवं कप प्रदान किए. जबकि बेहतर कार्य-निष्पादन के लिए जीएम पू. रे. की समग्र कार्य-कुशलता शील्ड और रनर अप कप सियालदह मंडल को मिला. बेस्ट स्टेशन का कप मालदा टाउन स्टेशन को और अच्छी साफ़-सफाई की शील्ड भी सियालदह मंडल को मिली. इस अवसर पर 29 ग्रुप 'डी', 178 ग्रुप 'सी' कर्मचारियों और 33 अधिकारियों एवं 19 ग्रुप एवार्ड सहित कुल 240 रेलकर्मियों को बेहतर कार्य के लिए श्री अग्रवाल ने पुरस्कार प्रदान किए. उल्लेखनीय है कि 16 अप्रैल 1953को मुंबई (बॉम्बे) से ठाणे के बीच चली पहली ट्रेन की याद में प्रतिवर्ष पूरी भा. रे. में 10 से 16 अप्रैल के दरम्यान इस रेल सप्ताह का आयोजन किया जाता है. जबकि पूर्व रेलवे (तत्कालीन ईस्ट इंडियन रेलवे) की पहली ट्रेन 15 अगस्त 1854 को हावड़ा से हुगली के बीच चली थी. इस अवसर पर महाप्रबंधक श्री अग्रवाल ने वित्तवर्ष 2011-12 में पू. रे. द्वारा किए गए समग्र कार्य-निष्पादन का उल्लेख किया. इसके अलावा उन्होंने चालू वित्तवर्ष 2012-13 में किए जाने वाले कर्यों को शीघ्रता से पूरा किए जाने की बात कही. उन्होंने बताया कि वित्तवर्ष 2011-12 में पू. रे. ने 57.747 मिलियन टन माल की लोडिंग और 117.35 करोड़ यात्रियों का परवहन किया, जिससे पू. रे. को इस दरम्यान कुल 5574.17 करोड़ रु. की आय हुई है. उन्होंने वर्ष 2011-12 में उल्लेखनीय कार्य-निष्पादन के लिए पू. रे. को रेलवे बोर्ड की संयुक्त रूप से इंजीनियरिंग कंस्ट्रक्शन शील्ड और पैसेंजर सिक्योरिटी शील्ड मिलने पर प्रसन्नता जाहिर की. यह दोनों शील्ड 16 अप्रैल को नई दिल्ली में रेलमंत्री के हाथों प्रदान की गईं. इसके अलावा पू. रे. के 18 ग्रुप 'डी' और ग्रुप 'सी' स्टाफ सहित 15 अधिकारियों को भी रेलवे बोर्ड स्तर का पुरस्कार मिलने पर श्री अग्रवाल ने उन्हें बढाई देते हुए ख़ुशी जाहिर की और आगे इससे बेहतर कार्य करने का प्रोत्साहन भी दिया.


पूर्व रेलवे की रिकार्ड लोडिंग, यात्रियों और कुल आय में वृद्धि

कोलकाता : रेलों के पुनर्गठन के बाद पूर्व रेलवे ने न सिर्फ अब तक की रिकार्ड लोडिंग की है, बल्कि 31 मार्च 2012 को समाप्त हुए वित्त वर्ष 2011-12 में उसके यात्रियों की संख्या और माल लोडिंग में गुणात्मक वृद्धि सहित कुल आय में भी भारी बढ़ोत्तरी हुई है. वर्ष 2011-12 के दौरान पूर्व रेलवे ने कुल 57.747 मिलियन टन माल ढुलाई की है. वर्ष 2002 में रेलों के पुनर्गठन के बाद से पूर्व रेलवे की यह अब तक की सबसे ज्यादा माल ढुलाई है. हालाँकि इस दौरान अक्तूबर 2011 में कई विषम कारणों से इसकी माल ढुलाई में थोड़ी सी कमी आई थी, मगर नवम्बर 2011 से मार्च 2012 के दरम्यान इसमें काफी गति आई. इससे पिछले वित्त वर्ष की अपेक्षा 10.58% ज्यादा माल लोडिंग दर्ज हुई है. इसमें ईस्टर्न कोल फील्ड, पैनेम, बंगाल एमटा और आईसीएमएल जैसी बड़ी लोडिंग कंपनियों का बहुत बड़ा योगदान रहा है, जिनके इस महत्वपूर्ण सहयोग से रेलवे बोर्ड द्वारा इस रेलवे के लिए निर्धारित माल लोडिंग टारगेट 57.000 मिलियन टन को पार करने में पूर्व रेलवे ने सफलता हासिल की है. वर्ष 2010-11 के दौरान पूर्व रेलवे ने कुल 54.885 मिलियन टन माल की ढुलाई की थी, जिसमें इससे पिछले वर्ष की अपेक्षा 5.21% की वृद्धि हासिल हुई थी, जिसमें 1.31% और जोड़कर रेलवे बोर्ड ने पूर्व रेलवे के लिए वर्ष 2011-12 का माल लोडिंग लक्ष्य निर्धारित किया था. जिसे इसने सफलतापूर्वक हासिल कर लिया है.

वर्ष 2011-12 में हुई पूर्व रेलवे की कुल लोडिंग में कोयले का हिस्सा 38.25 मिलियन टन रहा, जो कि 36.650 मिलियन टन निर्धारित किया गया था. पूर्व रेलवे ने वर्ष 2010-11 में भी 35.537 मिलियन टन अकेले कोयले की लोडिंग की थी. आलोच्य अवधि 2011-12 में पूर्व रेलवे ने 19.489 मिलियन टन अन्य वस्तुओं की लोडिंग की है, जो कि वर्ष 2010-11 में 19.348 मिलियन टन हुई थी. आलोच्य अवधि में पूर्व रेलवे की कुल माल लोडिंग आय वर्ष 2010-11 की अपेक्षा 13.40% बढ़कर 3752.90 करोड़ रुपये हुई है, जो कि इससे पहले वर्ष 2010-11 में 3309.39 करोड़ रुपये हुई थी. इस दौरान इसके यात्रियों की संख्या 117.35 करोड़ (111.31 करोड़) रही, जिससे यात्रियों की संख्या में 5.43% की वृद्धि दर्ज हुई है. रेलवे बोर्ड ने वर्ष 2011-12 के लिए पूर्व रेलवे हेतु यह लक्ष्य 115.23 करोड़ यात्रियों का तय किया था. आलोच्य अवधि 2011-12 में पूर्व रेलवे की यात्री आय 1560.20 करोड़ रुपये (1425.52 करोड़ रुपये) हुई है, जो कि पूर्व की अपेक्षा 9.45% अधिक है. इस दरम्यान पूर्व रेलवे ने कुल आय 5574.17 करोड़ रुपये (4975.11 करोड़ रुपये) प्राप्त की है, जिसमें कुल 12.04% की बढ़ोत्तरी हुई है.

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म. रे. की समग्र दक्षता शील्ड नागपुर मंडल को

मुंबई : 57 वें रेल सप्ताह 10 से 16 अप्रैल 2012 के दौरान म. रे. की समग्र दक्षता शील्ड इस बार नागपुर मंडल ने जीती है. 12 अप्रैल को छत्रपति शिवाजी टर्मिनस (सीएसटी) आडिटोरियम में आयोजित एक भव्य समारोह में मध्य रेलवे के महाप्रबंधक श्री सुबोध कुमार जैन ने यह 'समग्र दक्षता शील्ड' नागपुर मंडल के मंडल रेल प्रबंधक श्री बृजेश दीक्षित को सौंपी.

इस अवसर पर महाप्रबंधक श्री जैन ने मध्य रेलवे के सभी मंडलों, पुणे, भुसावल, नागपुर, सोलापुर और मुंबई, के 195 अधिकारियों और कर्मचारियों को नकद पुरस्कार, प्रशस्ति पत्र और पदक प्रदान किया. इसके साथ ही श्री जैन ने रेलवे बोर्ड का पुरस्कार पाने वाले 12 अधिकारियों एवं कर्मचारियों का भी सम्मान किया.

सालाना जलसे के इस महत्वपूर्ण मौके पर मध्य रेलवे के सभी विभाग प्रमुखों सहित सभी मंडल रेल प्रबंधक और बड़ी संख्या में अधिकारी तथा कर्मचारीगण उपस्थित थे.


हाई कोर्ट को संयम बरतने की जरूरत..

हाल ही में एक मामले की सुनवाई के दौरान मुंबई हाई कोर्ट ने रेलवे प्रोटेक्शन फ़ोर्स (आरपीएफ) के सम्बन्ध में "रेलवे डिसत्रक्तिव फ़ोर्स" (Railway Distructive Force) जैसी एक भ्रामक टिप्पणी की है, जिससे करीब 70 हजार जवानों की यह फ़ोर्स काफी उद्वेलित है. उनमें और उनके प्रशासनिक अधिकारियों में इस टिप्पणी पर हाई कोर्ट के प्रति न सिर्फ काफी आक्रोश व्याप्त हुआ है, बल्कि वह इससे काफी हतोत्साहित और अपमानित भी महसूस कर रहे हैं. हाई कोर्ट की इस टिप्पणी से जहाँ एक ओर इस मामले में लिप्त रहे लोग यह सोचकर खुश हो रहे हैं कि सिर्फ वही ऐसे नहीं हैं, बल्कि सभी उन्हीं की तरह हैं, क्योंकि उक्त टिप्पणी सभी के बारे में की गई है. इससे मामले में लिप्त रहे लोगों का नहीं, बल्कि पूरी फ़ोर्स का सिर नीचा हुआ है. यदि हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से अपनी यह टिप्पणी सिर्फ मामले में लिप्त रहे लोगों तक सीमित की होती, तो सिर्फ वही लोग हतोत्साहित हुए होते और दूसरों के सामने उनका ही सिर नीचा हुआ होता. बाकी लोगों को अपमानित महसूस नहीं करना पड़ता. तथापि उद्वेलित और हतोत्साहित आरपीएफ जवानों को आरपीएफ एसोसिएशन के प्रबुद्ध नेतृत्व ने यह कहकर समझाया कि हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी पूरी फ़ोर्स के सन्दर्भ में नहीं, बल्कि मामले से सम्बंधित उन कुछ लोगों के खिलाफ की है, जो मामले में कहीं न कहीं लिप्त रहे हैं, तब जाकर आरपीएफ के जवान शांत हुए और उनको कुछ राहत महसूस हुई है..

मुंबई हाई कोर्ट ने उक्त टिप्पणी कुर्ला स्टेशन पर फर्जी बेल बांड (जमानत पत्र) कांड पर दायर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान की है. हाई कोर्ट द्वारा की गई यह टिप्पणी निश्चित रूप से न सिर्फ भ्रामक है, बल्कि जनसामान्य में इससे एक गलत सन्देश भी जाएगा. हालाँकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट और कुछ अन्य हाई कोर्टों ने भी पुलिस आदि के बारे में ऐसी टिप्पणियां की हैं. मगर यहाँ यह कहना गलत नहीं होगा कि सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और तमाम जूडीसियरी को ऐसे संवेदनशील मामलों में थोड़ा संयम बरतने की जरूरत है. इस तरह की टिप्पणियां पूरी फ़ोर्स अथवा पूरे समाज के सन्दर्भ में नहीं, बल्कि यदि अत्यंत आवश्यक ही हो तो, सिर्फ मामले से सम्बंधित लोगों के ही बारे में की जानी चाहिए, क्योंकि किसी गलत काम अथवा गैरकानूनी कृत्य के लिए पूरी फ़ोर्स या पूरा समाज दोषी नहीं हो सकता.

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26 अप्रैल को नहीं अब 9 मई को होगा सेमिनार

"भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन"

(RESURRECTION OF INDIAN RAILWAYS - AN INTROSPECTION)

किन्हीं अपरिहार्य कारणों की वजह से उपरोक्त विषय पर 26 अप्रैल को आयोजित होने वाले सेमिनार की तारीख को थोडा सा आगे बढ़ाया जा रहा है. अब यह सेमिनार 9 मई को होगा. सेमिनार का स्थान नहीं बदला है, यह वाय. बी. चव्हाण प्रतिष्ठान सभागृह में ही होगा. एक लम्बे अंतराल के बाद 'परिपूर्ण रेलवे समाचार' द्वारा पिछले कई सालों से चली आ रही अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए इस बार एक नए और समसामयिक विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है.

इस महत्वपूर्ण और समसामयिक सेमिनार में भारतीय रेल के पांचो मान्यताप्राप्त फेडरेशनों के उच्च पदाधिकारियों सहित रेलवे बोर्ड के सभी सदस्यों और जोनल रेलों के महाप्रबंधकों को भी आमंत्रित किया गया है. इसके अलावा बाहर से भी कुछ रेल विशेषज्ञों को इसमें शामिल होने हेतु बुलाया गया है.

यह सेमिनार वाई. बी. चव्हाण प्रतिष्ठान सभागृह, जनरल जगन्नाथ भोसले मार्ग, मंत्रालय के पास, नरीमन पॉइंट, मुंबई - 21 में 26 अप्रैल को नहीं अब 9 मई को आयोजित किया जाएगा.

इस बार ऐसे समसामयिक विषय को लेकर 'रेलवे समाचार' द्वारा सेमिनार का आयोजन किया जा रहा, जिससे करीब 160 साल पुरानी इस महान संस्था के 'पुनरुत्थान' के बारे में एक सार्थक चर्चा की जा सके. इसीलिए इस बार का विषय "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" रखा गया है. सेमिनार में बड़ी संख्या में रेलकर्मियों और यात्रियों एवं यात्री संगठनों से भाग लेने की अपील की जाती है.

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एआईआरएफ द्वारा संसद का घेराव

रेलवे का राजनीतिक शोषण बंद किया जाए -शिवगोपाल मिश्रा

नई दिल्ली : आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआईआरएफ) के नेतृत्व में 28 मार्च को करीब 20 हजार से ज्यादा रेलकर्मियों ने रेल किराया वापस लिए जाने के विरोध में संसद का घेराव किया. इस अवसर पर एआईआरएफ के महामंत्री कामरेड शिव गोपाल मिश्रा ने कहा कि अगर केंद्र सरकार ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के दबाव में बढे हुए रेल किरायों को वापस लिया है तो उनकी भरपाई अब केंद्र सरकार को जनरल बजट से करनी चाहिए. उन्होंने कहा कि रेलवे में खाली पड़े लाखों पदों के कारण रेलकर्मियों पर काम का भारी बोझ है. उनके अनुसार रेलवे में करीब ढाई लाख पद खाली हैं, जिनमे से लगभग डेढ़ लाख पद सिर्फ संरक्षा कोटि के हैं. इन पदों के नहीं भरे जाने से ट्रेनों का संचालन असुरक्षित होता जा रहा है.

कामरेड मिश्रा ने कहा कि संसद के घेराव में 20 हजार से ज्यादा रेलकर्मियों ने हिस्सा लिया, इसका मतलब है कि कर्मचारियों में सरकार के प्रति आक्रोश बढ़ता जा रहा है. उन्होंने कहा कि हर साल बजट में नई ट्रेनों की घोषणा के साथ ही पुरानी ट्रेनों के फेरे बढ़ा दिए जाते हैं, लेकिन इसके अनुरूप कर्मचारियों की तैनाती नहीं की जाती है. उन्होंने कहा कि देश भर में खाली पड़े ढाई लाख पदों के कारण रेलकर्मियों पर काम का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है. अत्यधिक काम के दबाव में तमाम कर्मचारी बीमार हो रहे हैं. इसलिए वह स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के आवेदन दे रहे हैं.

उन्होंने कहा कि लोको पायलट, सहायक स्टेशन मास्टर, पॉइंट्समैन, ट्रैकमैन, तकनीशियन, सिग्नलिंग स्टाफ, टिकट चेकिंग स्टाफ, आरक्षण स्टाफ और वरिष्ठ खंड अभियंताओं के लाखों पद वर्षों से खाली चल रहे हैं, सरकार इन सब पदों को भरने में लगातार टालमटोल कर रही है. उन्होंने कहा कि पिछले 15 वर्षों में रेल बजट में घोषित की गई हजारों रेल परियोजनाओं पर काम नहीं हो पा रहा है, तथापि हर साल फिर कई - कई योजनाएं घोषित कर दी जाती हैं. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि रेलवे का राजनीतिक शोषण तुरंत बंद किया जाना चाहिए. उन्होंने मांग की है कि रेलों के विकास के लिए आम बजट से समुचित फंड का आवंटन किया जाना चाहिए. सीनियर सुपरवाइजरों को 4800 का ग्रेड पे और ग्रुप 'बी' की पदोन्नति दी जानी चाहिए. तकनीशियन ग्रेड-2 को ग्रेड-1 का 2800 ग्रेड पे तुरंत स्वीकृत किया जाए. रनिंग कर्मचारियों के ग्रेड पे में सुधार तथा दि. 01.01.2006 से रनिंग एलाउंस के एरियर का भुगतान एवं माइलेज/एएलके की दरों में वृद्धि की जाए. नई पेंशन स्कीम और पीएफ/आरडीए बिल को वापस लेकर पुरानी पेंशन स्कीम को बहाल किया जाए. एमएसीपी की खामियों को अविलम्ब दूर किया जाना चाहिए. ढाई लाख से ज्यादा खाली पड़े पदों पर रेलकर्मियों के बच्चों/आश्रितों की तुरंत भर्ती की जाए. निजीकरण और आउट सोर्सिंग पर अविलम्ब रोक लगाई जाए. रेलकर्मियो के लिए घोषित कल्याणकारी योजनाओं को लागू किया जाए और रेलवे कालोनियों की हालत में सुधार किया जाए. एलएआरएसजीईएसएस का सरलीकरण करके इसे सभी कोटि के रेलकर्मियो के लिए लागू किया जाए. ट्रैकमैन पैकेज कमेटी की सिफारिशों पर तुरंत अमल किया जाए. संरक्षा कोटि के कर्मियों के लिए अधिकतम 8 घंटे कार्य की सीमा तय की जाए.


विनय मित्तल चाहें तो ख़त्म हो सकता है रेलवे के े

जनसंपर्क विभाग के साथ हो रहा सौतेला व्यवहार

भारतीय रेलवे एकल प्रबंधन के अंतर्गत विश्व का दूसरा और एशिया का सबसे बड़ा संगठन है. पब्लिक इंटरप्राइजेज का इससे बड़ा उदहारण पूरे भारत में और कोई नहीं है. रोजाना 2 करोड़ से ज्यादा यात्रियों और लगभग 1.50 करोड़ टन माल भारतीय रेलवे अपने लगभग 66000 रूट किलोमीटर पर स्थित 8500 स्टेशनों के माध्यम से प्रतिदिन परिवहन करती है. पूरे भारत के यात्रियों की सेवा करने वाले इस विशाल जन संगठन में जनसंपर्क का कार्य करने वालों के कैरियर की स्थिति बहुत ख़राब है. कहा तो यह भी जाने लगा है कि अगर किसी से सात जन्मों की पुरानी दुश्मनी निकालनी हो तो उसे रेलवे के जनसम्पर्क विभाग में ज्वाइन करने का मशवरा दे दो. कुछ ही दिन में न तो वह जीने के लायक रह जाएगा और न मरने के.. केंद्र सरकारके विभिन्न विभागों में भारतीय रेलवे ही एक ऐसा संगठन रहा है जिसने 1950 में ही जनसंपर्क के महत्व को समझ लिया था और उसी समय से रेलवे में जनसंपर्क विभाग की स्थापना की गयी थी. परन्तु यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज 63 वर्षों के बाद भी इस विभाग को मुख्य धारा में नहीं लाया जा सका है. इस विभाग में कार्यरत अधिकारियों और कर्मचारियों की स्थिति ज्यों की त्यों बनी हुई है. न तो इनके पदों की संख्यां बढाई गई है, और न ही प्रमोशन के अवसर बढ़ाये गए हैं. लोग वर्षों से एक ही पद पर काम करते हुए हताश और निराश हो रहे हैं. अब तो मुख्य जनसंपर्क अधिकारियों के पद पर दूसरे विभागों के अधिकारियों को लाकर ऊपर बैठाया जाने लगा है.

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उत्साहविहीन वातावरण

आजकल भारतीय रेल में रेलवे बोर्ड से लेकर जोनल और मंडल मुख्यालयों तक सभी रेलकर्मियों और अधिकारियों में मुर्दनी सी छाई हुई है. भारतीय रेल में चारों तरफ एक उत्साहविहीन वातावरण पसरा हुआ है. इसका सबसे बड़ा कारण यह बताया जा रहा है कि नए मंत्री का आना किसी को पसंद नहीं आया है, क्योंकि नए मंत्री की छवि साफ-सुथरी नहीं है. इससे सभी अधिकारी और कर्मचारी डरे हुए हैं. बताते हैं कि पूर्व रेलवे में हालत और भी ज्यादा ख़राब है, क्योंकि वहां के लोग अब तक जिस आदमी को बतौर एक स्क्रेप डीलर जानते थे जो कि अपने बिल पास कराने के लिए क्लर्क से लेकर कार्यालय अधीक्षक की टेबल्स के चक्कर लगाया करता था, उसे अब वह मंत्री के रूप में देखकर हैरान और थोड़ा सा परेशान हैं. उन्हें इस आदमी के हाथों में भारतीय रेल का भविष्य सुरक्षित नजर नहीं आ रहा है और वे आपस में यह भी कहते सुने जा रहे हैं कि यह आदमी भारतीय रेल को स्क्रेप में बेच डालेगा. रेलवे बोर्ड में पिछले हफ्ते जो हुआ उससे तो यही संकेत मिल रहा है.

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उत्तरदायित्वविहीन जिम्मेदारी का निर्वाह
नहीं किया जा सकता है - यू. एस. झा

एआईआरपीएफए का महाधिवेशन संपन्न
एस. आर. रेड्डी बने राष्ट्रीय अध्यक्ष

नई दिल्ली : आल इंडिया रेल सुरक्षा बल संगठन (एआईआरपीएफए) का तीन दिवसीय 19 वां वार्षिक महाअधिवेशन 22 से 24 मार्च को आरपीएसएफ ग्राउंड, शकूर बस्ती, नई दिल्ली में संपन्न हुआ. इस अवसर पर उदघाटन सत्र में मंच पर आरपीएफ के महानिदेशक (डीजी) श्री प्रदीप कुमार मेहता सहित आरपीएफ के सभी अधिकारी विशेष रूप से उपस्थित थे. सभा की अध्यक्षता संगठन के अध्यक्ष श्री के. कलईअरसन ने की. संगठन के महासचिव श्री यू. एस. झा ने डीजी श्री प्रदीप कुमार मेहता का माला पहनकर, शाल ओढाकर और प्रतीक चिन्ह देकर विशेष सम्मान किया. इस अवसर पर एनएफआईआर के महासचिव श्री एम. राघवैया, एआईआरएफ के महामंत्री कामरेड शिवगोपाल मिश्रा, आईआरपीओएफ के महासचिव श्री जीतेन्द्र सिंह सहित रेल सुरक्षा बल संगठन के कोषाध्यक्ष श्री धरमवीर सिंह, उपाध्यक्ष श्री बिश्नोई, श्री विजय सिंह, म. रे. से श्री एस. आर. रेड्डी, प. रे. से श्री भगवत शर्मा, द. पू. रे. से श्री प्रमोद कुमार, पू. उ. रे. से श्री ए. के. तिवारी, उ. प. रे. से श्री के. एल. बिश्नोई, पू. म. रे. से श्री संजय सिंह, एन. एफ. आर. से श्री सुदीप भट्टाचार्य, उ. म. रे. से श्री ओमप्रकाश आदि सहित देश भर से आए करीब पांच हजार आरपीएफ जवान उपस्थित थे.

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'कक्कू भाई' तय करते हैं निर्माण संगठन की कार्य-प्रणाली

साल भर बाद तीन लाइनें ओपन लाइन को सुपुर्द

हाजीपुर : पू. म. रे. निर्माण संगठन में जातिगत आधार और जातिगत जुगाड़ तथा अपने रिश्तेदारों को ठेकेदार बनाना या किसी अन्य ठेकेदार के नाम पर कार्य देना अथवा ठेकेदार के निर्देश पर वरिष्ठ अधिकारियों और अधीनस्थ कर्मचारियों की पोस्टिंग करना, उनका स्थानान्तरण कर देना, अगर ठेकेदार को गलत या मनचाहा बिल, यदि काम नहीं किया है तो भी, नहीं देना, बहुत बड़ा गुनाह माना जाता है. वर्तमान माहौल में पू. म. रेल के इंजीनियरिंग विभाग में रेल का हित सोचना भी बहुत बड़ा गुनाह है. इसके विपरीत यदि आप ठेकेदार को नमस्ते करते हैं और उसकी हर बात मानते हैं, उसको मनचाहा बिल बनाकर देते हैं, तो आपकी मनचाही पोस्टिंग और महाप्रबंधक अवार्ड तय है. और अगर आपने ठेकेदार की बात नहीं मानी है और रेल हित में रात-दिन एक करके मानक कार्य पूरा किया है, तो भी आपको किसी न बहाने से चार्जशीट मिलना तय है. यदि फिर भी आप पर चढ़ा रेल हित का बुखार नहीं उतरा, तो आपको दंड मिलना निश्चित है. कर्मचारियों का तो यहाँ तक कहना है कि सच तो यह है कि वर्तमान में कुछ खास ठेकेदार ही पू. म. रेलवे निर्माण संगठन को चला रहे हैं और जिसकी सामत आई हो वह इन ठेकेदारों के आदेश को नहीं माने खास कर 'कक्कू भाई' का..

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"भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन"

एक लम्बे अंतराल के बाद 'रेलवे समाचार' द्वारा पिछले कई सालों से चली आ रही अपनी परंपरा का निर्वाह करते हुए इस बार एक नए और अयंत महत्वपूर्ण मगर एकदम समसामयिक विषय पर राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है. इस बार का विषय है "भारतीय रेल का पुनरुत्थान - एक चिंतन" (RESURRECTION OF INDIAN RAILWAYS - AN INTROSPECTION). इस बार इस महत्वपूर्ण और समसामयिक सेमिनार में भारतीय रेल के पांचो मान्यताप्राप्त फेडरेशनों के उच्च पदाधिकारियों सहित रेलवे बोर्ड के सभी सदस्यों और जोनल रेलों के महाप्रबंधकों को भी आमंत्रित किया गया है. इसके अलावा बाहर से भी कुछ रेल विशेषज्ञों को इसमें शामिल होने हेतु बुलाया गया है. इस बार यह सेमिनार वाई. बी. चव्हाण प्रतिष्ठान सभागृह, जनरल जगन्नाथ भोसले मार्ग, मंत्रालय के पास, नरीमन पॉइंट, मुंबई - 21 में आयोजित किया जा रहा है.

उल्लेखनीय है कि इससे पहले 'रेलवे समाचार' द्वारा "पब्लिक सेमिनार ऑन रेलवे सेफ्टी", "प्रिडीकामेंट ऑफ़ सबर्बन रेल यूजर्स इन मुंबई", "रोल ऑफ़ विजिलेंस आर्गनाइजेशन इन रेलवे सिस्टम", "इकनामिक वायबिलिटी थ्राफ डेवलपमेंट ऑफ़ नान-कन्वेंशनल रिवेन्यु रिसोर्सेस ऑफ़ इंडियन रेलवेज" जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर मुंबई और पटना में कई सेमिनारों का आयोजन किया जा चुका है, जिनमे रेलवे के उच्चाधिकारियों सहित यात्री संगठनो और बाहरी रेल विशेषज्ञों ने भाग लेकर अपने सुविज्ञ विचारों को प्रस्तुत किया था. यह सेमिनार भारतीय रेल की सेफ्टी, सिक्योरिटी, सतर्कता, इंजीनियरिंग, ट्रांसपोर्टेशन और आर्थिक मजबूती जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर आधारित थे.

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हरित उत्पादों की ओर कदम बढ़ाती भारतीय रेल

भारतीय रेल ने 19 और 20 मार्च 2012 को नई दिल्ली में वरिष्ठ रेल अधिकारियों के लिए 'ग्रीन पब्लिक प्रोकरमेंट' (जीपीपी) पर आयोजित दो दिवसीय कार्यशाला का आयोजन करके स्थिर विकास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है. संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने स्विच-एशिया की एक सहयोगी संस्था की नीति के अन्तर्गत इस कार्यशाला का आयोजन किया था. कार्यशाला में यूरोप में ग्रीन प्रोकरमेंट सम्बन्धी नीतियों एवं चलन पर विचार करने के साथ-साथ भारतीय रेल पर जीपीपी के क्रियान्वयन की चुनौतियों पर भी चर्चा की गई. यूएनईपी / ईयू, ब्रिटेन, स्विटज़रलैण्ड और भारत के अनेक विशेषज्ञों ने जीवन चक्र विश्लेषण (लाइफ साइकल एनलेसिस) तथा ईको - लेबलिंग जैसे ग्रीन प्रोकरमेंट उपकरणों एवं तरीकों पर चर्चा करने के अपने अनुभव भी बताए.

अपने संक्षिप्त वक्तव्य में अतिरिक्त सदस्य रेलवे भण्‍डार (एएम/आरएस) श्री ए. के. सिंह ने कहा कि भारतीय रेल देश के नागरिकों एवं भावी पीढ़ी के प्रति अपने दायित्वों को बखूबी समझती है. उन्होंने कहा कि ग्रीन पब्लिक प्रोकरमेंट पर कार्यशाला के आयोजन से भारतीय रेल ने पर्यावरण एवं समाज को उसके धन का सही मूल्य प्रदान करने सम्बन्धी अपनी प्रतिबद्धता साबित की है. उन्होंने इस अवसर पर समूची रेल बिरादरी का आह्वान करते हुए कहा कि वे अपने समय की आवश्यकताओं के अनुसार ऐसे निर्णय लें जिससे पर्यावरण पर न्यूनतम नकारात्मक प्रभाव पड़े.

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तीव्रगामी रेल से ही कम हो सकती है भीड़

भारतीय रेल की हालत 'भेड़िया धसान' की जैसी हो रही है, बल्कि यह कहना शायद ज्यादा सही होगा की हो गई है. 'भेड़िया धसान' वह स्थिति है जब बहुत सारे भेड़िए किसी संकट की आशंका से एक ही मांद में ठुंस जाते हैं. भारतीय रेल के जनरल और स्लीपर कोचों की हालत कुछ ऐसी ही हो रही है. और अब तो यह हालत थ्री एसी कोचों की भी होने लगी है, जबकि सुबह-शाम के पीक आवर में मुंबई की लोकल ट्रेनों में भीड़ की हालत तो 'भेड़िया धसान' से भी ज्यादा बदतर हो रही है. समय पर टिकट का न मिलना, टिकट खिड़कियों पर हर वक़्त लम्बी-लम्बी कतारों का लगा रहना यात्रियों के कीमती समय की बर्बादी तो है ही, बल्कि त्योहारों और छुट्टियों के सीजन में प्रत्येक ट्रेन की सामान्य क्षमता से कहीं ज्यादा प्रतीक्षा सूची (वेटिंग लिस्ट) का होना इस बात का प्रमाण है कि भारतीय रेल में भीड़ की स्थिति 'भेड़िया धसान' से भी ज्यादा बदतर हो गई है. आरक्षण न मिलना, और अब तो चार-चार महीने पहले से लोगों को अपने यात्रा प्रोग्राम बनाने के लिए मजबूर होना, मतलब यह कि भारतीय रेल में यात्रा करने की कल्पना करके ही रोंगटे खड़े कर देने वाली स्थिति आँखों के सामने लहराने लगती है.

रेल यात्रियों को अपनी यात्रा के दौरान लगभग हर कदम पर कठिनाईयों से जूझना पड़ता है. टिकट खिड़की से लेकर गंतव्य तक पहुँचने की उनकी यह तकलीफ त्योहारों और गर्मी की छुट्टियों में कई-कई गुना बढ़ जाती है. भारी कठिनाई के इस पीक सीजन में बच्चों, बुजुर्गों और बीमार परिजनों को लेकर भारतीय रेल में यात्रा करना एवरेस्ट की दुर्गम चोटियों पर चढ़ने से कम जोखिम भरा काम नहीं होता. शहर हमेशा से मनुष्य के आकर्षण का केंद्र रहे हैं. लेकिन ये शहर आज विकास के परिचायक बन चुके हैं. मनुष्य की रोजी-रोटी कमाने और प्रगति के इंजन बन चुके हैं आज ये शहर..! शहरों की मात्र पांच प्रतिशत जमीन पर दुनिया का आधा उत्पादन हो रहा है. ग्रामीण क्षेत्रों के मुकाबले शहरों में लोगों की आय और वस्तुओं का अधिक उपभोग जहाँ 'पुल-फैक्टर' का काम कर रहा है, वहीं गावों की गरीबी और बेरोजगारी 'पुश-फैक्टर' की भूमिका निभा रही है. यह दोनों 'फैक्टर' मिलकर न सिर्फ गावों को वीरान कर रहे हैं, बल्कि शहरों में भीड़ भी बढ़ा रहे हैं. अगर शहरों को गावों से तीव्रगामी रेल नेटवर्क के जरिए जोड़ दिया जाए, तो शहरों में बढती इस भीड़ को काफी कम किया जा सकता है. इससे लोग गाँव को छोड़े बिना भी अपनी आय को बढ़ा सकते हैं. इसके साथ ही खाद्यान्नों, फलों - फूलों और सब्जियों की आवाजाही भी सुगम होगी और ज्यादा बढ़ेगी भी, जिसका प्रभाव समूची अर्थ-व्यवस्था पर पड़ेगा.

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'ममता' के मोह को जल्दी त्यागो सरदार जी..!

रेल बजट के तुरंत बाद केंद्र की सत्ता में भागीदार तृणमूल कांग्रेस और उसकी अध्यक्ष पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने जिस तरह हमेशा की भांति अपनी घटिया तुनकमिजाजी दिखाते हुए सरकार को ब्लैकमेल करने की कोशिश की है, उसे अब कतई बर्दास्त नहीं किया जाना चाहिए. केंद्र सरकार को चाहिए कि वह अब ममता बनर्जी के प्रति अपनी 'ममता' का फ़ौरन त्याग करे. ममता बनर्जी चाहती हैं कि एक साफ-सुथरी छवि वाले रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी को हटाकर एक ख़राब छवि वाले मुकुल राय को रेलमंत्री बना दिया जाए. कोलकाता की लिलुआ और कचारापारा रेलवे वर्कशाप से स्क्रेप की 'खरीदारी' कर-करके कथित राजनेता बन गए किसी व्यक्ति को यदि रेल महकमा थमा दिया गया तो यह निश्चित मान लिया जाना चाहिए कि वह व्यक्ति पूरी रेल को स्क्रेप में बेच डालने में कोई कोताही नहीं करेगा. इसके अलावा रेलवे के ही किसी स्क्रेप 'खरीदार', यहाँ 'खरीदार' का सन्दर्भ 'चोर' से लिया जाना चाहिए, क्योंकि कोई भी स्क्रेप खरीदार चोरी करने से कभी बाज नहीं आता है, को रेलमंत्री के रूप में यह देश कतई बर्दास्त नहीं करेगा. इसके साथ ही रेलवे के करीब 14 लाख रेलकर्मचारी और अधिकारी भी मुकुल राय को रेलमंत्री के रूप में नहीं देखना चाहते हैं. इस सन्दर्भ में रेलवे की पांचो फेडरेशनो ने दिनेश त्रिवेदी को रेलमंत्री बनाए रखने और उनके द्वारा की गई रेल किरायों में वृद्धि का समर्थन करते हुए प्रधानमंत्री को संयुक्त ज्ञापन भी दिया है. ममता बनर्जी लगातार केंद्र सरकार को ब्लैकमेल करती आ रही हैं. इस बार उन्होंने इसकी हद पार कर दी है. उन्होंने दिनेश त्रिवेदी को हटाकर मुकुल राय को रेलमंत्री बनाए जाने की एक चिट्ठी भी प्रधानमंत्री को भेजी है.

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रेलवे की सभी फेडरेशनो ने किया किरायों में वृद्धि का समर्थन

नई दिल्ली : भारतीय रेल की पांचो मान्यताप्राप्त फेडरेशनों ने रेल बजट में रेल यात्री किरायों में की गई बढ़ोत्तरी का समर्थन किया है. उन्होंने इस सन्दर्भ में गुरुवार, 15 मार्च को प्रधानमंत्री को दिए गए एक संयुक्त ज्ञापन में कहा है कि 14 मार्च को संसद में रेलमंत्री श्री दिनेश त्रिवेदी द्वारा पेश किए गए वित्त वर्ष 2012-13 के रेल बजट में की गई रेल किराए में वृद्धि का अपने पूरे दिलो-दिमाग से समर्थन करते हैं. इस तरह इन सभी रेल फेडरेशनों ने अप्रत्यक्ष रूप से श्री त्रिवेदी को रेलमंत्री पद पर बनाए रखे जाने का भी समर्थन किया है. इस संयुक्त ज्ञापन पर आल इंडिया रेलवेमेन्स फेडरेशन (एआईआरएफ) के महासचिव का. शिव गोपाल मिश्रा, नेशनल फेडरेशन ऑफ़ इंडियन रेलवेमेन (एनएफआईआर) के महासचिव श्री एम. राघवैया, फेडरेशन ऑफ़ रेलवे ऑफिसर्स एसोसिएशंस (एफआरओए) के महासचिव श्री शुभ्रांशु और आल इंडिया रेल सुरक्षा बल संगठन (एआईआरपीएफए) के महासचिव श्री यू. एस. झा तथा इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) के महासचिव श्री जीतेन्द्र सिंह ने हस्ताक्षर किए हैं. इसके अलावा मध्य रेलवे सहित सभी जोनल ग्रुप 'ए' ऑफिसर्स एसोसिएशंस ने भी इस सन्दर्भ में अलग से एक प्रस्ताव पारित करके प्रधानमंत्री को फैक्स किया है.

पांचो फेडरेशनों ने अपने इस संयुक्त ज्ञापन में कहा है कि रेल किराए में की गई वृद्धि न सिर्फ लम्बे अर्से से प्रतीक्षित थी, बल्कि आज इसकी सबसे ज्यादा जरूरत भी आन पड़ी है, क्योंकि रेलवे की आर्थिक स्थिति काफी नाजुक हो चुकी है. रेल बजट में रेल संरक्षा और रेलवे के आधुनिकीकरण पर भी जोर दिया गया है, जिससे अंततः भारतीय रेल में रोजाना सफ़र करने वाले दो करोड़ से ज्यादा रेल यात्रियों और इस देश की जनता को ही सुरक्षित, संरक्षित और सुविधापूर्ण यात्रा की सुगमता प्राप्त होगी. ज्ञापन में कहा गया है कि सभी रेलवे फेडरेशन रेल किराए में की गई वृद्धि को किसी भी प्रकार से वापस लिए जाने पर कतई सहमत नहीं हो सकते, क्योंकि इससे न सिर्फ रेल यात्रियों की सुरक्षा और संरक्षा बुरी तरह से प्रभावित होगी, बल्कि इससे रेलवे की वित्तीय स्थिति और स्थिरता पर भी भारी प्रभाव पड़ेगा. फेडरेशनों ने इस ज्ञापन में यह भी कहा है कि रेल किरायों की वापसी की भरपाई यदि सामान्य बजट से नहीं की जाती है, तो भारतीय रेल की पूरी व्यवस्था चरमराकर बैठ जाएगी. हालाँकि इन पाँचों फेडरेशनों ने भारतीय रेल के करीब 14 लाख रेलकर्मचारियों और अधिकारियों की मनोदशा का बयान अपने उक्त ज्ञापन में कर दिया है, तथापि व्यक्तिशः सभी रेलकर्मी बढाए गए रेल किरायों को वापस लिए जाने के ममता बनर्जी के तानाशाहीपूर्ण रवैये से बुरी तरह खफा हो गए हैं. इस मामले में सिर्फ रेलकर्मियों की ही नहीं, बल्कि देश के प्रत्येक नागरिक की पूरी सहानुभूति दिनेश त्रिवेदी के साथ हो गई है. इसके अलावा देश भर में कहीं भी बढाए गए रेल किराए के प्रति कोई जन-विरोध भी नहीं दिखाई पड़ा है. इसके लिए जनता पहले ही अपना मन बना चुकी थी.


केशव चंद्रा बने मेम्बर मैकेनिकल

शुक्रवार, 9 मार्च को होली के दूसरे दिन देर रात को करीब 1.30 बजे श्री केशव चंद्रा के मेम्बर मैकेनिकल (एमएम) के पद पर नियुक्ति के आर्डर जारी हो जारी हो गए. हालाँकि रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि डीओपीटी से यह आर्डर शाम को जारी हो गया था, मगर मंत्री जी के दिल्ली में न होने से उनकी अनुमति नहीं मिल पाई थी. इससे यह आदेश शाम को जारी नहीं हो पाया था. रात को करीब 12 बजे मंत्री जी के एयरपोर्ट से सीधे रेल भवन पहुँचने के बाद लगभग 1.15 बजे यह आदेश जारी हुआ और श्री चंद्रा ने तत्काल ज्वाइन कर लिया. श्री चंद्रा ने शनिवार, 10 मार्च को करीब 3 बजे दिल्ली पहुंचकर प्रत्यक्ष रूप से अपना चार्ज ग्रहण किया. श्री चंद्रा ईश्वर को मानने वाले और भक्त आदमी बताये जाते हैं, जीएम बनने से पहले श्री चंद्रा उ. रे. के अपर महाप्रबंधक पद पर कार्यरत थे. एनएफआर के महाप्रबंधक बनने से पहले रेलवे बोर्ड और अन्य रेलों में विभिन्न महत्वपूर्ण प्रशासनिक पदों पर काम करने का उन्हें गहन अनुभव प्राप्त है.

सूत्रों का कहना कि 14 मार्च को संसद में रेलवे बजट से पहले बोर्ड मेम्बर की पोस्ट को भर दिया गया है, जिसकी कोई आशा नहीं की जा रही थी. अगली जीएम पोस्टिंग होने तक श्री चंद्रा को ही जीएम/एनएफआर ओपन लाइन का कार्यभार भी सौंपा गया है, जबकि जीएम/एनएफआर/कंस्ट्रक्शन का अतिरिक्त कार्यभार जीएम/सीएलडब्ल्यू श्री राधे श्याम को दिया गया है. सूत्रों ने यह भी बताया कि जीएम/एनएफआर ओपन लाइन का अतिरिक्त कार्यभार पहले जीएम/मेट्रो श्री पी. बी. मूर्ति को दिए जाने की सिफारिश की गई थी, मगर इस पर शायद सहमति नहीं हो पाई और इसीलिए शायद यह आदेश जारी होने में भी देरी हुई. इसलिए अंत में यह काम पहले की भांति श्री चंद्रा को ही तब तक देखते रहने को कहा गया है, जब तक नए जीएम्स की पोस्टिंग नहीं हो जाती है. ज्ञातव्य है कि 29 फरवरी को श्री संजीव हांडा के रिटायर होने पर एमएम का अतिरिक्त कार्यभार मेम्बर इंजीनियरिंग (एमई) श्री ए. पी. मिश्रा को सौंपा गया था. रेलवे बोर्ड के सूत्रों का कहना है कि जीएम/एनएफआर/कंस्ट्रक्शन, जीएम/उ.रे., जीएम/उ.म.रे. और जीएम/एनएफआर ओपन लाइन की पोस्टों पर नियुक्ति रेलवे बजट के बाद ही हो पाएगी. इस प्रकार अब अगले एमएम के लिए जीएम/द.पू.म.रे. श्री अरुणेन्द्र कुमार का रास्ता साफ हो गया है.


म. रे. में दिसंबर 2012 तक पूरा हो सकता है
कन्वर्जन कार्य - सुबोध जैन

"मध्य रेलवे में इस साल दिसंबर 2012 के अंत तक डीसी-एसी कन्वर्जन का कार्य पूरा हो सकता है. फ़िलहाल यही लक्ष्य तय किया गया है. क्योंकि म. रे. के पास पर्याप्त संख्या में एसी रेक उपलब्ध नहीं हैं और इनके जल्दी उपलब्ध होने के आसार भी दिखाई नहीं दे रहे हैं, क्योंकि बम्बार्दियर के एसी रेक अगले साल के अंत तक आने की संभावना है." यह बात म. रे. के महाप्रबंधक (जीएम) श्री सुबोध कुमार जैन ने एक सवाल के जवाब में कही. श्री जैन म. रे. मुख्यालय में 28 फरवरी को प्रेस को संबोधित कर रहे थे. करीब चार महीने के कार्यकाल में श्री जैन की यह दूसरी प्रेस कांफ्रेंस थी. ऐसी खबर थी कि कल्याण-सीएसटी के बचे हुए खंड का कन्वर्जन कार्य जून 2012 तक पूरा करने का दबाव म. रे. पर रेलवे बोर्ड द्वारा बनाया जा रहा है, इस खबर के परिप्रेक्ष्य में एक प्रतिनिधि द्वारा पूछे गए सवाल पर श्री जैन ने न सिर्फ अपना उपरोक्त ईमानदारी भरा जवाब दिया, बल्कि यह क्यों नहीं हो पाएगा, इसका पूरा विवरण भी प्रेस को समझाया.

प. रे. द्वारा हर नई पहल कर लिए जाने के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में श्री जैन ने कहा कि म. रे. की तरह प. रे. में अलग-अलग लाइने नहीं हैं, प. रे. में एकदम सीधा कारीडोर है, जबकि म. रे. में हार्बर लाइन, ट्रांस हार्बर लाइन के अलावा अन्य कई तरह की साइड लाइने हैं, जिनका कन्वर्जन प. रे. की तरह आसान नहीं है. इसके अलावा प. रे. को सभी नए एसी सीमेंस रेक मिल गए हैं, जबकि म. रे. में अभी-भी बहुत से पुराने डीसी रेक हैं. उन्होंने इन पुराने रेकों को डीसी-एसी बनाए जाने की बात भी कही. लोकल रेकों में अवैध विज्ञापनों की भरमार और इससे उनके गंदे होने के सवाल पर श्री जैन ने इस समस्या पर तत्काल काबू पाने के लिए अपने मातहत सम्बंधित विभाग प्रमुख को आदेश दिया. ट्रेस पासिंग और खासतौर पर मुम्ब्रा स्टेशन के पास हाल ही में हुई दो मौतों पर हुए हंगामे की पृष्ठभूमि पर पूछे गए एक सवाल पर श्री जैन ने कहा कि जब तक राज्य सरकार रेलवे के साथ सहयोग नहीं करेगी, तब तक इस समस्या पर काबू पाना अकेले रेलवे के वश की बात नहीं है. उन्होंने बताया कि जहाँ तक संभव है, वहां तक ट्रेक के किनारे दीवार बना दी गई है और बाकी जगह बनाई जा रही है. इसके अलावा उन्होंने बताया कि ठाणे-कालवा के बीच ट्रैक की साइड में जगह न होने से लोग ट्रैक पर ही चलते नजर आते हैं, ऐसी जगहों के लिए उन्होंने राज्य सरकार को रेलवे की जमीन पर खम्भे बनाने की अनुमति देकर वहां स्काई वाक बनाए जाने का सुझाव दिया है. उन्होंने यह भी बताया कि इस कार्य के साथ ही अन्य कई कार्यों के लिए रेलवे द्वारा ली जाने वाली डिपाजिट में छूट दिए जाने का प्रावधान भी किया जा रहा है.

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कहाँ तक उचित है राज्यों का आरपीएफ
को पुलिस अधिकार दिए जाने का विरोध?

कुछ राज्यों ने रेल सुरक्षा बल (आरपीएफ) को पुलिसिया अधिकार दिए जाने और आरपीएफ एक्ट में संशोधन करने का विरोध किया है. इससे इस संशोधन विधेयक को संसद के बजट सत्र में प्रस्तुत नहीं किया जा रहा है. केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसे रेल मंत्रालय का मामला बताकर इससे अपना पल्ला झाड़ लिया है. रेल मंत्रालय भी इसे या तो चुपचाप पास करा लेना चाहता था अथवा इस पर सार्वजनिक बहस से बचना चाहता था. इसका दुष्परिणाम अब सामने है, क्योंकि गलतफहमियों के चलते कुछ राज्य इसके विरोध में खड़े हो गए हैं और इसे वह एनसीटीसी से जोड़कर देख रहे हैं. जबकि एनसीटीसी का पुरजोर विरोध करने वाली पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ही इस आरपीएफ एक्ट संशोधन विधेयक की सबसे बड़ी पैरोकार हैं. उन्हीं की पार्टी का सांसद रेलमंत्री भी है. यह अत्यंत दुर्भाग्य की बात है कि जो राज्य रेल संपत्ति और रेल यात्रियों, जो कि उन्हीं के नागरिक हैं, के जान-माल की सुरक्षा और रेल परिसरों में कानून-व्यवस्था कायम नहीं कर पा रहे हैं, वही अब रेल में एकल सुरक्षा की व्यवस्था कायम किए जाने का न सिर्फ विरोध कर रहे हैं, बल्कि इसे वे अपने पुलिसिया अधिकार क्षेत्र में केंद्र का अतिक्रमण भी मान रहे हैं.

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रेलमंत्री ने लाजवाब किया महाराष्ट्र के सांसदों को..

मुंबई : शुक्रवार, 2 मार्च को रेलमंत्री श्री दिनेश त्रिवेदी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री और सांसदों से रेल बजट सम्बन्धी चर्चा करने के लिए मुंबई आए थे. उनका मकसद रेल बजट में महाराष्ट्र के लिए किए जाने वाले प्रावधानों के सम्बन्ध में यहाँ के सांसदों की राय जानना था. विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मंत्रालय में इस सम्बन्ध में हुई बैठक के दौरान मुंबई के कुछ सांसदों ने कहा कि मुंबई का सबर्बन रेल सिस्टम फायदे में है, इसका किराया नहीं बढ़ाया जाना चाहिए. इस पर रेलमंत्री श्री त्रिवदी ने उनसे कहा कि इस सिस्टम से रेलवे को प्रतिवर्ष एक हज़ार करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ रहा है और मुंबई का सबर्बन रेल सिस्टम दुनिया का सबसे सस्ता रेल सिस्टम है. जहाँ प्रतिमाह 52 अप-डाउन जर्नी के लिए मात्र 18 या 20 अप-डाउन जर्नी का ही किराया लिया जा रहा है. ऐसे में वह यह कैसे कह सकते हैं कि इसका किराया नहीं बढ़ाया जाना चाहिए. और यदि वे यह मानते हैं कि यह सिस्टम लाभकारी है, तो वे (राज्य सरकार) ख़ुशी से इसे चलाने के लिए ले सकते हैं, वह इसे ख़ुशी-ख़ुशी उन्हें सौंपने को तैयार हैं. इस पर सांसदों का कहना था कि मध्य रेलवे का सबर्बन रेल सिस्टम घाटे में हो सकता है, मगर पश्चिम रेलवे तो इसमें फायदे में है. इस पर तुरंत रेलमंत्री ने तपाक से हाजिर जवाब देते हुए उनसे कहा कि वे पश्चिम रेलवे का ही सबर्बन सिस्टम ले लें..! इसके बाद बताते हैं कि सांसदों की बोलती बंद हो गई.

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कल्याण रेलवे स्कूल में बहाल हुई शांति..

करीब चार साल पहले मध्य रेलवे के तत्कालीन मंडल एवं मुख्यालय अधिकारियों और एक यूनियन के कुछ पदाधिकारियों तथा पूर्व प्राचार्य की मिलीभगत से लगभग बरबाद हो चुके रेलवे स्कूल कल्याण में फैली अशांति अब जाकर शांति में बहाल हो पाई है, जब यहाँ की प्राइमरी हेडमिस्ट्रेस (पीएचएम) का भी तबादला कर दिया गया है. उल्लेखनीय है कि इससे करीब दो साल पहले यहाँ के पूर्व प्राचार्य का तबादला दौंड के स्कूल में पद के साथ करके रेल प्रशासन ने इस स्कूल को कुछ हद तक बचाया था. तब जो कसर बाकी रह गई थी, वह अब पीएचएम को यहाँ से हटाकर पूरी की गई है. बताते हैं कि वह यहाँ से चार्ज छोड़ने से पहले बहुत सारे महत्वपूर्ण कागजात जलाकर गई हैं. और उनके जाने के बाद यह पता चला है कि वह यहाँ एक भी पीरियड पढ़ाने क्लास में कभी नहीं जाती थीं, जबकि नई पीएचएम नियमानुसार न सिर्फ खुद हफ्ते में 18 पीरियड पढ़ा रही हैं, बल्कि उन्होंने बाकी सभी प्राइमरी टीचर्स को नियमानुसार हफ्ते में 32 पीरियड पढ़ाने की ड्यूटी लगा दी है. बताते हैं कि यह ड्यूटी लगाए जाने के बाद ही यह राज तब खुला जब प्राइमरी टीचर्स ने वर्तमान पीएचएम से शिकायती लहजे में कहा कि 'मैडम' तो उनसे हफ्ते में सिर्फ 10-12 पीरियड ही पढवाती थीं..! इससे अब यह भी साफ हो गया है कि इस बचे हुए बहुत सारे समय का 'सदुपयोग' पूर्व पीएचएम द्वारा स्कूल में अशांति फ़ैलाने और बाहरी तत्वों को बुलाकर अपने चेंबर में पंचायत करने के लिए किया जाता था.

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ऐसे तो कभी एमएस नहीं बन पाएँगे आईआरपीएस

इंडियन रेलवे पर्सनल सर्विस (आईआरपीएस) को भारतीय रेल में आए (इंट्रोड्यूस) हुए करीब 30-32 साल हो गए हैं, मगर रेलवे बोर्ड में इसके लिए शीर्ष स्तर पर बनाए गए मेम्बर स्टाफ (एमएस) के पद पर आजतक एक भी आईआरपीएस अधिकारी नहीं पहुँच पाया है. इसका मुख्य कारण आईआरपीएस अधिकारियों का अपनी पोस्टिंग्स को लेकर निहितस्वार्थ में अटका रहना बताया जाता है और इसके लिए उन्हें ही जिम्मेदार माना जाता है. देखने में आया है कि कुछेक को छोड़कर ज्यादातर आईआरपीएस अधिकारी दिल्ली में ही बने रहना पसंद करते हैं अथवा अन्य बड़े शहरों से अन्यत्र जाना पसंद नहीं करते हैं. बताते हैं कि दिल्ली में जो करीब 60-70 आईआरपीएस अधिकारी काफी लम्बे अर्से से बने हुए हैं, वह न तो दिल्ली से बाहर जाना चाहते हैं और न ही किसी अन्य को दिल्ली आने देना चाहते हैं. शायद इन्हीं के लिए यह जुमला चल निकला है कि 'दिल्ली में इन्हें तो एक स्टूल भी अगर बैठने को मिल जाए तो ये उसी में खुश हैं.'

दिल्ली में रेलवे बोर्ड और उत्तर रेलवे सहित अन्य पीएसयू में लम्बे अर्से तक घूम-फिरकर बने रहने वाले आईआरपीएस अधिकारियों को फील्ड में काम करने का अवसर न मिलने से उन्हें अपने काम सहित रेलवे के कामकाज की पर्याप्त जानकारी और अनुभव नहीं मिल पाता है. इसके अलावा डिवीजनो में नीचे स्तर से काम न करने वाले आईआरपीएस अधिकारियों को एडीआरएम और डीआरएम भी नहीं बनाया जा सकता. डिवीजनो में जब रेलवे के कामकाज का पर्याप्त अनुभव नहीं होगा, तो इस पदों पर उनकी नियुक्ति भी नहीं की जा सकती है. जब कोई अधिकारी (आईआरपीएस) डिवीजनो में एडीआरएम/डीआरएम नहीं बनेगा, तो उसे महाप्रबंधक (जीएम) बनाए जाने का भी कोई औचित्य नहीं होगा. और जब कोई अधिकारी जीएम नहीं बनेगा तो मेम्बर स्टाफ बनने की भी योग्यता वह हासिल नहीं कर पाएगा. यही वजह है कि आजतक कोई भी आईआरपीएस अधिकारी जीएम बनने तक की योग्यता हासिल नहीं कर पाया है.

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दो कार्पोरेट घरानों के झगड़े में जूनियर
ट्रैफिक अधिकारियों की भारी मुसीबत

आखिर कब तक जारी रहेगी सीनियर्स की गलतियों को
छिपाने के लिए जूनियर्स की बलि चढ़ाने की परंपरा..

सम्पूर्ण घोटाले को घोल डालने के लिए जाँच
कार्रवाई को मोड़ा जा रहा है गलत दिशा में...

कोलकाता : पिछले हफ्ते सीबीआई ने कुछ रेल अधिकारियों के यहाँ छापे मारे, जिसकी चर्चा बड़े पैमाने पर हुई है. चर्चा यह हो रही है कि दो कार्पोरेट घरानों की लड़ाई में न सिर्फ जूनियर और मामले से असम्बद्ध रेल अधिकारियों की भारी मुशीबत हो रही है और उन्हें अकारण परेशान किया जा रहा है, बल्कि इस तरह से सारे मामले को घोलकर हल्का करके उस दौरान इन मामलों में वास्तविक रूप से लिप्त रहे कुछ सीनियर ट्रैफिक अधिकारियों को बचाने की भी साजिश की जा रही है. इसके अलावा कोलकाता सीबीआई के एक वरिष्ठ अधिकारी, जो कि एक विजिलेंस अधिकारी की बैचमेट हैं, को प्रभावित और दिग्भ्रमित करके सीबीआई की जाँच मुहिम को गलत दिशा में मोड़ दिए जाने की भी चर्चा हो रही है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार जिन मामलों में सीबीआई द्वारा जाँच की जा रही है और जिनके सम्बन्ध में हाल ही में कुछ जूनियर ट्रैफिक अधिकारियों के यहाँ सीबीआई द्वारा छापे की कारवाई की गई है, बताते हैं कि उनके समय में यह मामला हुआ ही नहीं था अथवा इन मामलों में यह अफसर कहीं शामिल ही नहीं थे. बल्कि जहाँ तक रश्मि ग्रुप के मामले की बात है, तो उस समय जो अधिकारी ईडी/आरएम कोलकाता था, वह आज सीओएम है और तत्कालीन दो सीओएम सेवानिवृत्त हो चुके हैं. जबकि उस समय जो सीएफटीएम थे, उनमे से एक आज वहीं कोलकाता में सीपीटीएम और दूसरा बिलासपुर में आउट ऑफ़ टर्न सीओएम बनकर मौज कर रहे हैं. इन पर किसी की नजर नहीं है, क्योंकि इन पर 'बिग बास' की मेहरबानी बताई जाती है.

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सुरक्षित नहीं है रेल यात्रियों का सफर

डा. काकोडकर समिति ने कई विषयों पर चिंता जताई..
रेल यात्रियों से ज्यादा रेल कर्मचारियों की मौत...

नई दिल्ली : परमाणु वैज्ञानिक डा. अनिल काकोडकर की अध्यक्षता वाली उच्चाधिकार प्राप्त समिति की रिपोर्ट आ गई है. डा. काकोडकर ने शुक्रवार 17 फरवरी को यह रिपोर्ट रेल भवन, नई दिल्ली में रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी को सौंपी. जिसमे स्पष्ट रूप से कहा गया है कि रेल यात्रियों का सफ़र सुरक्षित नहीं है. समिति ने अपनी रिपोर्ट में रोजाना लगभग दो करोड़ यात्रियों को सुगम यातायात सुविधा प्रदान करने वाली भारतीय रेल की बहुत ख़राब छवि प्रस्तुत की है. खराब ट्रैक, असुरक्षित डिब्बे, बरसों पुराने पुलों के साथ रेलवे सुरक्षित यात्रा का दावा कर रही है. डेढ़ सौ पेज से ज्यादा की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि जल्दी ही कुछ नहीं किया गया तो रेल यात्रा और ज्यादा असुरक्षित हो सकती है. उल्लेखनीय है कि पिछले साल कालका मेल हादसे के बाद मचे हंगामे के मद्देनजर इस समिति का गठन किया गया था. समिति ने हर साल नई ट्रेनों की घोषणा की प्रवृत्ति पर भी एतराज किया है. समिति ने कहा है कि राजनीतिक वजहों से बिना लाइन क्षमता बढ़ाए खतरनाक ढंग से हर साल ट्रेनों की संख्या बढ़ाई जा रही है. समिति ने आगाह किया है कि बिना क्षमता बढ़ाए अब एक भी नई ट्रेन नहीं चलाई जानी चाहिए. समिति ने वैगन और कोचों के रखरखाव के लिए अनेक कारखानों की स्थापना की सलाह दी है और कहा है कि इन्हें युद्धस्तर पर लगाया जाए. समिति ने रेलवे बोर्ड के पुनर्गठन के लिए अलग विशेषज्ञ समूह गठित करने का सुझाव भी दिया है.

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ऐसी होगी सीआरएस जाँच तो कैसी होगी रेल संरक्षा ?

मुंबई : भारतीय रेल की अति विशिष्ट ट्रेन मुंबई राजधानी में गत सप्ताह फिर एक और अग्नि कांड हो गया. इस बार भी इसकी पैंट्री कार में ही शार्ट सर्किट से आग लगी और इस बार भी यह आग तब लगी जब सुबह करीब 4.30 बजे यह ट्रेन कोटा डिवीजन से गुजर रही थी. इस बार भी इसमें कोई शक की गुंजाइश नहीं है कि यह आग विद्युत उपकरणों की खराबी से शार्ट सर्किट से लगी और यह गुंजाइश तब भी नहीं थी, जब 18 अप्रैल 2011 को भी इसकी पैंट्री कार में तब आग लगी थी जब यह ट्रेन कोटा डिवीजन के नागदा-कोटा सेक्शन के विक्रमगढ़ आलोट और थुरिया स्टेशनों (किमी. 743/18-20) से रात को 2.08 बजे गुजर रही थी, मगर सीआरएस की जाँच में इसे पैंट्री कार स्टाफ की लापरवाही साबित करके पैंट्री कार के विद्युत चूल्हे में चढ़े भगोने में उबलते तेल की वजह से लगी होना साबित करके पैंट्री स्टाफ को बलि का बकरा बनाकर आईआरसीटीसी की निंदा की गई, क्योंकि कोई नहीं चाहता था कि इस आग की जिम्मेदारी उसके विभाग पर आए और इससे उसकी आगे की तरक्की में कोई बाधा पहुंचे.

गत सप्ताह भी मुंबई राजधानी की पैंट्री कार में शार्ट सर्किट से लगी आग के कारण कोई यात्री हताहत नहीं हुआ. हालाँकि 18 अप्रैल 2011 को लगी आग में एक यात्री गंभीर और दो यात्री सामान्य रूप से घायल हुए थे, जबकि पैंट्री कार स्टाफ ने लगभग 150 यात्रियों की जान अपनी जान पर खेलकर बचाई थी, जिन्हें 5 दिसंबर को श्यामगढ़ पुलिस ने न सिर्फ बयान लेने के बहाने बुलाकर गिरफ्तार कर लिया बल्कि रतलाम रेलवे कोर्ट में पेश करके उन्हें जेल भी भेज दिया. जहाँ वकीलों की हड़ताल के कारण उन्हें सत्र अदालत से 13 दिसंबर को जमानत नहीं मिलने पर 20 दिसंबर को हाई कोर्ट से जमानत मिल पाई. बताया जाता है कि थाना प्रभारी श्यामगढ़ ने इन तीनो पैंट्रीकार स्टाफ पर रेलवे एक्ट की धारा 151 और पब्लिक प्रापर्टी एक्ट की धारा 4 के तहत मामला दर्ज किया था और सीआरएस की अंतिम जाँच रिपोर्ट को अपनी इस कार्रवाई का आधार बनाया है. जबकि सैकड़ों यात्रियों कि जान बचाने के लिए इस पैंट्री स्टाफ को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया था.

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बोर्ड के हाथों बिका हुआ है 'इरपोफ़' का नेतृत्व?

चाहे लेपटाप की जगह नोट बुक की बात हो, चाहे जेएजी एडहाक को फर्स्ट एसी पास (ओआरएस या ऑन ड्यूटी पास) की बात हो, चाहे 50 : 50 परसेंट कोटे की बात हो, चाहे 5400 ग्रेड पे की बात हो अथवा 80-20 प्रतिशत अपग्रेडेशन गंवाने की बात हो, डीपीसी में देरी की बात हो अथवा उसमे हो रही जोड़-तोड़ की बात हो, मिस्लेनिअस कैडर की बात हो अथवा जनसंपर्क अधिकारियों को ट्रैफिक कैडर में मिलाने की बात रही हो, ऐसे तमाम मामले गिनाए जा सकते हैं, जहाँ इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (इरपोफ़) का नेतृत्व न सिर्फ बुरी तरह फेल हुआ है, बल्कि उसने रेलवे बोर्ड के साथ साठगाँठ भी की है, बल्कि यह कहना शायद ज्यादा सही होगा कि रेलवे बोर्ड ने उसे खरीद लिया अथवा पटा लिया है और वह पूर्व सीआरबी की चापलूसी में यह तक नहीं समझ पाया कि उक्त सीआरबी अपनी पूरी नौकरी के दौरान हमेशा ग्रुप 'बी' अफसरों के खिलाफ रहा था. वह तो अच्छा हुआ कि इस महा-काईंयाँ अधिकारी की बतौर एमटी/सीआरबी नियुक्ति को 'रेलवे समाचार' द्वारा कोर्ट में चुनौती दे दी गई, वरना अपनी चापलूसी में अँधा होकर इरपोफ़ नेतृत्व इसकी सेवानिवृत्ति पर इसको भी 'रंगीन विदाई' देने की तैयारी कर था.

लेपटाप की जगह नोट बुक दिए जाने की बात पर ही सर्वप्रथम इरपोफ़ को और तमाम प्रमोटी अफसरों को चुल्लू भार पानी में डूब मरना चाहिए और इसके बाद रेलवे बोर्ड को भी, क्योंकि उसकी अपनी कथनी और करनी में हमेशा अंतर ही देखने को मिलता है? जिस सीआरबी से वर्तमान इरपोफ़ नेतृत्व ने यह बात मनवाई, वह और तमाम उच्च अधिकारी हमेशा यह कहने से नहीं चूकते रहे हैं कि वे अधिकारियों में कोई भेदभाव नहीं मानते हैं. वह यह भी दावा करते रहे हैं, खुद इरपोफ़ की मीटिंग्स में आकर भी, कि ग्रुप 'बी' अधिकारी रेलवे की रीढ़ हैं.. तब इस तथाकथित रीढ़ को वे कमजोर और निरीह बनाकर क्यों रखते हैं? क्यों इनके साथ सौतेला व्यवहार करते हैं? जब सब अधिकारी और उनके अधिकार भी एक समान हैं, तो फिर कोई भी वस्तु उन्हें अलग-अलग प्रकार की और कम स्तर की क्यों दी जाती है? और इरपोफ़ नेतृत्व ने इस पर समझौता क्यों और किस मज़बूरी में किया है? जब सभी अधिकारी एक समान हैं तो उन्हें एक समान लेपटाप क्यों नहीं दिए गए? अगर बोर्ड अथवा वह सीआरबी, जिसकी चापलूसी की जा रही थी, यह बात मानने को तैयार नहीं थे, तो इरपोफ़ ने नोट बुक रूपी यह झुनझुना लेने की बात मानकर तमाम प्रमोटी अफसरों की नाक क्यों कटवाई? इन सारी बातों को जानने का अधिकार करीब 9000 प्रमोटी अफसरों को है.

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सारे आरोप बेबुनियाद हैं -हिंद एनर्जी

'रेलवे समाचार' की इस वेब साईट पर "हिंद एनर्जी और विमला लाजिस्टिक्स को ट्रैफिक अधिकारियों का संरक्षण" तथा दि. 1 से 15 दिसंबर 2011 के प्रिंट एडीशन में "क्यों पाला जा रहा है हिंद एनर्जी और विमला इन्फ्रास्ट्रक्चर को?" शीर्षक से प्रकाशित खबर पर 'हिंद एनर्जी एंड कोल बेनिफिकेशन (इंडिया) लि.' ने 'रेलवे समाचार' को एक क़ानूनी नोटिस भेजकर उपरोक्त खबर में प्रकाशित तथ्यों अथवा आरोपों को बेबुनियाद बताया है. कंपनी का कहना है कि रेलवे/ट्रैफिक अफसरों द्वारा कंपनी को नियमों के विपरीत करोड़ों का लाभ पहुँचाने, कोयले की लोडिंग/अनलोडिंग और ब्रोकरेज में कंपनी के इन्वाल्व होने, गैर-क़ानूनी तरीके से बिना आवश्यक और उचित अनुमति लिए कंपनी द्वारा रेलवे साइडिंग से कोयले की लोडिंग करने, करीब 700 करोड़ रु. की लागत से कंपनी द्वारा कोल वासरी लगाए जाने, अधिक दर पर कंपनी द्वारा सरकारी पावर हाउसों को धुले हुए कोयले की आपूर्ति करने और कंपनी में झारखण्ड के एक पूर्व मुख्यमंत्री का निवेश होने आदि जैसे तथ्य और आरोप एकदम मनगढ़ंत और बेबुनियाद हैं.

कंपनी ने अपनी इस नोटिस में यह भी स्पष्ट किया है कि उसकी एक कोल वासरी है, जिसमे कंपनी द्वारा अपने ग्राहकों की जरूरत के मुताबिक उनके लिए सामान्य एवं न्यूनतम दरों पर कोयले की धुलाई की जाती है. पिछले वित्त वर्ष 2010-11 में कंपनी का कुल कारोबार 12 करोड़ रु. रहा है. नोटिस में कंपनी ने स्पष्ट किया है कि वह कोयले की ब्रोकरेज के धंधे में कभी-भी नहीं थी. कंपनी का कहना है कि लोडिंग/अनलोडिंग गतिविधियाँ कंपनी के लाजिस्टिक आपरेशंस का हिस्सा हैं. कंपनी का कहना है कि उसने रेलवे साइडिंग लाइन नंबर - 7, एक्सचेंज यार्ड, एनटीपीसी, गटोरा के इस्तेमाल हेतु दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे की कम्पीटेंट अथोरिटी से प्रायरिटी-डी के तहत कोयले की लोडिंग के लिए आवश्यक अनुमति (Letter No. C/SECR/BSP/SDG/COAL/CO-USER/6352, Dated 30.09.2010) ली हुई है. कंपनी ने यह भी स्पष्ट किया है कि इसके अतिरिक्त उपरोक्त साइडिंग से अन्य कई फर्में/कम्पनियाँ भी इस प्रकार का कार्य कर रही हैं. कंपनी का कहना है कि उसके कोल वासरी प्लांट की कुल स्थापना लागत करीब 7.50 करोड़ रु. है. कंपनी का कहना है कि उसने किसी भी सरकारी पावर हाउस को गैर-क़ानूनी तरीके से धुले हुए कोयले की आपूर्ति (बिक्री) नहीं की है. कंपनी ने झारखण्ड के किसी भी पूर्व मुख्यमंत्री द्वारा कंपनी में किसी भी प्रकार से एक भी पैसे का निवेश किए जाने से स्पष्ट इंकार किया है. कंपनी का कहना है कि उसके मालिकान एक अच्छी छवि वाले उद्योगपति हैं. इसलिए उपरोक्त शीर्षक से मानहानिकारक खबर से उनकी छवि धूमिल हुई है. कंपनी का कहना है कि उपरोक्त शीर्षक खबर में प्रकाशित तथ्य अत्यंत भ्रामक और दिग्भ्रमित करने वाले हैं, जिन्हें जानबूझकर उसकी छवि धूमिल करने के उद्देश्य से प्रकाशित कराया गया है. कंपनी का कहना है कि वह कभी-भी 'दलाली' के बिजनेस में नहीं थी. अतः उसके लिए 'दलाल' शब्द का प्रयोग किया जाना अत्यंत मानहानिकारक और आपत्तिजनक है.

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मजारिटी से नहीं माइनारिटी से लिए जाते हैं निर्णय..

कोलकाता : इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन ( आईआरपीओएफ) की वार्षिक सर्वसाधारण सभा (एजीएम) और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानि पीपीपी पर सेमिनार यहाँ 26-27 दिसंबर को संपन्न हुआ. फेडरेशन के दोनों कार्यक्रम लगभग पूरी तरह फ्लाप रहे. क्योंकि एजीएम में करीब आधी से ज्यादा रेलों के प्रतिनिधि पहुंचे ही नहीं, और सेमिनार में ईडी/पीपीपी और एसडीजीएम/द.पू.रे. के अलावा कोई बड़ा अधिकारी न तो रेलवे बोर्ड से और न ही कोलकाता स्थित दोनों जोनल रेलों से आया. इसके अलावा सभी जोनल रेलों और उत्पादन इकाइयों से करीब 100 प्रतिनिधियों और पदाधिकारियों की उपस्थिति के बजाय एजीएम में कुल मिलाकर लगभग 50-55 लोग, वह भी परिवार सहित, ही उपस्थित थे. क्योंकि जो लोग आए भी थे उनमें सभी रेलों से 4-4 प्रतिनिधि और जोनल अध्यक्ष एवं महासचिव नहीं थे. साथ ही सभी उत्पादन इकाइयों के प्रतिनिधि भी नहीं आए थे. बताते हैं कि पहले दिन का खाना भी कुछ ठीक नहीं था और खाने वाले भी कम थे, जबकि दूसरे दिन सेमिनार के बाद लंच पर कुल करीब 55-60 लोग ही जुट पाए थे, जबकि मंच से दावा यह किया गया था कि पू. रे. से हमारे 18 अधिकारी आएँगे, जबकि पू. रे. में करीब 260 प्रमोटी अधिकारी हैं. मगर आए कुल 8 या 9 अधिकारी, जिनमे 4 प्रतिनिधि और 2 पदाधिकारी भी शामिल थे. पता चला है कि फेडरेशन का कोषाध्यक्ष भी इस एजीएम में नहीं आया. यह भी पता चला है कि उसने इस पद से अपना इस्तीफा दे दिया है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार पहले दिन अध्यक्ष की अनुमति से एजीएम की कार्यवाही शुरू हुई, जिसमे सर्वप्रथम सेक्रेटरी जनरल रिपोर्ट और कोषाध्यक्ष की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई. कोषाध्यक्ष की अनुपस्थिति में यह रिपोर्ट श्री अमेश कुमार ने रखी. बताते हैं कि इसमें सिर्फ चार रेलों को छोड़कर बाकी सभी पर बकाया दिखाया गया है. जबकि सेक्रेटरी जनरल रिपोर्ट में कुछ भी उल्लेखनीय नहीं था. प्राप्त जानकारी के अनुसार मध्य रेलवे के अध्यक्ष श्री आर. बी. दीक्षित के बाद पूर्व रेलवे के महासचिव श्री डी. एन. वर्मा ने कहा कि उनकी रेलवे पर दिखाया गया बकाया फर्जी है, क्योंकि प्रॉप मैगजीन और संलग्नता फीस के अलावा किसी मद को बकाया नहीं कहा जा सकता. इसके अलावा बताते हैं कि उन्होंने यह भी कहा कि संलग्नता फीस की मद में दी गई राशि को किसी अन्य मद में फेडरेशन द्वारा कैसे जमा किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि उनकी जोनल बॉडी की एजीएम में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया है कि प्रॉप और संलग्नता फीस के अलावा फेडरेशन को अन्य किसी मद में कोई राशि नहीं दी जाएगी. बताते हैं कि श्री वर्मा ने कहा कि क्या पीपीपी ही एक विषय बचा है सेमिनार करने के लिए, ग्रुप 'बी' की भलाई के किसी अन्य विषय पर क्यों नहीं सोचा जाता है? उन्होंने कहा कि पीपीपी पर अथवा ऐसे किसी अन्य विषय पर सेमिनार करने पर सभी रेलों ने विरोध किया था. फिर भी यह सेमिनार क्यों किया जा रहा है, यह उनकी समझ से परे है.

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ट्रैफिक कैडर में वरिष्ठों की अनदेखी..

मुंबई : भारतीय रेल के ट्रैफिक अधिकारियों में भारी असंतोष व्याप्त है. यहाँ वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों को अनदेखा करके कनिष्ठ अधिकारियों को विभाग प्रमुख के पदों पर बैठाया जा रहा है. जिस प्रकार कई रेलों में मुख्य परिचालन प्रबंधक (सीओएम) के पदों पर सीनियर ट्रैफिक अधिकारियों को दरकिनार करके उनसे जूनियर ट्रैफिक अधिकारियों को पदस्थ करने में वरीयता दी गई है, उसी प्रकार मुख्य वाणिज्य प्रबंधक (सीसीएम) के पदों पर भी यही प्रक्रिया अपनाई जा रही है. प्राप्त जानकारी के अनुसार कई रेलों में वरिष्ठ और कार्यक्षम ट्रैफिक अधिकारियों को नजरअंदाज करके अपेक्षाकृत अकार्यक्षम और भ्रष्ट, मगर चापलूस, ट्रैफिक अधिकारियों को सीओएम के पदों पर बैठाने में वरीयता दी गई है. बताते हैं कि अब यही प्रक्रिया सीसीएम के पदों पर भी अपनाई जा रही है. हालात यह हैं कि वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारी उपलब्ध होने और यहाँ तक कि सरप्लस होने के बावजूद सीओएम के पद पर बैठाए गए जूनियर ट्रैफिक अधिकारी को ही सीसीएम का भी अतिरिक्त कार्यभार सौंप कर रखा गया है. रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि इस मामले में सीआरबी के सामने एमटी की नहीं चल पा रही है. सूत्रों का कहना है कि एमटी एक सीधे-सादे अधिकारी हैं, इसलिए वह सीआरबी से इस बारे में कुछ बोल नहीं पा रहे हैं. जबकि सीआरबी अपने फेवरिट और चापलूस अधिकारियों का पूरा फेवर कर रहे हैं. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि एमटी की पोस्टिंग से मात्र एक हफ्ता पहले सीआरबी ने कई जोनो में अपने कई फेवरिट मगर जूनियर ट्रैफिक अधिकारियों को सीओएम और सीसीएम बनाकर बैठा दिया था. सूत्रों का कहना है कि रेलवे पर प्राइवेट और पीएफटी साइडिंग बनाने का जबरदस्त दबाव है, इसलिए जहाँ पर्याप्त लाइन क्षमता नहीं है, इसके बावजूद वहां भी धडाधड फाइल क्लियर की जा रही हैं. सूत्रों का कहना है कि इस 'फास्ट फाइल क्लियरिंग' के पीछे इन ट्रैफिक अधिकारियों का भी अपना निहित उद्देश्य है. उनका कहना है कि इसीलिए तो वहां 'उस टाइप' के अधिकारियों को एमटी की पोस्टिंग होने से पहले ही पदस्थ कर दिया गया था. सूत्रों का यह भी कहना है कि वर्तमान एमटी के आने से पहले ही रेलवे बोर्ड में भी कुछ जूनियर ट्रैफिक अधिकारियों को पदस्थ किया गया. यहाँ तक कि लम्बे समय से रेलवे बोर्ड में एक 'कलेक्शन सेंटर' बन गए एक जूनियर ट्रैफिक अधिकारी का कार्यकाल रेलवे बोर्ड में करीब 6 साल पूरा हो जाने के बाद भी सीआरबी ने उसे और दो साल का एक्सटेंशन (अपने कार्यकाल तक) इसलिए दे दिया है, क्योंकि डीआरएम में कार्यकाल के समय यह अधिकारी उनका सीनियर डीएसओ हुआ करता था. क्रमशः


राधेश्याम के साथ अन्याय, एफसी और तीन जीएम की पोस्टिंग

क्या होगा हाई लेवल सेफ्टी रिव्यू कमेटी की सिफारिश का..?

नयी दिल्ली : सोमवार, 26 दिसंबर को रेलवे बोर्ड ने तीन जीएम और एफसी की पोस्टिंग के आर्डर जारी कर दिए. इसके अनुसार एक बार फिर रेलवे बोर्ड के बाबुओं और कुछ निहितस्वार्थी तत्वों ने अपनी मनमानी कर ली है. जहाँ श्री अभय खन्ना के दावे को दरकिनार करके जीएम/एनएफआर/कंस्ट्रक्शन सुश्री विजयाकांत को फाइनेंस कमिश्नर/रेलवेज (एफसी/रेलवेज) बना दिया गया है, वहीँ मुख्य प्रशासनिक अधिकारी/निर्माण/उ.रे. (सीएओ/सी/उ.रे.) रहे श्री राधेश्याम (आईआरएसई) को ओपन लाइन, दक्षिण पश्चिम रेलवे, हुबली, में भेजे जाने के बजाय प्रोडक्शन यूनिट, चितरंजन लोकोमोटिव वर्क्स (सीएलडब्ल्यू), का महाप्रबंधक (जीएम) बनाकर भेज दिया गया है. जबकि स्टोर ऑफिसर श्री ए. के. मित्तल (आईआरएसएस) को ओपन लाइन, दक्षिण पश्चिम रेलवे, हुबली, का जीएम बनाया गया है और प्रधान मुख्य अभियंता (पीसीई) द. पू. रे. रहे श्री बी. पी. खरे (आईआरएसई) को बतौर जीएम डीजल लोकोमोटिव वर्क्स (डीएलडब्ल्यू) भेजा गया है.

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डीआरएम और जीएम बनने की पर्याप्त
जानकारी रखते हैं एकाउंट्स अधिकारी?

नयी दिल्ली : वर्तमान हाई लेवल सेफ्टी रिव्यू कमेटी की 5 दिसंबर की मीटिंग में चर्चा के दौरान इसके एजेंडा आइटम नंबर-9 पर अन्य किसी भी विभाग ने अपनी कोई प्रतिक्रिया नहीं दी मगर एफसी ने अपनी और अपने विभाग की 'विशेषज्ञता' दर्शाने के लिए यह अवश्य कह दिया की "रेलवे की जनरल पोस्टों पर काम करने के लिए 'ले-खा' विभाग (एकाउंट्स कैडर) के अधिकारियों को पर्याप्त जानकारी होती है." उल्लेखनीय है कि वर्तमान हाई लेवल सेफ्टी रिव्यू कमेटी की मीटिंग के एजेंडा और मिनिट्स के अनुसार कमेटी के आइटम नंबर-9 में स्पष्ट कहा गया है कि - "वर्तमान व्यवस्था में डीआरएम और जीएम जैसी पोस्टों को सभी विभागों के लिए खोल दिया गया है, जिन्हें न तो संरक्षा सम्बन्धी ट्रेन आपरेशंस का कोई अनुभव होता है, और न ही उनकी ऐसी कोई पृष्ठभूमि होती है, जिससे रेलों की संरक्षा बुरी तरह प्रभावित हुई है. पहले की व्यवस्था में इन पोस्टों पर सिर्फ तकनीकी और आपरेटिंग अधिकारियों को ही पदस्थ किया जाता था, उसे ही पुनः स्थापित किए जाने की जरूरत है..!" Agenda item-9.. "The present system of general posts like DRMs and GMs being thrown up to all departments who have no background or exposure in Safety-Related Train Operations has undermined safety in the Railways. The earlier system of only Operating and Technical Officers being considered for such posts need to be restored."

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व्यभिचार का अड्डा बना रेल भवन

नयी दिल्ली : भारतीय रेल का प्रतिष्ठित मुख्यालय 'रेल भवन' कुछ अधिकारियों के कदाचार और व्यभिचार का अड्डा बन गया है. बताते हैं कि यहाँ डिप्टी डायरेक्टर स्तर के कुछ अधिकारियों का एक गुट या गिरोह है, जो रेलवे बोर्ड में कार्यरत कुछ घाघ किस्म की महिला कर्मियों को अपने साथ मिलाकर व्यभिचार का एक बड़ा रैकेट चला रहा है. इस गुट का रिंग लीडर एक एएम स्तर का अधिकारी बताया गया है. विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि यह रिंग लीडर पहले यह देखता है कि कौन सी महिला कर्मी उसके जाल में आसानी से फंस सकती है. इसके बाद वह उसे किसी न किसी बहाने से अथवा कोई फाइल लेकर अपने चेम्बर में बुलाता है. फिर बड़े प्यार से उसे कुर्सी पर बैठने के लिए कहता है. फिर उसके लिए चाय-काफी का आर्डर करता है. इसी बीच वह उक्त महिला कर्मी के हाल-चाल पूछता है. परिवार में कौन-कौन है, शादी की है या नहीं, बच्चे कितने हैं, यह पूछकर उसके साथ अपनी आत्मीयता प्रदर्शित करता है. इसके बाद बड़ी मासूमियत के साथ धीरे से उसके शारीरिक गठन की तारीफ कर देता है. इसके बाद यदि महिलाकर्मी ने कोई जवाब नहीं दिया तो वह समझ जाता है कि उससे यह काम नहीं होगा और यदि महिला अपनी तारीफ सुनकर थोड़ी भी बेतकल्लुफ हो जाती है, तो वह आगे भी साहस करके शुरू हो जाता है, वाह.. वाह.. क्या बात है, दो बच्चे होने (या नहीं होने पर भी) के बाद भी आपने अपने को बहुत मेनटेन करके रखा है.. आप अपना और अपने फिगर का शायद बहुत ध्यान रखती हैं.. आपको अगर कोई परेशानी हो तो हमें बताना.. चलो कभी लंच पर चलते हैं.. और फिर यह कहते हुए कि चिंता मत करो, हम आपको घर पर ड्राप कर देंगे.. आदि-आदि.. से लेकर धीरे-धीरे यह बात और मुलाकात देर रात के डिनर और होटलबाजी तक पहुँच जाती है. सूत्रों कहना है कि इस रिंग लीडर का महिलाकर्मी को पटाने का यह सिलसिला कई दौर तक चलता रहता है, और अगर वह यह महसूस करता है कि यह काम उसके वश का नहीं है, तो वह यह काम अपने गुट के किसी अन्य साथी अधिकारी को अथवा गुट की ही किसी महिला सहकर्मी को सौंप देता है.

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सीआरबी और बोर्ड मेम्बर्स के नाम पर उगाही

कोलकाता : इंडियन रेलवे प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन द्वारा 27 दिसंबर को कोलकाता में पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप उर्फ़ पीपीपी पर किए जा रहे सेमिनार के लिए सीआरबी और रेलवे बोर्ड के अन्य मेम्बरों के नाम पर सभी जोनल रेलों के प्रमोटी अधिकारियों से लाखों रुपये की लगभग जबरन उगाही की जा रही है. इससे सभी जोनो के प्रमोटी अधिकारी खासे नाराज़ हैं. कई जोनो के प्रमोटी अधिकारियों ने बताया कि यह उगाही उनसे यह कहकर की जा रही है कि "सेमिनार में सभी बोर्ड मेम्बर और सीआरबी आने वाले हैं, उन्हें 'खिला-पिलाकर खुश' करना है, जिससे उनके अटके हुए काम जल्दी हो जाएँगे." उनका यह भी कहना था कि फेडरेशन को पैसा उगाही का माध्यम बना दिया गया है, जबकि दिल्ली में हुए पिछले सेमिनार में उगाहे गए लाखों रुपये का हिसाब अब तक नहीं दिया गया है. उनका कहना था कि इस मामले में दिल्ली में हुई पिछली कार्यकारिणी मीटिंग में भारी विवाद हो चुका है और इसका हिसाब मांगने वाले पदाधिकारी को एक सोची-समझी साजिश के तहत रेल प्रशासन की मिलीभगत से कुछ इस तरह उत्पीड़ित कर दिया गया है कि जिससे वह अब कोई हिसाब मांगने की जुर्रत न कर सके. इन प्रमोटी अधिकारियों ने बताया कि बिलासपुर में हुई पिछली वार्षिक सर्वसाधारण सभा (एजीएम) में 'एजीएम फंड' के नाम पर प्रत्येक जोनल एसोसिएशन से दस हज़ार और प्रोडक्शन यूनिट से चार हज़ार रुपये लिए जाने का प्रस्ताव पास कराया गया था, और यह तय किया गया था कि जिस जोन को एजीएम के आयोजन का जिम्मा सौंपा जाएगा, उसे फेडरेशन द्वारा एक लाख रु. दिया जाएगा. परन्तु जब यही एक लाख रु पूर्व रेलवे ने माँगा, तो उसे एजीएम के आयोजन से ही वंचित कर दिया गया है. उनका कहना है कि इसमें एक कुटिल चाल यह थी कि जब पूर्व रेलवे प्रमोटी आफिसर्स एसोसिएशन इस एजीएम का सारा खर्च उठा लेगा, तो फेडरेशन उस पर बकाया दिखाकर यह लाख रु. उसे नहीं देगा. प्रमोटी अधिकारियों का स्पष्ट आरोप है कि एजीएम की मद में जमा होने वाली करीब दो लाख की राशि में से एक लाख रु. आयोजक रेलवे को देकर बाकी लगभग एक लाख का क्या किया जाएगा, इसका कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं बताया गया है. बताते हैं कि पूर्व रेलवे के निर्वाचित पदाधिकारियों को दरकिनार करके उन अधिकारियों को इस एजीएम और सेमिनार के आयोजन की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जो चुनाव में हार गए थेऔर जोनल एसोसिएशन के मेम्बर तक नहीं हैं. इसके साथ ही द. पू. रे. को भी इस आयोजन में शामिल किया गया है. इसी से यह जाहिर है कि फेडरेशन में न तो कोई एकमत है, और न ही सर्वसम्मति से कोई काम हो रहा है. तमाम प्रमोटी अधिकारी इस बात से सहमत हैं कि अपने और अपने नजदीकी लोगों के हित में बोर्ड के कुछ अधिकारियों के साथ साठ-गाँठ करके न सिर्फ फायदा उठाया जा रहा है, बल्कि उनके हित में जोड़तोड़ करके नियम भी बदलवा लिए गए हैं. उनका कहना है कि इसके लिए बोर्ड के कुछ अधिकारियों को शराब और शबाब मुहैया कराने में लाखों रु का खर्च भी किया गया है. यही नहीं, इस बारे में सम्बंधित बोर्ड अधिकारियों के नाम का बकायदे खुलासा करके यह डींग भी हांकी जाती है कि 'हम तो थोड़ी सी चापलूसी और पटा-पुटू करके अपना काम करवाने में विश्वास रखते हैं.' यदि जरूरत पड़ी तो उन बोर्ड अधिकारियों के नाम का खुलासा भी किया जाएगा, जिनके नामो का उल्लेख खुलेआम किया जाता रहता है. प्रमोटी अधिकारियों का कहना है कि फेडरेशन द्वारा सीआरबी और अन्य बोर्ड मेम्बरों के लिए स्वागत और विदाई समारोहों तथा शराब पार्टियों का आयोजन इसके पहले कभी-भी नहीं किया गया, इससे पता चलता है कि फेडरेशन की गरिमा को किस हद तक नीचे गिराकर उसे बोर्ड मेम्बरों और अधिकारियों की चापलूसी करने वाली संस्था बनाकर रख दिया गया है. उनका कहना है कि अब यदि सीआरबी सहित सभी बोर्ड मेम्बर एक बार फिर कोलकाता में फेडरेशन के मंच पर दिखाई देते हैं, तो पूर्व रेलवे के तमाम प्रमोटी अधिकारियों ने स्थानीय मीडिया में इस बात का जमकर प्रचार करवाने की तैयारी की है, कि उनको सेमिनार में बुलाने और खिलाने-पिलाने के लिए उनके नाम पर लाखों रु. इकट्ठे किए गए थे? इसके साथ ही कई प्रमोटी अधिकारियों का यह भी कहना था कि पूर्व सीआरबी की चापलूसी के लिए जो पिछला सेमिनार कराया गया था, और पूर्व-पूर्व सीआरबी के लिए विदाई समारोह एवं शराब पार्टी का आयोजन किया गया था, वह प्रमोटियों के हित में क्या कर गए हैं, तब क्यों इस तरह से बोर्ड मेम्बर्स की चापलूसी के लिए फेडरेशन द्वारा उनसे बार-बार उगाही की जा रही है और यह रकम प्रमोटियों द्वारा कहाँ से और किससे उगाहकर फेडरेशन को दी जा रही है? इस पर बोर्ड मेम्बर्स को अवश्य विचार करना चाहिए.


निहित उद्देश्य से समीर टोप्पो को अटकाया गया

कोलकाता : एक अनावश्यक मामले में अटकाकर कुछ निहित उद्देश्य से आदेश होने के बावजूद श्री समीर टोप्पो को डीआरएम/रांची के पद पर ज्वाइन करने के लिए पदमुक्त नहीं किया गया. बल्कि डीआरएम में आदेश के ठीक एक हफ्ते बाद द. पू. रे. विजिलेंस ने उनके खिलाफ एक बोगस मामले, जिससे उनका कोई सम्बन्ध नहीं था, में रेलवे बोर्ड को रिपोर्ट भेजकर एक विजिलेंस केस शुरू कर दिया. जब डीआरएम/रांची के लिए श्री टोप्पो के आदेश (Railway Board's letter no. E(O) III-2011/TR/100(I) dated 07.04.2011) जारी हुए थे, उस समय वह खड़कपुर वर्कशाप में सीडब्ल्यूएम के पद पर कार्यरत थे. इस आदेश के ठीक एक हफ्ते बाद दि. 14.04.2011 को द. पू. रे. विजिलेंस द्वारा रेलवे बोर्ड को विजिलेंस फाइंडिंग रिपोर्ट भेजी गई थी. परन्तु इस एक हफ्ते में श्री टोप्पो ने तत्कालीन जीएम/द.पू.रे. को डीआरएम में ज्वाइन करने के लिए छोड़े जाने हेतु कई बार अनुरोध किया था. मगर उन्हें कैसे छोड़ा जाता, जबकि उनके खिलाफ अन्दर ही अन्दर एक बड़ी साजिश रची जा रही थी. उल्लेखनीय है कि खड़कपुर वर्कशाप में किसी स्टोर्स खरीद के मामले में श्री टोप्पो को शामिल करके उन्हें अटकाया गया है, जिससे उनका अथवा सीडब्ल्यूएम का कोई सम्बन्ध नहीं था. अब पता चला है कि सीवीसी ने उनके खिलाफ न सिर्फ मेजर पेनाल्टी चार्जशीट जारी किए जाने की एडवाइस की है, बल्कि सीबीआई जाँच के लिए भी सिफारिश की है. तथापि, बताते हैं कि सीवीसी की इस एडवाइस के करीब चार-पांच महीने बीत जाने के बाद भी आजतक श्री टोप्पो को न तो कोई चार्जशीट दी गई है, और न उनके खिलाफ सीबीआई ने कोई जाँच ही शुरू की है. पता चला है कि श्री टोप्पो ने इस अन्याय और उत्पीड़न के खिलाफ 'कैट' में मामला दायर किया है, जहाँ रेल प्रशासन यह कहकर कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश कर रहा है कि मेजर पेनाल्टी चार्जशीट और सीबीआई जाँच के जारी रहते श्री टोप्पो को डीआरएम में ज्वाइन करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है. जहाँ एक तरफ विवेक सहाय जैसे महामेनिपुलेटरों को चार-चार विजिलेंस मामले सीवीसी में जाँच के लिए पेंडिंग रहते मेम्बर ट्रैफिक और सीआरबी बना दिया जाता है, वहीँ श्री टोप्पो, श्री दीपक कृष्ण, श्री कुलदीप चतुर्वेदी और श्री राजीव भार्गव जैसे ईमानदार और कर्मठ रेल अधिकारियों को किसी न किसी फालतू मामले में अटकाकर उनका पूरा कैरियर चौपट या बाधित कर दिया जाता है. यहाँ तक कि आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी भी समय पर श्री टोप्पो को रेलवे बोर्ड द्वारा मुहैया नहीं कराई जा रही है. इस सबके बावजूद बताते हैं कि श्री टोप्पो को पूरा भरोसा है कि कोर्ट द्वारा उनके साथ अवश्य न्याय किया जाएगा.


विवादास्पद डीसीआई हेतु की जा रही है गोरखपुर में पद की व्यवस्था

गोरखपुर ब्यूरो : 'रेलवे समाचार' के पिछले अंक में पूर्वोत्तर रेलवे, लखनऊ मंडल के डीसीआई वी. पी. उपाध्याय को मात्र 15 महीने में ही गोंडा से गोरखपुर में पुनः पदस्थ किए जाने के सम्बन्ध में मंडल रेल प्रशासन के विवादास्पद निर्णय को उजागर किया गया था. इस सन्दर्भ में पता चला है कि मंडल रेल प्रशासन द्वारा बजाय अपने गलत निर्णय पर पुनर्विचार करने और उसे निरस्त किए जाने के अब उक्त भयानक विवादास्पद डीसीआई के लिए गोरखपुर में डीसीआई का एक अतिरिक्त पद सृजित अथवा शिफ्ट किया जा रहा है. इस सम्बन्ध में प्राप्त जानकारी के अनुसार गोंडा में जिस पद पर श्री उपाध्याय को ट्रांसफ़र किया गया था, अब वही पद उनके लिए गोरखपुर लाया जा रहा है. क्योंकि जिस पद पर गोरखपुर में उन्हें आनन्-फानन ज्वाइन कराया गया है, उस पर मान्यता प्राप्त यूनियन के शाखा पदाधिकारी गयासुद्दीन पदस्थ हैं, जिन्हें वहां से अब तक रिलीव (कार्यमुक्त) नहीं किया जा सका है.

कई अधिकारियों और कर्मचारियों का कहना है कि यह शायद अपनी तरह का पहला मामला है, जब रेल प्रशासन इस तरह से किसी विवादास्पद और भ्रष्ट कर्मचारी का इतना जबरदस्त फेवर कर रहा है, कि उसके लिए अतिरिक्त पद की व्यवस्था की जा रही है. उनका कहना है कि एक गलती को छिपाने के लिए प्रशासन द्वारा न सिर्फ बार-बार गलती की जा रही है, बल्कि इस तरह से किसी अत्यंत विवादास्पद कर्मचारी का फेवर करके अन्य कर्मचारियों में भारी दहशत भी फैलाई जा रही है और इस प्रकार से उनके सामने एक गलत उदाहरण भी प्रस्तुत किया जा रहा है. उल्लेखनीय है कि इस डीसीआई के काले-कारनामों के सम्बन्ध में तब न सिर्फ कई कर्मचारियों ने, बल्कि लोकसभा सांसद श्री बृजभूषण शरण सिंह (दि. 08.12.2009) और पूर्व सांसद एवं समाजवादी पार्टी के महासचिव श्री मोहन सिंह (दि. 19.11.2009 एवं दि. 13.03.2010) तथा गाँधी जयंती समारोह ट्रस्ट, बाराबंकी के चेयरमैन श्री राजनाथ शर्मा (दि. 12.11.2009) एवं सांसद श्री पी. एल. पूनिया (दि. 29.11.2009) ने अपनी-अपनी लिखित शिकायतें रेलमंत्री, प्रधानमंत्री और एडवाइजर विजिलेंस तथा ईडी/इलेक्ट्रिकल एवं एस एंड टी, रेलवे बोर्ड को भेजी थीं.

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"कदुआ पे सितुआ चोख"

दोष सीपीटीएम का, निलंबित हुआ सीनियर डीओएम

पटना : दोष किसी का, सजा किसी को... यही होता है जब यह कहा जाता है कि हायर लेवल पर जवाबदेही या उत्तरदायित्व तय किया जाए.. तब हमेशा से यही होता आया है कि नीचे स्तर पर किसी और को बलि का बकरा बना दिया जाता है और ऊपर के लोग बच जाते हैं या बचा लिए जाते हैं और उनका साथ देने के लिए उनके सभी समकक्ष इकट्ठे हो जाते हैं, मरते हैं नीचे के लोग या जूनियर अधिकारी... यही हुआ है दानापुर मंडल, पूर्व मध्य रेलवे के सीनियर डीओएम श्री आधार सिंह (आईआरटीएस-ग्रुप 'ए') के साथ, जबकि स्पष्ट तौर पर गलती सीपीटीएम श्री संजय शर्मा की बताई जाती है. उल्लेखनीय है कि 6 दिसंबर को सांसदों के लिए फर्स्ट एसी का कोच न लगने से सांसदों ने हंगामा खड़ा कर दिया और सम्बंधित अधिकारी को निलंबित करने की मांग की थी. जिसके मद्देनज़र रेलमंत्री का आदेश था कि उच्च स्तर पर जवाबदेही तय करके सम्बंधित अधिकारी को निलंबित किया जाए. अब रेलमंत्री का आदेश था, तो किसी को तो बलि का बकरा बनाना ही था, सो सीपीटीएम के बजाय सीनियर डीओएम को बना दिया गया.

प्राप्त जानकारी के अनुसार अधिक प्रतीक्षा सूची को देखते हुए विजिलेंस की एडवाइस पर गाड़ियों में एक्स्ट्रा कोच लगाए जाने की कोई पुख्ता व्यवस्था बनाई जानी थी. इसके लिए 3 दिसंबर को सीसीएम ने सभी सीनियर डीसीएम्स को एक नोट लिखकर कहा था कि वे अपने यहाँ से चलने वाली सभी गाड़ियों की असली पोजीशन चार दिन पहले मुख्यालय भेजेंगे. तदनुसार गाड़ियों में एक्स्ट्रा कोच लगाए जाने की व्यवस्था की जाएगी. हालाँकि सांसदों के जाने की जानकारी सभी को थी, फिर भी इसकी जानकारी 3 दिसंबर से पहले भी दी जा चुकी थी. नई व्यवस्था के अनुसार सीनियर डीसीएम ने 5 दिसंबर को सांसदों के लिए एक फर्स्ट एसी कोच लगाए जाने की सूचना सीपीटीएम और सीनियर डीओएम को भेज दी थी. परन्तु हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि सीपीटीएम ने सीनियर डीसीएम द्वारा भेजे गए नोट (रिक्वेस्ट-अनुरोध) को यह कहकर लौटा दिया कि यह सूचना 5 दिन पहले आनी चाहिए थी, अब कुछ नहीं होगा..

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साइडिंग्स में समय की हेराफेरी

लोडिंग पार्टियों का डेमरेज बचाने का गोरखधंधा

चक्रधरपुर : आयरन ओर की लोडिंग से होने वाली 'कमाई' लगभग ख़त्म हो जाने से दक्षिण पूर्व रेलवे के चक्रधरपुर मंडल की करीबन सभी साइडिंग्स में रेकों के आने और उनके प्लेसमेंट की टाइमिंग्स में हेराफेरी करके अवैध कमाई के नए जरिए निकाल लिए गए हैं. बताते हैं कि इस हेराफेरी में मुख्यालय से लेकर मंडल तक के लगभग सभी सम्बंधित परिचालन अधिकारी शामिल हैं. विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार चक्रधरपुर मंडल की देवझार साइडिंग में दि. 19.08.2011 कि रात 12.05 बजे एक पार्टी का रेक पहुंचा था, जिसका प्लेसमेंट करीब सवा छह घंटे बाद दि. 20.08.2011 कि सुबह 6.20 बजे दिखाया गया था. इसी प्रकार इसी साइडिंग में इसी तारीख को जिंदल का एक रेक 22.25 बजे पहुंचा था, जबकि इस बॉक्स एन रेक को दि. 20.08.2011 की सुबह 4.15 बजे प्लेस दिखाकर लगभग छह घंटे का डेमरेज भरने से पार्टी को बचा लिया गया. इसके अलावा दि. 06.09.2011 को बाराजाम्दा स्टेशन पर कोर मिनरल्स का एक रेक शाम 5.09 बजे पहुंचा था. इसका प्लेसमेंट अगले दिन सुबह 6.09 बजे दर्शाया गया. इस प्रकार पार्टी का करीब 13 घंटे का डेमरेज बचाया गया और रेलवे को इस तरह से लाखों का चूना लगाया गया है.

मंडल के हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि कमोबेस यही स्थिति नोवामुंडी साइडिंग की भी है. सूत्रों का कहना है कि यहाँ भी कई पार्टियों का डेमरेज बचाकर रेलवे को भारी नुकसान पहुँचाया जा रहा है. जिसकी एवज में सम्बंधित परिचालन अधिकारियों की बड़ी मात्रा में अवैध कमाई हो रही है. सूत्रों ने बताया कि लोडिंग पार्टियों का डेमरेज बचाने के लिए ही उनके रेकों के प्लेसमेंट के समय में हेराफेरी करके यह सारा गोरखधंधा चल रहा है. सूत्रों का कहना है कि यह सारा गोरखधंधा यहाँ एक दलाल द्वारा मंडल परिचालन अधिकारियों की मिलीभगत से चलाया जा रहा है. सूत्रों ने बताया कि यह दलाल वरिष्ठ मंडल परिचालन अधिकारी का बहुत करीबी है, जो कि रेड लाइट लगाकर इसके साथ अधिकाँश समय अपने चेंबर में बैठे रहते हैं. बताते हैं कि मंडल परिचालन कार्यालय के ज्यादातर कर्मचारियों को न सिर्फ इस दलाल (एजेंट) को सलाम करना पड़ता है, बल्कि उनका तो यह भी कहना है कि वे तो इस दलाल को ही अब अपना मुख्य मंडल परिचालन अधिकारी मानने लगे हैं, क्योंकि स्टाफ की मनचाही जगह ट्रांसफ़र/पोस्टिंग में भी इस दलाल की प्रमुख भूमिका रहती है.

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सरकारी साइडिंग से निजी कंपनियों को
अवैध रूप से दी जा रही है लोडिंग अनुमति

बिलासपुर : कुछ कंपनियों को सरकारी (एनटीपीसी) साइडिंग से लोडिंग और कुछ कंपनियों को सरकारी (रेलवे) जमीन पर साइडिंग बनाने की अनुमति देकर कुछ ट्रैफिक अधिकारियों द्वारा इन निजी क्षेत्र की कंपनियों को संरक्षण प्रदान किया जा रहा है. यही नहीं, इन कंपनियों को करोड़ों रुपये का लाभ पहुंचाकर इनमे या तो इन अधिकारियों द्वारा हिस्सेदारी की जा रही है, या फिर इनसे अपनी 'हिस्सेदारी' वसूल की जा रही है. ज्ञातव्य है कि इन ट्रैफिक अधिकारियों ने सैकड़ों करोड़ के सालाना टर्नओवर वाले कुछ ऐसे कार्पोरेट घराने खड़े कर दिए हैं, जो कल तक रेलवे की साइडिंग या गुड्स शेडों में लोडिंग/अनलोडिंग कांट्रेक्टर हुआ करते थे अथवा दो-चार रेक की लोडिंग किया करते थे. अब यही लोग बड़ी कंपनियों के मालिक बनकर उन ट्रैफिक अधिकारियों को सेवानिवृत्ति के बाद अपनी कंपनियों में नौकरी पर रख रहे हैं, जिन्होंने रेलवे की नौकरी में रहते हुए इन्हें पर्याप्त लाभ पहुँचाया था तथा ये पूर्व ट्रैफिक अधिकारी इन निजी कंपनियों के नौकर होकर अब अपनी पुराणी जगहों पर पदस्थ अपने जूनियर्स की मदद से न सिर्फ निजी कंपनियों को भरी फायदा पहुंचा रहे हैं, बल्कि अपने जूनियर्स को भी दबाव में लेकर भ्रष्ट बना रहे हैं.

प्राप्त जानकारी के अनुसार कुछ कंपनियों की अपनी कोई साइडिंग नहीं है. परन्तु रेलवे बोर्ड और जोन तथा मंडलों के कुछ ट्रैफिक अधिकारियों की मेहरबानी से इस कंपनी को बिलासपुर के पास स्थित एनटीपीसी की सरकारी साइडिंग से कोयला लोडिंग की अनुमति मिली हुई है. जो कि गैर-क़ानूनी है. बताया जाता है कि एनटीपीसी की इस साइडिंग से इन कंपनियों द्वारा प्रतिमाह सैकड़ों रेक कोयले की लोडिंग की जाती है. विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि रेलवे बोर्ड और जोन के ट्रैफिक अधिकारियों द्वारा एनटीपीसी को अपनी साइडिंग से अन्य कंपनियों को लोडिंग करने देने के लिए 'को-यूजर' परमीशन दी जाती है, जो कि पीएफटी पॉलिसी आने के बाद पूरी तरह गैर-क़ानूनी है. क्योंकि एनटीपीसी की निजी साइडिंग को पीएफटी में कन्वर्ट करने के बाद ही इससे अन्य कंपनियों को लोडिंग की छूट दी जा सकती है. सूत्रों का कहना है कि यह गोरखधंधा वास्तव में काफी समय से नीचे से ऊपर तक की मिलीभगत से चल रहा है. सूत्रों के अनुसार निजी कंपनियों द्वारा एनटीपीसी की साइडिंग से लोडिंग करने के लिए प्रति रेक लाखों रु. की राशि जोन और रेलवे बोर्ड के ट्रैफिक अधिकारियों को पहुंचाई जाती है..?

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और तीन जीएम का प्रस्ताव भेजा गया, एफसी के प्रस्ताव पर विवाद

दक्षिण पश्चिम रेलवे/हुबली, डीएलडब्ल्यू /वाराणसी और सीएलडब्ल्यू /चितरंजन के जीएम का प्रस्ताव रेलवे बोर्ड द्वारा भेज दिया गया है. परन्तु करीब एक महीना होने जा रहा है, इस प्रस्ताव का कोई अता-पता नहीं है. पता चला है कि यह प्रस्ताव कैबिनेट सेक्रेटरी के पास पड़ा है, क्योंकि इस पर विवाद है कि श्री राधेश्याम को ओपन लाइन के बजाय प्रोडक्शन यूनिट में क्यों भेजा जा रहा है, जबकि वह एमई पद के भावी उम्मीदवार हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार जीएम/द.प.रे. के लिए श्री ए. के. मित्तल, जीएम/डीएलडब्ल्यू के लिए श्री बी. पी. खरे और जीएम/सीएलडब्ल्यू के लिए श्री राधेश्याम के नाम का प्रस्ताव किया गया है. उल्लेखनीय है कि स्टोर सर्विस के श्री मित्तल 31 जुलाई 2016 को रिटायर होंगे और अगर उनकी किस्मत ने उनका साथ दिया, तो सीआरबी पद पर मित्तल को मित्तल ही रिप्लेस कर सकते हैं. उधर आश्चर्य की बात यह है कि 30 नवम्बर को खाली हो रही जीएम/सीएलडब्ल्यू की पोस्ट को तो भेजे गए प्रस्ताव में शामिल किया गया, परन्तु इसी समय एफसी पद पर पदस्थ होने के बाद खाली होने वाली एक और जीएम की पोस्ट को इस प्रस्ताव में शामिल क्यों नहीं किया गया, यह लोगों की समझ में नहीं आया है. मगर इससे ऐसा लगता है कि फ्यूचर एमई बनने की कोशिशें अभी से शुरू हो गई हैं. इसके अलावा एफसी के लिए भेजे गए प्रस्ताव में जीएम/एनएफआर कंस्ट्रक्शन श्रीमती विजयाकांत और जीएम/आईसीएफ श्री अभय खन्ना के नाम भेजे गए हैं. परन्तु हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि श्रीमती विजयाकांत का नाम श्री अभय खन्ना से एक पैनल जूनियर होने के बावजूद प्रस्ताव में न सिर्फ ऊपर है, बल्कि उन्हीं के नाम की सिफारिश भी मंत्री द्वारा की गई है. पता चला है कि श्री खन्ना ने इस पर अपना ज्ञापन यह कहते हुए प्रधानमंत्री को सौंपा है कि एफसी पर ऐसा कोई क्रायटेरिया लागू नहीं है, इसके अलावा वह श्रीमती विजायाकांत से एक पैनल (2009-10) सीनियर हैं और उनकी सीनियारिटी खुद प्रधानमंत्री ने ही सुनिश्चित की है. ऐसे में उन्हें एफसी पद से वंचित नहीं किया जाना चाहिए.

प्राप्त जानकारी के अनुसार 30 नवम्बर को श्रीमती पम्पा बब्बर के रिटायर होने और श्री खन्ना के ज्ञापन के बाद विवाद हो जाने पर एएम/फाइनेंस श्रीमती दीपाली खन्ना को अगले तीन महीने के लिए एफसी पद का अतिरिक्त कार्यभार सौंप दिया गया है. बताते हैं कि यह आदेश 30 नवम्बर को ही निकाल दिया गया था. इसका मतलब यह है कि बोर्ड को उपरोक्त दोनों अधिकारियों को एफसी बनाना ही नहीं था, यह पहले से ही तय था. बोर्ड के इस चालाकी भरे निर्णय से श्रीमती दीपाली खन्ना के लिए तो न सिर्फ बिल्ली के भाग्य से छींका टुटा, बल्कि दो की लड़ाई में तीसरे का फायदा, वाली दो-दो कहावतें चरितार्थ हुई हैं. उल्लेखनीय है कि इस दौरान रेल बजट का सारा काम पूरा कर लिया जाएगा, और उसके बाद उन्हें उनकी पुरानी जगह दिखा दी जाएगी, शायद ऐसा नहीं होगा.. यह कहना है हमारे सूत्रों का. क्योंकि उनका यह फायदा उनके अक्तूबर 2012 में रिटायर्मेंट तक भी जारी रह सकता है. तथापि पीएम और पीएमओ को ब्लैकमेल करके उनसे अपने मन-मुताबिक निर्णय करा लेने की ममता बनर्जी की जैसी ख्याति बन गई है, उसे देखते हुए यदि इस बार भी वह पीएम से श्रीमती विजयाकांत के पक्ष में निर्णय करा लें, तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए. आखिर उनके मंत्री ने श्रीमती विजयाकांत के नाम की ही सिफारिश की है, जो कि जून 2013 में रिटायर होंगी.


प्रमोटी अधिकारियों की मज़बूरी..

भारतीय रेल के करीब आठ हजार प्रमोटी अधिकारियों का यह एक बड़ा दुर्भाग्य है कि वह न सिर्फ अपने बड़बोले और निहायत झूठे महासचिव को झेलने के लिए मजबूर हैं, बल्कि वह चाहते हुए भी न तो उनसे इस्तीफा मांग पा रहे हैं, न ही उन्हें हटा पा रहे हैं, क्योंकि अब अगले साल उनका रिटायर्मेंट है. यही कारण है कि यह महासचिव महोदय इन प्रमोटी अधिकारियों को विभिन्न मंचों-फोरमों पर न सिर्फ बुरी तरह अपमानित करवा रहे हैं, बल्कि खुद भी अपमानित होकर अपनी बिरादरी (ग्रुप 'बी') की नाक भी कटवा रहे हैं. जबकि ग्रुप 'ए' अधिकारी और अन्य श्रम संगठन यह सारी वास्तविकता जानते हुए भी चुप हैं, क्योंकि वह चुप रहकर ही अपनी गरिमा को बचा पा रहे हैं. तथापि अपने बारे में उपरोक्त तमाम सच्चाई को जानते हुए भी इंडियन रेलवे प्रमोटी ऑफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) के यह महासचिव महोदय इतने निर्लज्ज हो गए हैं कि फिर भी उनका झूठ बोलना, बरगलाना, गलत जानकारियां देना और बोर्ड मेम्बरों, सीआरबी सहित कुछ महाप्रबंधकों एवं विभिन्न विभाग प्रमुखों को अपना लंगोटिया यार बताना अथवा अपना क्लासमेट बताकर अपना रुतबा झाड़ना फिर भी नहीं छूटा है.

हाल ही में उत्तर रेलवे बड़ोदा हाउस में एक मीटिंग के दौरान जो वाकया पेश आया, उसके बाद तो इन बड़बोले महासचिव महोदय को कहीं अपना मुंह नहीं दिखाना चाहिए था. बताते हैं कि उक्त मीटिंग में जब यह बोल रहे थे, तब कुछ अधिकरियों ने इन्हें टोका, तो इन्होंने यह कहकर उन्हें चुप करा दिया कि 'जब वह बोलते हैं तो कोई बोर्ड मेम्बर और यहाँ तक कि सीआरबी भी बीच में उन्हें टोकने की हिम्मत नहीं करते हैं.' इसके थोड़ी देर बाद ही जब इन्हें एफए एंड सीएओ/उ.रे. ने टोका, तो इन्होंने उन्हें भी वैसे ही उपरोक्त डायलाग मारने की शुरुआत की ही थी कि एफए एंड सीएओ/उ.रे. ने न सिर्फ इन्हें जोर से डांट दिया, बल्कि बताते हैं कि एक भद्दी सी गाली भी दी और कहा कि वह अपना रौब बोर्ड मेम्बरों को ही जाकर दिखाएं, यहाँ ज्यादा विशेषज्ञता झाड़ने की कोशिश न करें और अपनी हैसियत में ही रहें. इसके बाद इन महासचिव महोदय की बोलती बंद हो गई और इन्हें न तो अन्य श्रम संगठनों के पदाधिकारियों, और न ही अन्य अधिकारियों/सहभागियों में से किसी का भी समर्थन/सहयोग मिला, और यह अपना-सा मुंह लेकर रह गए थे.

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विवेक सहाय, पीएमओ, डीओपीटी, सीवीसी और रेलवे बोर्ड को राहत

चार-चार विजिलेंस मामले पेंडिंग होने के बावजूद पीएमओ, डीओपीटी और सीवीसी की अंदरूनी अंडरस्टैंडिंग के तहत विवेक सहाय को पहले मेम्बर ट्रैफिक और बाद में सीआरबी बनाए जाने के खिलाफ 'रेलवे समाचार' द्वारा दाखिल की गई जनहित याचिका (पीआईएल) को दिल्ली हाई कोर्ट के नए चीफ जस्टिस श्री ए. के. सिकरी और जस्टिस श्री राजीव सहाय की बेंच ने 2 नवम्बर को ख़ारिज कर दिया. इससे न सिर्फ विवेक सहाय को, बल्कि पीएमओ, डीओपीटी और सीवीसी को भी भारी राहत मिल गई है. हालाँकि कोर्ट ने इनमे से किसी को भी किसी भी प्रकार से दोषमुक्त नहीं किया है, और न ही याचिकाकर्ता के खिलाफ कोई विपरीत टिप्पणी की है, और न ही कोई पेनाल्टी लगाई है. परन्तु जिस ग्राउंड पर यह याचिका पूर्व चीफ जस्टिस श्री दीपक मिश्र और जस्टिस श्री संजीव खन्ना की पीठ ने दाखिल (एडमिट) की थी, उसे नजरअंदाज करके और याचिकाकर्ता के वकीलों की पूरी बात और बहस को सुने बिना या संज्ञान में लिए बिना जिस तरह से कोर्ट ने यह याचिका मात्र दो मिनट में ख़ारिज कर दी, वह अत्यंत ही दुर्भाग्यपूर्ण है. कोर्ट का कहना था कि सम्बंधित अधिकारी रिटायर हो गया है और को-वारंटो का मामला नहीं बनता है, जबकि सम्बंधित अधिकारी के निकट भविष्य में रिटायर हो जाने के ग्राउंड पर यह याचिका कोर्ट ने दाखिल ही नहीं की थी, बल्कि यह याचिका तो कोर्ट ने इस ग्राउंड पर एडमिट की थी कि भविष्य में वरिष्ठ एवं योग्य अधिकारियों को दरकिनार करते हुए और विजिलेंस मामले पेंडिंग रहते हुए किसी अधिकारी को उपरोक्त उच्च पदों पर प्रमोट न किया जा सके, इस बारे में कोर्ट द्वारा दिशा-निर्देश दिए जाने के ग्राउंड पर यह याचिका एडमिट की गई थी. तब इसकी विस्तृत सुनवाई किए बिना और अपेक्षित दिशा-निर्देश जारी किए बिना इस याचिका को मात्र दो मिनट में ख़ारिज कर दिया जाना वास्तव में ही दुर्भाग्यपूर्ण है. अब इसका परिणाम यह होगा कि रेल मंत्रालय के बाबुओं और निहितस्वार्थी राजनीतिज्ञों का गठजोड़ अब और ज्यादा निरंकुश हो जाएगा. इसका ताज़ा उदाहरण श्री राजीव भार्गव का मामला है, जिन्हें प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2008-09 के जीएम पैनल में पुनर्स्थापित किए जाने के बावजूद रेलवे बोर्ड के कुछ बाबुओं और राजनीतिज्ञों ने अपने निहितस्वार्थवश दरकिनार करके रख दिया है.

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रेल किराया वृद्धि को लेकर भारी पशोपेश में रेलमंत्री

नयी दिल्ली : रेलमंत्री श्री दिनेश त्रिवेदी आजकल बड़ी पशोपेश में हैं. रेल किराए बढ़ाए जाने को लेकर उन पर चौतरफ़ा दबाव पड़ रहा है. रेलमंत्री पर यह दबाव वित्त मंत्रालय, योजना आयोग और रेलवे बोर्ड के बाबुओं तथा रेलवे के मान्यता प्राप्त श्रम संगठनों की तरफ से पड़ रहा है, जो कि रेल किरायों में कम से कम 30% की बढ़ोत्तरी अविलम्ब चाहते हैं. परन्तु केंद्र में सत्ता की प्रमुख भागीदार तृणमूल कांग्रेस की मुखिया एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और वास्तविक रेलमंत्री ममता बनर्जी नहीं चाहती हैं कि डीजल-पेट्रोल की बढ़ी कीमतों का पुरजोर विरोध करने और इस मुद्दे पर सरकार से समर्थन वापसी तक की घोषणा कर डालने के बाद रेल किरायों में वृद्धि का ठीकरा उन पर और उनकी पार्टी पर फोड़ा जाए. इसलिए योजना आयोग, वित्त मंत्रालय और रेलवे बोर्ड के बाबुओं के भारी दबाव के बावजूद वह श्री त्रिवेदी को रेल किराए बढ़ाने की अनुमति नहीं दे रही हैं. रेलवे बोर्ड के तमाम बाबू लोग भी यह मानते हैं की ममता बनर्जी की सहमति मिले बगैर किराए बढ़ाना न तो रेलवे बोर्ड और न ही केंद्र सरकार के वश की बात है.

यह सर्वज्ञात है कि रेलवे के असीमित संसाधनों का (दुरु) उपयोग करके ममता बनर्जी ने वामपंथियों से पश्चिम बंगाल में अपनी चिरप्रतीक्षित सत्ता हासिल की है. उन्हें यह खूब अच्छी तरह पता है कि पश्चिम बंगाल में कीमतें बढ़ने और खासतौर पर रेल किराए बढ़ने पर बंगाली भद्रलोक में कितना जबरदस्त आक्रोश पैदा होता है. इसीलिए बात-बात पर सरकार से समर्थन वापसी की घोषणा करके उसे ब्लैकमेल करने वाली ममता बनर्जी के लिए रेल किराए बढ़ाने की अनुमति देना आसान नहीं होगा. ज्ञातव्य है कि डीजल-पेट्रोल की बढ़ी हुई कीमतों पर सरकार से समर्थन की घोषणा करके ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री से एक तरफ रेलवे में अपने मनमुताबिक महाप्रबंधकों की पोस्टिंग करा ली है, तो दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल के लिए केंद्र सरकार से 19000 करोड़ रु. का विशेष पैकेज हासिल कर लिया है.

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आखिर हुई 11 नए जीएम्स की पोस्टिंग

रेलवे बोर्ड के बाबुओं को कब आएगी सदबुद्धि

नयी दिल्ली : आखिर करीब 10 महीने के बाद 13 जीएम्स की पोस्टिंग्स के आदेश रेलवे बोर्ड ने बुधवार, 9 नवम्बर की शाम करीब 6 बजे जारी कर दिए. इस प्रस्ताव पर प्रधानमंत्री ने मंगलवार, 8 नवम्बर को सुबह 11 बजे अपने हस्ताक्षर कर दिए थे. बुधवार, 9 नवम्बर को दोपहर बाद डीओपीटी से बोर्ड पहुंची इस फ़ाइल पर आनन्-फानन कार्रवाई करते हुए बोर्ड ने तुरंत सभी 13 जीएम्स के पोस्टिंग आर्डर सिर्फ इसलिए जारी कर दिए, चूँकि अगले दिन गुरुवार, 10 नवम्बर को गुरु नानक जयंती की राष्ट्रीय छुट्टी थी, इसलिए किसी संभावित अधिकारी द्वारा इसको कोर्ट में चुनौती देकर स्टे आर्डर ले लिए जाने की भी बोर्ड को कोई आशंका नहीं थी. इसके अलावा यहाँ यह भी ध्यान रखने वाली बात है कि ममता बनर्जी की ब्लैकमेलिंग के सामने एक बार फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने हथियार डाल दिए. वरना कोई कारण नहीं था कि करीब एक महीने पहले लिए गए अपने ही निर्णय को नजरअंदाज करते हुए वह इन पोस्टिंग प्रस्तावों पर इस तरह हड़बड़ी में हस्ताक्षर कर देते? उल्लेखनीय है कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि पर सरकार से अपना समर्थन वापस लेने की ममता बनर्जी की धमकी प्रधानमंत्री द्वारा जीएम्स की पोस्टिंग के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर करते ही 'आगे से उनसे पूछे बिना कीमतें नहीं बढाए जाने' के सुर में बदल गई. बहरहाल, आर्डर मिलते ही सभी 13 अधिकारियों ने अपना-अपना पदभार संभाल लिया है. जैसा कि 'रेलवे समाचार' ने पहले प्रकाशित किया था, दो लेटरल ट्रांसफ़र के साथ नए पदस्थ किए गए 11 जीएम्स के नाम इस प्रकार हैं..

1. श्री राजीव भार्गव, आरडब्ल्यूएफ, बंगलौर.

2. श्री अभय खन्ना, आईसीएफ, पेरम्बूर.

3. श्री बी. एन. राजशेखर, आरसीएफ, कपूरथला.

4. श्री सुबोध कुमार जैन, म. रे., सीएसटी, मुंबई.

5. श्री अरुणेन्द्र कुमार, द. पू. म. रे., बिलासपुर.

6. श्री महेश कुमार, प. रे., चर्चगेट मुंबई.

7. श्री ए. के. वर्मा, द. पू. रे., गार्डेन रीच, कोलकाता.

8. श्री जी. सी. अग्रवाल, पू. रे., फेयरली प्लेस, कोलकाता.

9. श्री एस. वी. आर्य, प. म. रे., जबलपुर.

10. श्री इन्द्र घोष, पू. त. रे., भुवनेश्वर.

11. श्री जगदेव कालिया, आरई/कोर, इलाहबाद.

12. श्री वरुण बर्थुआर, पू. रे. से पू. म. रे., हाजीपुर.

13. श्री जी. एन. अस्थाना, प. म. रे. से द. म. रे., सिकंदराबाद.

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मगर शर्म उन्हें नहीं आती...

आईआरपीओएफ के महासचिव को इस्तीफा दे देना चाहिए..

मुंबई : 16 अक्तूबर की शाम को हुई एक मामूली घटना को तिल का ताड़ बनाकर पू. म. रे. के कार्मिक अधिकारियों ने कर्मचारियों के तथाकथित हंगामे को मोहरा बनाकर इंडियन रेलवे प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) के वित्त सचिव और पू. म. रे. प्रमोटी आफिसर्स एसोसिएशन (ईसीआरपीओए) के महासचिव सीनियर एएफए श्री शशिरंजन को निलंबित करा दिया था. पता चला है कि शुक्रवार, 28 अक्तूबर को उनका निलंबन ख़त्म कर दिया गया है. मगर बताते हैं कि सिर्फ निलंबन ही ख़त्म हुआ है, मामला ख़त्म नहीं हुआ है. इसके बाद उन्हें मेज़र या माइनर पेनाल्टी चार्जशीट देकर उनके खिलाफ डीएआर की कार्रवाई शुरू की जाएगी. तथापि इसके लिए आईआरपीओएफ के महासचिव श्री जीतेन्द्र सिंह ने अपने सभी जोनल पदाधिकारियों और अन्य प्रमोटी अधिकारियों को एक मोबाइल सन्देश भेजकर श्री शशिरंजन का निलंबन ख़त्म करवाने में सहयोग देने के लिए आल इंडिया रेलवेमेंस फेडरेशन (एआईआरएफ) और पू. म. रे. कर्मचारी यूनियन (ईसीआरकेयू) के महासचिव को धन्यवाद् दिया है.

हालाँकि इसमें कोई बुराई नहीं है, मगर यह 'धन्यवाद्' देने में क्या उन्हें शर्म नहीं आई? यह पूछना है भारतीय रेल के तमाम प्रमोटी अधिकारियों का. उनका कहना है कि जब प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन और जोनल प्रमोटी आफिसर्स एसोसिएशन के एक महत्वपूर्ण पदाधिकारी को इस घटिया तरीके से निलंबित किया जा सकता है, और दोनों अधिकारी संगठन इसमें कुछ नहीं कर पाते हैं, तो सर्वसामान्य प्रमोटी अधिकारी की क्या हैसियत रह गई है? उनका यह भी कहना है कि अब अगर अधिकारियों के अकारण निलंबन को भी ख़त्म करवाने के लिए प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन और जोनल प्रमोटी आफिसर्स एसोसिएशने, कर्मचारी संगठनों की मोहताज़ होंगी और उनकी चिरौरी करेंगी, तो यह भविष्य के लिए न सिर्फ एक गलत उदाहरण बनेगा, बल्कि इससे बेहतर तो यह होगा कि प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन और जोनल प्रमोटी आफिसर्स एसोसिएशनो को ही ख़त्म कर दिया जाना चाहिए और इन्हें पूर्व की भांति कर्मचारी संगठनों का ही सदस्य बने रहने देना चाहिए, क्योंकि जब यह अपने मामले खुद सुलझाने के लायक नहीं हैं और आज भी इनके मामूली झगड़े कर्मचारी संगठनों को ही आकर सुलझाना पड़ता है, तो इन्हें अलग से अधिकारी संगठन बनाने की मान्यता और इसकी तमाम सुविधाएं क्यों दी जानी चाहिए?

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अपने ही चक्रव्यूह में फंसा पू. रे. प्रशासन

कोलकाता : पहले डिप्टी सीओएम/प्लानिंग/कंस्ट्रक्शन की वर्कचार्ज पोस्ट का एलिमेंट उठाकर फिर उस पर सीनियर डीसीएम/समन्वय की पोस्ट क्रियेट करके, फिर उसे स्क्रेप किए जाने के कैट के निर्णय के खिलाफ हाई कोर्ट से स्टे आर्डर लेकर, फिर उसे भी स्क्रेप करके तथा उसके बाद उसका इस्तेमाल सीओएम के चापलूस सेक्रेटरी को जेएजी में प्रमोशन देने के लिए करके और रेलवे बोर्ड के आदेश के खिलाफ डिप्टी सीओएम/फ्वोईस-2 की एक एक्स्ट्रा पोस्ट क्रियेट करके पू. रे. प्रशासन अब बुरी तरह फंस गया है. खबर यह भी मिली है कि अब सीपीओ भी इस सारे गड़बड़ घोटाले को लेकर चिंतित दिखाई दे रहें हैं. पता चला है कि 19 अक्तूबर को सीओएम द्वारा सीनियर डीसीएम श्री अनिल कुमार को डिप्टी सीओएम/फ्वोईस की पोस्ट पर ज्वाइन न करने और बिना छुट्टी के ड्यूटी से गायब रहने की चिट्ठी उनके घर पर भेजवाने के बाद सीपीओ को इस बात का अहसास हुआ कि जब श्री अनिल कुमार ने अपना सीनियर डीसीएम का चार्ज अब तक छोड़ा ही नहीं है, तो उन्हें डिप्टी सीओएम/फ्वोईस की पोस्ट पर ज्वाइन करने के लिए कैसे कहा जा सकता है और यह चिट्ठी कैसे भेजी गई? बताते हैं कि इस बात को लेकर सीपीओ और सीओएम के बीच काफी गहन विचार-विमर्श हुआ है और अब यह निर्णय लिया गया है कि अब चुपचाप बैठा जाए और कोर्ट का निर्णय आने का इंतजार किया जाए.

परन्तु बताते हैं कि सीपीओ को अब इस बात की भी चिंता सता रही है कि जब हाई कोर्ट से सीनियर डीसीएम/समन्वय की पोस्ट स्क्रेप किए जाने के कैट के निर्णय के खिलाफ स्टे लिया गया था, तो उसे बिना हाई कोर्ट को बताए अथवा विश्वास में लिए बिना उक्त पोस्ट को स्क्रेप क्यों कर दिया गया, इससे तो अदालत की मानहानि का मामला बन जाएगा. सूत्रों का कहना है कि श्री अनिल कुमार ने इसके खिलाफ पहले ही कोर्ट में एक याचिका दायर कर दी है. इससे रेल प्रशासन अब और परेशान हो गया है. बताते हैं कि सीनियर डीसीएम/समन्वय की पोस्ट को बिना हाई कोर्ट को विश्वास में लिए उसे मुख्यालय में लाकर उसका इस्तेमाल सीओएम के चापलूस और हर फन में माहिर सेक्रेटरी विश्वजीत चक्रवर्ती को जेएजी में प्रमोशन देने के लिए किया गया है, जो कि न सिर्फ गलत हुआ है, बल्कि श्री चक्रवर्ती को जूनियर स्केल से जेएजी तक के सारे प्रमोशन उसी जगह दिए गए हैं और उन्हें पिछले करीब 10-12 वर्षों से सीओएम के सेक्रेटरी की ही पोस्ट पर बैठाए रखा गया है, जो कि पू. रे. में तमाम ट्रैफिक अफसरों की ट्रान्सफर/पोस्टिंग में हेराफेरी करके और माहवार 'चंदा' देने वाले ट्रैफिक अधिकारियों को 'कमाऊ' पोस्टों पर पोस्टिंग दिलवाकर मजबूत कमाई कर रहें हैं?

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अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान..

कोलकाता : इस मशहूर कहावत के जीते-जागते उदहारण मेट्रो रेलवे कोलकाता के डीजीएम/जी और सीपीआरओ श्री प्रत्यूष कुमार घोष हैं, जो कि जूनियर स्केल में होते हुए भी सीनियर स्केल का नहीं, बल्कि जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (जेएजी) का मज़ा लूट रहे हैं. इसी को कहते हैं 'अल्लाह मेहरबान तो गधा पहलवान'. प्राप्त जानकारी के अनुसार घोष बाबू रेलवे में क्लर्क से भर्ती होकर जूनियर स्केल ग्रुप 'बी' अधिकारी बनने तक महाप्रबंधक कार्यालय, पू. रे. में कार्यरत रहे हैं. उनके 'अल्लाह' यानि वर्तमान ओएसडी/एमआर उर्फ़ 'छाया रेलमंत्री' श्री जे. के. साहा हैं. बताते हैं कि जब श्री साहा, जीएम/पू.रे. के सेक्रेटरी हुआ करते थे, तब घोष बाबू उनकी खूब 'सेवा' करके उनके बहुत करीबी बन गए थे. पूर्व में यही सेवा करने और करीबी बन जाने का फायदा आज घोष बाबू को मिल रहा है. बताते हैं कि ओएसडी/एमआर उर्फ़ 'छाया रेलमंत्री' बनने के तुरंत बाद सबसे पहला काम श्री साहा ने इस क्लर्क घोष को जूनियर स्केल अधिकारी (एपीओ) बनवाकर उस पोस्ट पर एडीजीएम बनवा दिया, जो कि बताते हैं कि कई विजिलेंस मामलों और रिवर्सन की कार्रवाई से बचने के लिए एक और चोर, चापलूस और चरित्रहीन अधिकारी अशोक चौधरी के सेवानिवृत्ति से पहले ही वीआरएस ले लेने से खाली हुई थी?

उल्लेखनीय है कि एडीजीएम बनवाकर श्री साहा ने घोष बाबू को तत्कालीन तुनकमिजाज़ रेलमंत्री ममता बनर्जी को एयरपोर्ट से लाने - ले जाने का अति महत्वपूर्ण कार्य सौंप दिया. फिर क्या था, साहा और घोष बाबू की इस जुगलबंदी ने खूब गुल खिलाए. इसी बीच अदालत में केस करके और रेलवे बोर्ड के सम्बंधित अधिकारियों को पटाकर जे. ए. ग्रेड में प्रमोशन लेकर द. पू. रे., कोलकाता से हटाकर द. म. रे., सिकंदराबाद में सीपीआरओ बनाकर बैठा दिए गए श्री आर. एन. महापात्र जब किसी तरह वहां से जुगाड़ लगाकर मेट्रो रेलवे कोलकाता में अभी फिर से लौटे ही थे, कि कुछ ही दिनों में उन्हें वहां से पू. त. रे., भुवनेश्वर में खिसका करके श्री साहा ने अपने 'सेवादार' घोष बाबू को उनकी जगह पर मेट्रो में बैठा दिया. बताते हैं कि पूरी भारतीय रेल में घोष बाबू ही शायद एक अकेले ऐसे अधिकारी हैं जो कि जूनियर स्केल में होते हुए भी जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड में काम करके उसकी सारी सुविधाओं का उपभोग कर रहे हैं. यह भी पता चला है कि उन्हें बंगला प्यून भी दे दिया गया है. सत्ता का कृपा-पात्र होने और सेवादारी करने का यही तो सबसे बड़ा फायदा है, जो कि भा. रे. के तमाम ईमानदार रेल अधिकारियों को घोष बाबू से सीखना चाहिए.


डेढ़ साल बाद आखिर मेम्बर ट्रैफिक के
पद पर के. के. श्रीवास्तव की नियुक्ति

नयी दिल्ली : एक मई 2010 से खाली मेम्बर ट्रैफिक की पोस्ट पर आखिर डेढ़ साल बाद शुक्रवार, 7 अक्तूबर को श्री के. के. श्रीवास्तव की पोस्टिंग हो गई. श्री श्रीवास्तव पिछले करीब एक साल से पू. म. रे. के महाप्रबंधक के पद पर कार्यरत थे. उनका समस्त कार्यकाल विवादरहित रहा है. श्री श्रीवास्तव पूर्वोत्तर रेलवे, लखनऊ मंडल के मंडल रेल प्रबंधक एवं पूर्व मध्य रेलवे के सीसीएम सहित ट्रैफिक एवं कमर्शियल दोनों विभागों के लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर काम कर चुके हैं. श्री श्रीवास्तव को ट्रैफिक मूवमेंट का गहन अनुभव प्राप्त है और उम्मीद की जाती है कि उनके नेतृत्व में माल ट्रैफिक और माल लोडिंग में पर्याप्त वृद्धि होगी. इसके अलावा श्री श्रीवास्तव से यह भी उम्मीद की जाती है कि वह 'विषधर' की छाया से मुक्त होकर काम करेंगे और उनके द्वारा अपने कार्यकाल में रेलवे बोर्ड सहित जोनल रेलों में बैठाए गए उनके 'ट्रैफिक मोहरों' को उनकी यथोचित जगह दिखाएंगे. हालाँकि श्री श्रीवास्तव को ट्रैफिक निदेशालय की राजनीति की बखूबी जानकारी और उसका पर्याप्त ज्ञान है, परन्तु माना जाता है कि वह जब तक वहां अपने विश्वसनीय अधिकारियों की नियुक्ति नहीं करेंगे, तब तक वह अपने मन-मुताबिक परिणाम प्राप्त नहीं कर पाएँगे.

उल्लेखनीय है कि सन 2008 से सन 2011 तक भारतीय रेल में जो आयरन ओर घोटाला चला वह 'विषधर' और उनके पूर्ववर्ती की देख-रेख में चला था, और यदि सीबीआई ने इस मामले की वास्तविक और गहरी छानबीन की, तो इस आयरन ओर घोटाले के तार पिछले करीब डेढ़ साल तक जानबूझकर मेम्बर ट्रैफिक की पोस्ट को खाली रखे जाने से अवश्य जुड़ जाएँगे. ऐसा रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है. पता चला है कि एक कंपनी पर तो सैकड़ों करोड़ का जुर्माना लगा दिया गया है, जबकि ऐसी 10-12 कंपनियों की सूची और तैयार की जा रही है, जिन पर अभी हजारों करोड़ का जुर्माना लगाया जाना है. बताया जाता है कि सीवीसी ने इस महाघोटाले की जाँच सीबीआई को सौंपने के साथ ही खुद भी इसकी गहन छानबीन शुरू कर दी है.


आरडीएसओ को पूर्ण जोनल रेलवे का दर्ज़ा और
आरडीएसओपीओए का अदालत की मानहानि का मुकदमा

परेशान रेलवे बोर्ड ने बनाया फेडरेशन को मोहरा

नयी दिल्ली : प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2002 में 7 नई जोनल रेलवे बनाए जाने के साथ ही आरडीएसओ को भी दि. 01.10.2002 के गजट नोटिफिकेशन में दि. 01.01.2003 से एक जोनल रेलवे का दर्ज़ा घोषित किया गया था. इसके बावजूद रेलवे बोर्ड ने आजतक अपनी इस घोषणा पर वास्तविक रूप में अमल नहीं किया, जिससे आरडीएसओ के प्रमोटी अफसरों को समान पदोन्नति एवं अन्य सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा था. तमाम कोशिशों के बाद भी जब रेलवे बोर्ड ने अपनी ही घोषणा पर अमल नहीं किया और लगातार टालमटोल का रवैया अपनाया जाता रहा, तो आरडीएसओ प्रमोटी आफिसर्स एसोसिएशन (आरडीएसओपीओए) ने इस मामले को अदालत में चुनौती दे दी. अदालत का निर्णय प्रमोटी अफसरों के हक में आया, तब भी रेलवे बोर्ड के कान में जूं नहीं रेंगी और जब उसने अदालत के निर्णय पर अमल नहीं किया, तो आरडीएसओपीओए ने रेलवे बोर्ड के खिलाफ अदालत की मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया है.

लखनऊ हाई कोर्ट में इसकी अगली सुनवाई अगले महीने नवम्बर के मध्य में है. पता चला है कि इससे रेलवे बोर्ड बहुत परेशान हो रहा है, क्योंकि इसके चलते उसे अदालत में बुरी तरह अपनी भद्द पिटने की आशंका हो रही है. हालाँकि बताते हैं कि कोर्ट में उसने आरडीएसओ के प्रमोटी अफसरों को सब कुछ देने की बात मान ली है, परन्तु आरडीएसओ के प्रमोटी अफसरों की मांग है कि जब तक सभी संगठित सेवाओं में उनका इंडक्शन नहीं किया जाता है, तब तक सभी विभागों की डीपीसी को रोक दिया जाए. कोर्ट ने इसे दि. 01.01.2004 से लागू करने का आदेश दिया है. इसमें समय लगने का बेहद बेहयाईपूर्ण तर्क देकर रेलवे बोर्ड कोर्ट और आरडीएसओ के प्रमोटी अधिकारियों को गुमराह करना चाह रहा है. जबकि न सिर्फ पिछले 10 साल उसने टालमटोल में गवां दिए हैं, बल्कि लखनऊ हाई कोर्ट द्वारा दिए गए निर्णय के बाद भी उसने करीब 8 महीने का समय यही कहते हुए बिता दिया है, और अब भी और समय की मांग करके एवं भौंड़े तर्क देकर न सिर्फ अपनी खाल बचाने की घटिया कोशिश कर रहा है, बल्कि इसमें वह प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन को भी अपना मोहरा बना रहा है?

बताते हैं कि इस मामले के चलते इंडियन रेलवे प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन (आईआरपीओएफ) और आरडीएसओपीओए के बीच काफी मतभेद पैदा हो गए हैं. पता चला है कि फेडरेशन ने इस मामले में आरडीएसओपीओए की कोई मदद नहीं की है क्योंकि उस पर रेलवे बोर्ड का भारी दबाव है कि वह यदि आरडीएसओपीओए को मानहानि का मुकदमा वापस लेने के लिए बाध्य नहीं करता है, तो पोस्टों के बंटवारे में ग्रुप 'बी' को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है. प्राप्त जानकारी के अनुसार आईआरपीओएफ ने इसी आशंका के मद्देनजर आरडीएसओपीओए की फेडरेशन से संलग्नता को रद्द कर दिए जाने की चेतावनी दी है. पता चला है कि 15-16 सितम्बर को इसी मुद्दे पर विशेष रूप से दिल्ली में बुलाई गई आईआरपीओएफ की कार्यकारिणी मीटिंग (ईसीएम) में इसके साथ ही फेडरेशन के सस्पेंस एकाउंट सहित कुछ और गंभीर मुद्दों को लेकर काफी हंगामा हुआ है.

उल्लेखनीय है कि तमाम प्रमोटी अधिकारी, आईआरपीओएफ की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के कार्यकाल को बढाकर तीन साल किए जाने और फेडरेशन की कार्यप्रणाली तथा रेलवे बोर्ड की चापलूसी करने की सारी हदें पर कर दिए जाने को लेकर पहले से ही काफी आक्रोशित हैं. इसके अलावा फेडरेशन की तर्ज़ पर सभी जोनल एसोसिएशनो पर भी अपनी जोनल कार्यकारिणी का कार्यकाल बढाकर तीन साल करने का दबाव डाला जा रहा है. इससे भी तमाम जोनल पदाधिकारी सहमत न होने से फेडरेशन से नाराज हैं. यही नहीं, फेडरेशन की भेदभावपूर्ण कार्यप्रणाली से कई कैडर के अधिकारी भी फेडरेशन और जोनल एसोसिएशनो से न सिर्फ पूरी तरह कट गए हैं, बल्कि कैरियर के मामले में भी उनका भारी नुकसान हुआ है. इस सबके के परिणामस्वरुप प्रमोटी अधिकारियों में ग्रुप 'ए' और ग्रुप 'बी' का भेद भी काफी बढ़ता जा रहा है. ज्ञातव्य है कि इसी भेद को लेकर प्रमोटी अधिकारियों के एक गुट विशेष ने फेडरेशन और रेलवे बोर्ड के खिलाफ अदालत में एक मामला भी दाखिल किया हुआ है. अब देखना यह है कि रेलवे बोर्ड और प्रमोटी आफिसर्स फेडरेशन गले में अटकी इस फांस से कैसे निजात पाते हैं?


13 जीएम कि पोस्टिंग का प्रस्ताव भेजा गया

प्राप्त ताज़ा जानकारी के अनुसार 13 जीएम्स की पोस्टिंग्स का प्रस्ताव रेलवे बोर्ड ने डीओपीटी को भेज दिया है. दो लेटरल ट्रांसफ़र के साथ इस प्रस्ताव में भेजे गए नाम इस प्रकार हैं..

1. श्री राजीव भार्गव, आरडब्ल्यूएफ
2. श्री अभय खन्ना, आईसीएफ
3. श्री बी. एन. राजशेखर, आरसीएफ
4. श्री सुबोध कुमार जैन, म. रे.
5. श्री अरुणेन्द्र कुमार, द. पू. म. रे.
6. श्री महेश कुमार, प. रे.
7. श्री ए. के. वर्मा, द. पू. रे.
8. श्री जी. सी. अग्रवाल, पू. रे.
9. एस. वी. आर्य, प. म. रे.
10. श्री इन्द्र घोष, पू. त. रे.
11. श्री जगदेव कालिया, आरई/कोर
12. श्री अरुण बर्थुआर, पू.रे. से पू.म.रे.
13. श्री जी. एन. अस्थाना, प.म.रे. से द.म.रे.

रेलवे बोर्ड के सूत्रों से यह भी जानकारी मिली है कि एमटी के पद पर श्री के. के. श्रीवास्तव, जीएम/पू.म.रे., का पोस्टिंग आर्डर एकाध दिन में जारी हो जाएगा.


'विषधर' के प्रभाव से कब मुक्त होगा रेलवे बोर्ड

  • करीब दो साल से खाली पड़ी एमटी की पोस्ट भी अबतक नहीं भरी जा सकी है
  • विनय मित्तल के सीआरबी बनने के तीन महीने बाद भी नहीं हो पाई हैं जीएम्स की नियुक्तियां
  • तीसरी बार एम्पैनाल्मेंट होने के बावजूद राजीव भार्गव और अभय खन्ना को अबतक नहीं मिल पाया है
  • न्याय फाइलें देखने और लटकाने के लिए पीएमओ और रेलवे बोर्ड के पास बहुत इफरात में है समय
  • रेल मंत्रालय पर सतत कायम है ममता बनर्जी की काली छाया
  • प्रधानमंत्री की तरह 'मैडम' से पूछ-पूछकर काम करने की राह पर वर्तमान रेलमंत्री

सुरेश त्रिपाठी

'विषधर' को रिटायर हुए तीन महीने से ज्यादा हो चुके हैं, मगर ऐसा लगता है कि उसकी कलुषित छाया से रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) अबतक मुक्त नहीं हो पाया है. यही बात नए सीआरबी श्री विनय मित्तल के बारे में भी कही जा रही है. हालाँकि श्री मित्तल व्यक्तिगत स्तर पर चाहे जैसे हों, मगर प्रशासनिक स्तर पर उन्हें काफी मजबूत माना जाता रहा है. तथापि उनके सीआरबी बनने के तीन महीने बाद भी यदि रेलवे में प्रशासनिक स्तर पर कोई सुधार होता नजर नहीं आ रहा है, तो उनसे भी तमाम रेल अधिकारियों और कर्मचारियों की अपेक्षा भंग होती दिखाई दे रही है. जबकि राजनीतिक और रेलमंत्री स्तर पर तो रेलवे में सुधार की अब रेल अधिकारियों और कर्मचारियों को कोई उम्मीद नहीं है. ऐसे में उन्हें श्री मित्तल से काफी उम्मीदें थीं, वह भी पूरी होती नहीं लग रही हैं.

इन रेल अधिकारियों को पूरी उम्मीद थी कि पितर पक्ष से पहले मेम्बर ट्रैफिक (एमटी) की भी पोस्टिंग हो जाएगी, मगर एसीसी को भेजी गई इसकी फाइल को फालो करने वाला ही कोई नहीं है. अब बताते हैं कि यह फाइल कैबिनेट सेक्रेटरी के पास पड़ी है, वैसे ही जैसे श्री राजीव भार्गव और श्री अभय खन्ना की फाइल उनके पास करीब दो महीने तक पड़ी रही और उसको फालो करने वाला रेलवे बोर्ड में कोई नहीं था. अब बताया जा रहा है कि शायद दसहरा के बाद ही अब एमटी की पोस्टिंग हो पाएगी. मगर हमारे सूत्रों का एक कयास यह भी है कि विषधर की भांति ही एमटी की पोस्ट को अभी कुछ दिनों तक सीआरबी के साथ ही चिपकाए रखा जाने वाला है. हालाँकि इस पोस्ट के लिए बचे अब एकमात्र उम्मीदवार श्री के. के. श्रीवास्तव का इंटरव्यू करीब महीना भर पहले ही रेलमंत्री द्वारा लिया जा चुका है. अब इस तरह के 'इंटरव्यू' का मतलब आज सभी रेल अधिकारियों और कर्मचारियों को मालूम हो चुका है कि इसमें उनके सामने क्या-क्या शर्तें रखी गई होंगी अथवा क्या करना है, क्या नहीं करना है और करना है तो किस तरह करना है, यह सब कुछ उनसे पूछा नहीं गया होगा, बल्कि उन्हें समझाया गया होगा.

उधर प्रशासनिक स्तर पर सुदृढ़ माने जाने वाले श्री मित्तल की सीआरबी पद पर पदस्थापना के बाद यह मान लिया गया था कि अब शायद जीएम्स की पोस्टिंग जल्दी हो जाएगी, मगर रेल अधिकारियों और कर्मचारियों की यह सामान्य अपेक्षा आज तीन महीने बाद भी खरी नहीं उतरी है. उल्लेखनीय है कि 11 जोनल जीएम्स के पद पहले से खाली पड़े हुए हैं तथा 2 पद इसी महीने और खाली होने जा रहे हैं. इनमे से द. पू. म. रे. बिलासपुर का पद दिसंबर 2010 से, प. रे. मुंबई का पद जनवरी 2011 से, इंटीग्रल कोच फैक्टरी पेराम्बुर, रेलवे वैगन फैक्टरी बंगलौर और व्हील एंड एक्सेल प्लांट के पद अप्रैल 2011 से, द. म. रे. सिकंदराबाद, रेलवे कोच फैक्टरी कपूरथला और कोर इलाहाबाद के पद मई 2011 से, द. पू. रे. कोलकाता का पद जून 2011 से और म. रे. मुंबई एवं पू. त. रे. भुवनेश्वर के पद जुलाई 2011 से खाली पड़े हुए है, जबकि श्री के. के. सक्सेना और श्री कुलदीप चतुर्वेदी के आरसीटी में चले जाने पर डीजल लोकोमोटिव वर्क्स वाराणसी तथा द. प. रे. हुबली के दो जीएम पद इसी महीने और खाली हो जाने वाले हैं. और खुदा न खास्ता यदि एमटी के पद पर श्री के. के. श्रीवास्तव की नियुक्ति शीघ्र ही हो जाती है, तो पू. म. रे. हाजीपुर के जीएम का एक पद और जल्दी ही खाली हो जाएगा. इस प्रकार कुल मिलाकर वर्तमान में 14 जीएम की नियुक्ति की जानी है. तथापि ऐसा लगता नहीं है कि रेलवे बोर्ड, पीएमओ, रेलमंत्री और सीआरबी को इसकी कोई परवाह है? इसके अलावा मुंबई रेल विकास निगम और रेल टेल कारपोरेशन तथा इंडियन रेलवे वेयर हाउसिंग कारपोरेशन के प्रबंध निदेशकों (एमडी) के महीनो से खाली पड़े पद 'विषधर' के कर्मों को रो रहे हैं.

एसीसी और पीएमओ को भेजी जाने वाली फाइलों को देखने के लिए प्रधानमंत्री और कैबिनेट सेक्रेटरी के पास या तो बहुत सारा फ़ालतू वक़्त है, अथवा उन्हें इन फाइलों से बहुत मोहब्बत हो जाती है, शायद यही वजह है कि इन फाइलों को वह अपनी महबूबा मानकर दो-दो, चार-चार महीनों तक एकांत में रखकर उन्हें एकटक घूरते रहते हैं. जबकि रेलवे बोर्ड और रेलमंत्री को यह पोस्टिंग प्रस्ताव बनाने एवं पीएमओ को भेजने में नींद आती रहती है, शायद उनकी इस सोते रहने की वजह से ही पिछले 11 महीनों से जीएम्स की पोस्टिंग नहीं हो पाई है. अब जब श्री राजीव भार्गव को तीसरी बार और श्री अभय खन्ना को दूसरी बार जीएम पैनल में समाहित किया गया है, तब भी उन्हें जल्दी न्याय मिलता नजर नहीं आ रहा है. ऐसा रेलवे बोर्ड के हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है. सूत्रों का कहना है कि अधिकारियों को गलत बात के लिए भी सही सोचने हेतु मजबूर किया जा रहा है और चौथी बार रेलवे बोर्ड द्वारा गलत बात को सही बताकर पीएमओ को गुमराह किया जा रहा है. उनका कहना है कि रेलवे बोर्ड के इन स्वनामधन्य अधिकारियों या नीति-निर्धारकों को कब सही समझ आएगी और ये कब इस अंधकार से बाहर निकल सकेंगे?

रेलवे बोर्ड के अधिकाँश अधिकारियों का कहना है कि जिस तरह रेलवे बोर्ड पर विषधर की कलुषित छाया अब तक कायम है, उसी प्रकार पूरे रेल मंत्रालय पर ममता बनर्जी की भी काली छाया अब तक पड़ रही है. शायद यही वजह है कि प्रत्येक उच्च स्तरीय पोस्टिंग में 'सौदेबाजी' हो रही है, क्योंकि अबतक जितनी 'कमाई' की गई थी, वह तो पश्चिम बंगाल की सत्ता हासिल करने और विधान सभा चुनाव जीतने में खर्च हो चुकी है, मगर अभी आगे इस सत्ता को टिकाए रखने का भी तो पर्याप्त बंदोबस्त करना है? इसीलिए ममता बनर्जी ने न तो रेल मंत्रालय अपनी पार्टी के हाथ से जाने दिया है, और न ही इस पर से अपनी पकड़ ढीली की है? ऐसे में यदि वर्तमान रेलमंत्री उनसे पूछ-पूछकर या उनके बताए अनुसार अथवा उनकी ही तर्ज़ पर फाइलों का निपटारा कर रहे हैं, तो इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, क्योंकि जिस प्रकार इस देश का प्रधानमंत्री अपनी 'मैडम' के इशारे पर उठता-बैठता, चलता-फिरता है, ठीक उसी प्रकार यदि उनका एक मंत्री भी अपनी 'मैडम' के इशारों का अनुसरण करता है, तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है.


यांत्रिक अधिकारियों को प्राइम पोस्टिंग

नयी दिल्ली : रेलवे बोर्ड के यातायात निदेशालय में वरिष्ठ अधिकारियों को बायपास करके जिस तरह कुछ कंपनी समूहों के हाथों में खेलने वाले कुछ ट्रैफिक अधिकारियों को महत्वपूर्ण और लाभ की पोस्टिंग दी जा रही हैं, ठीक उसी तरह यांत्रिक निदेशालय द्वारा भी अपने कुछ संदिग्ध चरित्र वाले यांत्रिक अधिकारियों को भी प्राइम पोस्टिंग देकर पुरस्कृत किया जा रहा है. इससे जहाँ एक तरफ वरिष्ठ और ईमानदार रेल अधिकारियों में अवसाद की स्थिति पैदा हो रही है, वहीँ दूसरी तरफ रेलवे को हजारों करोड़ का नुकसान हो रहा है. रेलवे बोर्ड के विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पूर्व में कई कल-पुर्जों के रेट अपग्रेड करने और इस तरह कुछ खास कंपनियों को भरी फायदा पहुँचाने के मामले में हुए लाखों करोड़ रूपये के भ्रष्टाचार की जाँच सीबीआई द्वारा की जा रही है. सूत्रों के अनुसार इस मामले में संलिप्त रहे रेलवे बोर्ड और आरडीएसओ सहित अन्य जोनल रेलों में पदस्थ करीब 10-12 यांत्रिक अधिकारियों को सीबीआई/सीवीसी की ओर से प्रश्नावली दी गई है. इनमे से आरडीएसओ के सी एंड डब्ल्यू निदेशालय के श्री शैलेन्द्र सिंह और श्री अमिताभ सिन्हा सहित उ. रे. के सीएमई श्री ए. के. पुठिया तथा डीआरएम/जयपुर श्री बुधलाकोटी के नाम शामिल हैं. जबकि सूत्रों का कहना है कि इस तमाम रैकेट के मुख्य सूत्रधार ईडी/एमई/कोचिंग/रे.बो. श्री ए. के. सिंह न सिर्फ अब तक इस प्रश्नावली से बचे हुए हैं, बल्कि रे. बो. में अपनी जगह पर कई वर्षों से जमे हुए भी हैं. सूत्रों का कहना है कि सीबीआई/सीवीसी की चल रही जाँच और प्रश्नावली दिए जाने के बावजूद इन सभी यांत्रिक अधिकारियों को संवेदनशील पदों से हटाए जाने के बजाय इन्हें च्वाइस पोस्टिंग दी गई है, जिससे न सिर्फ एक गलत सन्देश जा रहा है, बल्कि तमाम अधिकारियों में भरी असंतोष भी पैदा हो रहा है. रेलवे बोर्ड के अकी अधिकारियों का कहना है कि यदि सीआरबी ने विजिलेंस का अधिकार अपने पास ले लिया है तो उन्हें ऐसे मामलों को गंभीरता से देखना चाहिए वरना उनके बारे में भी गलत राय कायम होने में देर नहीं लगेगी.


जमीन अधिग्रहण में अधिक मुआवजा देने का मामला सीबीआई को सुपुर्द

नयी दिल्ली : महाराष्ट्र और गुजरात में डेडिकेटेड फ्रेट कारीडोर कारपोरेशन लि. (डीएफसीसीएल) जमीन अधिग्रहण के लिए वाजिब से कई गुना अधिक मुआवजा दिए जाने का मामला जाँच के लिए सीबीआई को सुपुर्द कर दिया गया है. सूत्रों का कहना है कि इस मामले में हजारों करोड़ रुपये की अफरा-तफरी की गई है. इसके अलावा लाइन एलाइंमेंट बदलने और पुनर्निर्धारित करने में भी भारी भ्रष्टाचार हो रहा है. 'रेलवे समाचार' इस पूरे मामले की छानबीन कर रहा है, जिसे विस्तार से आगे प्रकाशित किया जाएगा.


रेल सरक्षा सर्वोपरि..??

बनेगी एक और संरक्षा कमेटी

पुरानी कमेटियों कि रिपोर्ट्स का क्या होगा..?

रेलमंत्री श्री दिनेश त्रिवेदी ने कहा है कि रेल संरक्षा सर्वोपरि है और इसके लिए एक संरक्षा कमेटी का गठन शीघ्र ही किया जाएगा. परन्तु सवाल यह उठता है कि एक और संरक्षा कमेटी के गठन से क्या हो जाएगा? पुरानी संरक्षा कमेटियों की जो रिपोर्टें पूरी तरह से आजतक लागू नहीं की गई हैं, उनका क्या होगा? पुरानी कमेटियों कि रिपोर्टों पर ही क्यों नहीं पूरी तरह से अमल किया जा रहा है? क्या भारतीय रेल इन तथाकथित कमेटियों के भरोसे ही अब चलने के लिए अभिशप्त हो गई है ? इस तरह क्यों जनता के पैसे को बरबाद किया जा रहा है? क्या इस देश में अब इस तरह की मनमानियों पर अंकुश लगाने वाला कोई नहीं रह गया है?

ममता बनर्जी ने ही शुरू की थी रेल किराया न बढ़ाने की राजनीति

रेल किराया न बढ़ाने की राजनीति ममता बनर्जी ने ही वर्ष 2002-03 के अपने पहले रेलमंत्रित्व कार्यकाल में शुरू की थी. तब से लेकर आज 10 साल हो गए हैं रेलवे का किराया न बढाकर वोट की राजनीति की जाती रही है. अब जब भारतीय रेल करीब एयर इंडिया और इंडियन एयर लाइंस की तरह कंगाली की कगार पर पहुँच गई है, तब फिर से ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ही रेलवे का बंटाधार कर रही है. अब जब रेलवे की बदौलत उनकी पार्टी पश्चिम बंगाल में सत्ता पाने अपर कामयाब हो गई है और फिलहाल उनकी राजनीति को कोई खतरा नजर नहीं आ रहा है, तब रेल का किराया बढाए जाने की बात उनके सिपहसालार रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी कर रहे है. परन्तु क्या 8 से 10 प्रतिशत रेल किराया बढ़ा दिए जाने पिछले 10 में रेलवे को हुए लाखों करोड़ रूपये के नुकसान की भरपाई हो जाएगी?


रेलवे को भी है एक 'अन्ना' की जरूरत..

भारतीय रेल का कामकाज पिछले करीब तीन वर्षों से जिस तरह चल रहा है, उससे भा. रे. गर्त में जा रही है. पूर्व रेलमंत्री ममता बनर्जी ने कोलकाता में बैठकर पूरे दो साल तक जिस तरह भा. रे. को हांका, उनके ही सिपहसालार वर्तमान रेलमंत्री उससे भी ज्यादा ख़राब स्थिति में इसे हांकते नजर आ रहे हैं. लगभग दो महीने के कार्यकाल में वह इसका एक चौथाई समय भी अबतक रेल भवन में नहीं बैठे हैं. उनका भी ज्यादातर समय उनकी पार्टी सुप्रीमो की ही तरह कोलकाता में बीत रहा है. ऐसा लगता है कि आज भी ममता बनर्जी ही रेलवे को हांक रही हैं, क्योंकि जिस तरह वर्तमान रेलमंत्री शाम को कोलकाता जाकर सुबह दिल्ली लौटते हैं, उससे तो यही लगता है कि वह उनसे पूछ-पूछकर अपना काम कर रहे हैं. सीआरबी की नियुक्ति में बुरी तरह मात खा गईं ममता बनर्जी ने जिस तरह एमएस और एमएल की नियुक्ति में पीएमओ के साथ अड़ीबाजी की और जिस तरह एक महीने से भी ज्यादा समय तक इनकी नियुक्ति को लंबित करवाया, जिस तरह एमटी की पोस्टिंग को लटकाया हुआ है तथा 11 जोनल महाप्रबंधकों की पोस्टिंग को लेकर जिस तरह सौदेबाजी की जा रही है, उससे भी यही संकेत मिलता है कि आज भी रेल मंत्रालय को ममता बनर्जी ही चला रही हैं. वर्तमान रेलमंत्री को बहुत काबिल और उच्च शिक्षित बताया जाता है, परन्तु उनको अबतक यही पता नहीं है कि रेलवे में उन्हें करना क्या है? पदभार सँभालते ही उन्होंने अपनी पार्टी लाइन को दोहरा दिया कि रेल किराया नहीं बढाया जाएगा, भले इस 'दुर्नीति' से रेलवे का पूरा भट्ठा बैठ जाए, उनकी बाला से..?

पदभार सँभालते ही रेलमंत्री ने यह भी कहा था कि रेलवे के विकास और चालू रेल परियोजनाओं के वित्त-पोषण की व्यवस्था आतंरिक स्रोतों से की जाएगी. यही रट लगाते-लगाते तो करीब तीन साल बीत गए हैं, मगर 'विजन 2020' के लिए जरूरी लगभग डेढ़ लाख करोड़ रु. में से अबतक डेढ़ लाख रु. की भी व्यवस्था नहीं हो पाई है. इसी तरह बाकी समय भी बीत जाएगा और मंत्री एवं सरकार से हटकर सब कुछ भुला दिया जाएगा. जिस तरह ममता बनर्जी का सारा ध्यान कोलकाता और पश्चिम बंगाल की तरफ था, ठीक उसी तरह उनके सिपहसालार रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी का भी है. जहाँ ममता बनर्जी को ज्यादा से ज्यादा रेल परियोजनाएं घोषित करके और रेलवे के असीमित संसाधनों का अधिक से अधिक दोहन करके पश्चिम बंगाल की सत्ता हथियानी थी, वहीँ अब दिनेश त्रिवेदी को उन सभी का ध्यान रखने के लिए रेल मंत्रालय सौंपा गया है. यही वजह है कि पू. रे., द. पू. रे., एन. एफ. रे. और मेट्रो रेलवे, कोलकाता को छोड़कर बाकी अन्य रेलों के पास अपनी छोटी-छोटी परियोजनाएं पूरी करने और काम करवा लेने के बाद भी लम्बे समय से ठेकेदारों को भुगतान करने के लिए फंड नहीं है, जिससे न सिर्फ तमाम परिसंपत्तियों को बदलने का, बल्कि रोजमर्रा का मरम्मत का भी काम बुरी तरह प्रभावित हुआ है. इसी के परिणामस्वरूप आए दिन कहीं न कहीं गाड़ियाँ लुढ़क रही हैं.

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रेलवे का निकल रहा है दीवाला

मंत्री फुटबाल खेलने में है मतवाला

नई दिल्ली : पिछले करीब तीन साल से भारतीय रेल का समय बहुत ख़राब चल रहा है, उस पर इसे वर्तमान सहित लगातार तीन मंत्री न सिर्फ अकार्यक्षम और निहित्स्वार्थी मिले हैं, बल्कि उनका रेलवे के कार्य से कोई खास मतलब भी नहीं रहा है. इनमे से पूर्व और वर्तमान मंत्री को तो रेलवे के दिन-प्रतिदिन के कामकाज से कोई लेना-देना ही नहीं जान पड़ रहा है, यह रेलवे से सिर्फ अपने मतलब साधने में लगे रहे हैं. दूसरी तरफ प्रधानमंत्री को अपने रोज-रोज के पचड़ों से ही फुर्सत नहीं है, तो वह रेलवे के उत्थान-पतन के बारे में कैसे कोई समीक्षा कर सकते हैं?

एक तरफ रेलवे गर्त में जा रही है तो दूसरी तरफ वर्तमान रेलमंत्री कोलकाता के कचरापाड़ा ग्राउंड पर फुटबाल खेलने में मस्त हैं. उन्हें 11 जोनल रेलों के महाप्रबंधकों की खाली पड़ी पोस्टों को भरने की कोई चिंता नहीं दिखाई दे रही है. और न ही रेलवे बोर्ड में मेम्बर टैफिक की करीब डेढ़ साल खाली पड़ी पोस्ट को भरने की कोई जल्दी है, जो कि वास्तव में रेलवे की एक महत्वपूर्ण अर्निंग पोस्ट है. रेल अधिकारियों और कर्मचारियों को इस सबके पीछे कोई बड़ी साजिश अथवा पैसे के लेनदेन का खेल नजर आ रहा है. यदि ऐसा है भी, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए, क्योंकि रेलवे की बदौलत ही तो पूर्व और वर्तमान रेलमंत्री की पार्टी को पश्चिम बंगाल की सत्ता नसीब हुई है..?

अब यह तो बिलकुल साफ तौर पर तय हो गया है कि श्री कुलदीप चतुर्वेदी को मेम्बर ट्रैफिक नहीं बनाया जा रहा है. इस साजिश के तहत श्री चतुर्वेदी जैसे एक निहायत ईमानदार रेल अधिकारी को रेलवे बोर्ड पर हावी निहितस्वार्थी मंडली ने न सिर्फ पूरी तरह दरकिनार कर दिया है बल्कि उनका स्वच्छ कैरियर भी बाधित कर दिया है. इसी साजिश के तहत श्री दीपक कृष्ण का कैरियर भी बाधित किया गया और इसी के तहत श्री राजीव भार्गव का कैरियर भी लगातार बाधित किया जा रहा है, जो साफ तौर पर चेयरमैन, रेलवे बोर्ड के उम्मीदवार थे, उनका भी कैरियर करीब-करीब ख़त्म कर दिया गया है. उनकी फाइल को कैबिनेट सेक्रेटरी के पास अटके हुए लगभग दो महीने हो रहे हैं, मगर उसे मंगाने कि फिक्र बोर्ड में किसी को नहीं है.

अब इसी तरह जानबुझकर एक और ईमानदार ट्रैफिक अधिकारी और जीएम पैनलिस्ट श्री एन. सी. सिन्हा का भी कैरियर बाधित करने की साजिश रेलवे बोर्ड के कुछ निहितस्वार्थी तत्वों द्वारा की जा रही है. वर्ष 2010-11 और 2011-12 के कई जीएम पैनलिस्ट अधिकारियों का कैरियर समय से उनकी पोस्टिंग न हो पाने के कारण बर्बाद हो चुका है, क्योंकि पिछले करीब एक साल से जीएम पोस्टिंग की राह देखते-देखते उनका कार्यकाल दो साल से कम हो गया है. इसके अलावा रेलवे को पिछले साल लगभग 20,000 करोड़ रु. का नुकसान हो चुका है, जो कि चालू वित्त वर्ष में बढ़कर करीब 25,000 करोड़ हो जाने का अनुमान लगाया जा रहा है. खबर तो यह भी है कि रेलवे ने 2,000 करोड़ रु. का लोन लिया है, जिससे कर्मचारियों का वेतन भुगतान किया जा सके? इन सब परिस्थितियों को देखते हुए भी रेलमंत्री को रेलवे की कोई चिंता हो रही है, ऐसा नहीं दिखाई दे रहा है, क्योंकि जो मंत्री फुटबाल खेलने में मस्त हो और रेल भवन में जमकर बैठता ही न हो, उसे अपने विभाग की कोई चिंता है, ऐसा कम से कम उसके व्यव्हार से तो नहीं लग रहा है?


पू.म.रे.: मैनपावर प्लानिंग की और अधिक जरुरत

सिर्फ डिप्टी सीई/सी की कुछ पोस्टें कम करने से काम नहीं चलेगा

हाजीपुर : पू. म. रे. ने मैनपावर प्लानिंग के तहत कुछ डिप्टी सीई/सी की पोस्टें कम की हैं जिससे 'रेलवे समाचार' की इस दिशा में चलाई जा रही मुहिम कुछ रंग लाई है. हालाँकि मैनपावर प्लानिंग और मैनेजमेंट में पू. म. रेलवे ने कुछ जरुरी कदम उठाए हैं मगर इससे काम नहीं चलेगा, बल्कि पू. म. रेलवे को इस सन्दर्भ में और ज्यादा कड़े निर्णय लेने होंगे. तथापि पू. म. रे. प्रशासन ने डिप्टी सीई/सी की कुछ संख्या कम करके एक सराहनीय काम किया है और इसका श्रेय सीएओ/सी श्री पी. एस. तिवारी को जाता है. वह इसके लिए प्रशंसा के पात्र हैं.

प्राप्त जानकारी के अनुसार पू. म. रे. निर्माण संगठन में हाजीपुर, दानापुर, दरभंगा, सहरसा और समस्तीपुर में डिप्टी सीई/सी की पोस्टें कम की गई हैं.बताते हैं कि डिप्टी सीई/सी हाजीपुर-2 को डिप्टी सीई/सी हाजीपुर-4 में और डिप्टी सीई/सी दानापुर -1 को डिप्टी सीई/सी पटना में मर्ज किया गया है. मगर विभागीय सूत्रों का कहना है कि अभी भी डिप्टी सीई/सी की करीब 6 पोस्टें और कम हो सकने की पूरी गुंजाइश है, जिसमे से एक डिप्टी सीई/सी गंगा ब्रिज की भी पोस्ट है. इन्हें मर्ज किए जाने की आवश्यकता है. क्योंकि सूत्रों का कहना है कि जहाँ कोई काम नहीं है और फंड भी नहीं मिल रहा है, वहां इन पोस्टों को बनाए रखकर सिर्फ रेलवे को आर्थिक नुकसान ही हो रहा है.

हमारे विभागीय कर्मचारी सूत्रों का कहना है कि इसी प्रकार पूर्वोत्तर रेलवे (एनईआर) और पूर्व रेलवे (पू.रे.) के लीनधारी ग्रुप 'बी' एवं ग्रुप 'सी' अधिकारियों और कर्मचारियों को भी उनकी पैरेंट रेलवे में अविलम्ब वापस भेजा जाना चाहिए, क्योंकि यह लोग यहाँ बिना काम के बैठकर तदर्थ आधार पर अपनी योग्यता से तीन गुना ज्यादा वेतन और पदोन्नतियां ले रहे हैं जिससे रेल राजस्व को भारी नुकसान हो रहा है, जो किसी भी दृष्टि से उचित या तर्कसंगत प्रतीत नहीं हो रहा है. पता चला है कि ग्रुप 'सी' एवं ग्रुप 'डी' के कुछ कर्मचारियों को सरप्लस किए जाने की बात की जा रही है.

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'गंदगी' पर 'गंदगी' फ़ैलाने पर

उतारू कुछ रेलवे बोर्ड अधिकारी

वैक्यूम टॉयलेट के टेंडर में जर्मन कंपनी का फेवर करने का प्रयास

नई दिल्ली : जर्मन कंपनी द्वारा निर्मित जिन एलएचबी कोचों की कपलिंग को भारतीय रेल के जो यांत्रिक इंजीनियर आजतक ठीक नहीं कर पाए हैं और जिनसे लाखों यात्रियों को रोज झटके लग रहे हैं, वही यांत्रिक इंजीनियर अब एक जर्मन कंपनी के वैक्यूम टॉयलेट मंगाकर भारतीय रेल में और ज्यादा गंदगी फ़ैलाने की कोशिश कर रहे हैं. पता चला है कि वैक्यूम टॉयलेट के टेंडर में एक जर्मन कंपनी को रेलवे बोर्ड के कुछ अधिकारी फेवर करने का प्रयास कर रहे हैं, जिसमे एक बोर्ड मेम्बर की भूमिका प्रमुख बताई जा रही है.

इस सन्दर्भ में प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रायोगिक तौर पर फ़िलहाल 80 वैक्यूम टॉयलेट का एक ग्लोबल टेंडर (No. 2011/Development cell/ICCI/2) रेलवे बोर्ड द्वारा जारी किया गया है, जो कि 12 अगस्त को खुलना था. मगर इसके खुलने की तारीख अब आगे बढाकर 28 सितम्बर कर दी गई है. बताते हैं कि यह टेंडर कुल 2.40 करोड़ का है, जिसके अनुसार प्रति वैक्यूम टॉयलेट की करीब कीमत 3 लाख रूपये आती है.

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रेल अधिकारियों के प्रमोशन पर भारी संकट

वेतन देने हेतु क़र्ज़ लेने को मजबूर हो गई रेलवे

  • ख़त्म हो जाएंगी वर्कचार्ज पोस्टें
  • एडहाक प्रमोशन भी नहीं मिल पाएगा
  • वर्कचार्ज एवं एडहाक पोस्टों का एक्सटेंशन खतरे में
  • सितम्बर के बाद बहुत से अधिकारी लौट सकते हैं अपनी पूर्व स्थिति में..
  • सभी कैडरों में 140 से अधिक हैं एसएजी अधिकारी

अब स्थिति यह आ गई है कि जहाँ भारतीय रेल को अपने करीब 13.61 लाख रेल कर्मचारियों को मासिक वेतन देने के लिए बाहर से 2000 करोड़ रूपये का क़र्ज़ लेने पर मजबूर होना पड़ रहा है, वहीँ इसके करीब 140 सीनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड (एसएजी) के अतिरिक्त (एक्सेस) अधिकारियों को घर बैठाकर या फर्जी ट्रेनिंग पर भेजकर वेतन-भत्तों सहित सारी सुविधाएँ मुफ्त में देकर सरकारी राजस्व को हर महीने करोड़ों रूपये का चूना लगाया जा रहा है. बताते हैं कि रेलवे के पास जितने स्वीकृत पद नहीं हैं उससे ज्यादा प्रमोशन दे दिए गए हैं. इसी वजह से यह विकट स्थिति पैदा हुई है. पर्याप्त 'प्लान आउट ले' न होने के कारण ही इन 140 अतिरिक्त एसएजी अधिकारियों को घर बैठाकर अथवा फर्जी मैनेजमेंट ट्रेनिंग पर भेजकर इनके सभी वाजिब वेतन-भत्तों का भुगतान करना पड़ रहा है. इस प्रकार देखा जाए तो प्रत्येक कैडर में औसतन 15 से 20 एसएजी अधिकारी एक्सेस हैं. जबकि अभी प्रत्येक कैडर में सैकड़ों अधिकारी एसएजी में प्रमोशन के लिए पिछले 2 - 3 साल से इंतजार में हैं. बताते हैं कि ऐसे 'वेट लिस्टेड' अधिकारियों को सेलेक्शन ग्रेड में ही एसएजी का ग्रेड देकर उनके असंतोष को रोक कर रखा गया है. तथापि उनके अंदर पनप चुके अवसाद के कारण उनके काम की गुणवत्ता प्रभावित हुई है, इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता..

इसके अलावा अब अधिकारियों की वर्कचार्ज पोस्टों और एडहाक प्रमोशन पर भारी संकट मंडराने लगा है.. इससे सबसे ज्यादा एस एंड टी, सिविल, एकाउंट्स और इलेक्ट्रिकल यह चार विभाग प्रभावित होने वाले हैं. प्राप्त जानकारी के अनुसार इन चारों विभागों में वर्कचार्ज पोस्टों की संख्या क्रमशः 68%, 64%, 61% और 54% है. जबकि बाकी विभागों, स्टोर्स में 36%, मैकेनिकल में 32%, ट्रैफिक में 26% और पर्सनल में 27% वर्कचार्ज पोस्टें हैं. रेलवे बोर्ड में हमारे विश्वसनीय सूत्रों का कहना है कि सितम्बर के बाद यदि इन वर्कचार्ज पोस्टों को एक्सटेंशन नहीं दिया जाता है तो एस एंड टी, सिविल, एकाउंट्स और इलेक्ट्रिकल इन चार विभागों का काम तो न सिर्फ लगभग ठप ही हो जाएगा, बल्कि इनमे तमाम अधिकारियों के ड्यू प्रमोशन भी लम्बे समय तक के लिए अटक जाएँगे. सूत्रों का कहना है कि वर्कचार्ज पोस्टों में समस्या यह आ रही है कि 'प्लान आउट ले' में पू. रे., द. पू. रे., पू.सी.रे. और मेट्रो रेलवे को ही सारा पैसा झोंक दिया गया है क्योंकि इन्हीं चारों रेलों के अंतर्गत पूर्व एवं वर्तमान रेलमंत्री तथा उनकी पार्टी का संपूर्ण कार्यक्षेत्र आता है. इसलिए बाकी रेलों के पास काम करवा लेने के बाद न तो अपने ठेकेदारों को और न ही अपने कर्मचारियों को भुगतान करने के लिए पैसा है. केंद्र सरकार अपनी कमजोरियों में फंसी हुई है, इसलिए उसे भारतीय रेल में सतत चल रहे 2जी स्पेक्ट्रम, सीडब्ल्यूजी जैसे महाघोटालों की कोई चिंता नहीं है, क्योंकि उसने सत्ता की समर्थक क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों के लिए भारतीय रेल को एक चारागाह बना दिया है..?

-प्रस्तुति :

सुरेश त्रिपाठी


प. रे. के मोटरमैनो की दादागीरी

मुंबई : पिछले करीब २-३ सालों से प. रे. के मोटरमैनो की दादागीरी रेल प्रशासन का सिरदर्द बनी हुई है. पूरा रेल प्रशासन मोतार्मैनों की इस दादागीरी से आजिज आ गया है. मगर अबतक इस समस्या का कोई स्थाई समाधान न हो पाने का एकमात्र कारण स्वयं रेल प्रशासन में इच्छाशक्ति की कमी होना है. रेल प्रशासन की इसी किंकर्तव्यविमूढ़ता के कारण गुरुवार, १८ अगस्त को फिर एक बार प. रे. के मुट्ठी भर मोटरमैनो ने लाखों उपनगरीय रेल यात्रियों को ऐसे मौके पर भारी मुशीबत में डाल दिया जब 'बेस्ट' की बसों की भी हड़ताल चल रही थी. प.रे. प्रशासन अपने इन मुट्ठी भर मोटरमैनो के अलग कैडर को म.रे. की ही तरह रनिंग कैडर में मर्ज करने का निर्णय क्यों नहीं ले पा रहा है, यह समझ से परे है.. क्योंकि इस सम्बन्ध में रेलवे बोर्ड ने बहुत पहले ही अपनी हरी झंडी दिखा दी थी और प.रे. के दोनों मान्यताप्राप्त श्रम संगठन भी इसके लिए रेल प्रशासन का सहयोग करने की घोषणा कर चुके हैं. परन्तु फिर भी रेल प्रशासन ऐसा क्यों नहीं कर रहा है, इसका उसके पास कोई वाजिब जवाब भी नहीं है. गत वर्ष जब मोटरमैनो ने इसी तरह अचानक कई बार लोकल गाड़ियों को रोक कर रेल प्रशासन की नाक में दम कर दिया था, तब राज्य सरकार को भी इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा था. तभी प.रे. के अलग मोटरमैन कैडर को रनिंग स्टाफ में मर्ज किए जाने का एक प्रस्ताव जीएम/प.रे. के समक्ष प्रस्तुत किया था. सबको इस बात का पूरा भरोसा था की जीएम इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दंगे मगर ३१ जनवरी २०११ को सेवानिवृत्त होने से पहले तत्कालीन जीएम/प.रे. श्री आर. एन. वर्मा ने ऐसा नहीं किया और इस फाइल को वे जैसी की तैसी ही छोड़कर चले गए. इसका परिणाम सामने है की हर छोटी-बड़ी और गैरमामूली बात पर मोटरमैनो की दादागीरी जारी है जिससे प.रे. के सभी अधिकारी और लाखों दैनिक उपनगरीय यात्री इन मुट्ठी भर अहंमन्य मोटरमैनो के बंधक बनकर रह गए हैं.


एमएल बने कुलभूषण, एमएस हुए ए.के.वोहरा

नई दिल्ली : आखिर करीब डेढ़ महीने कि जद्दो-जहद के बाद प.रे. के महाप्रबंधक का अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे म.रे. के महाप्रबंधक श्री कुलभूषण को मेम्बर इलेक्ट्रिकल (एमएल), रेलवे बोर्ड बना दिया गया. इसी के साथ द.पू.म.रे. के महाप्रबंधक का अतिरिक्त कार्यभार संभाल रहे पू.त.रे. के महाप्रबंधक श्री ए.के.वोहरा को मेम्बर स्टाफ (एमएस) बनाया गया है. प्राप्त जानकारी के अनुसार बड़े ही अनपेक्षित रूप से शुक्रवार, 12 अगस्त की शाम करीब 8 बजे प्रधानमंत्री ने इन दोनों बोर्ड मेम्बर्स कि नियुक्ति सम्बन्धी फाइल पर हस्ताक्षर कर दिए थे. परन्तु काफी देर हो जाने और डीओपीटी भी बंद हो जाने से कल यह आदेश जारी नहीं हो पाए थे, मगर इनके आज शाम तक जारी हो जाने कि पूरी उम्मीद है.

ज्ञातव्य है कि गृह मंत्रालय द्वारा श्री वोहरा को एमएल बनाए जाने सम्बन्धी की गई टिप्पणी के बाद पीएमओ से यह फाइल सोमवार, 8 अगस्त को वापस आ गई थी..जिससे पूरी रेलवे में काफी मायूसी सी छा गई थी, और सब यह कहने लगे थे कि अब भारतीय रेल का ईश्वर ही मालिक है. जहाँ विगत में मेम्बर इंजीनियरिंग (एमई) कि नियुक्ति के लिए एकदम से उतावले हो गए रेलवे बोर्ड ने दिल्ली हाई कोर्ट में यह कहकर गुहार लगाई थी कि एमई कि नियुक्ति न होने से पूरी रेलवे ठप्प हो जाएगी, वहीँ पिछले डेढ़ महीने से बोर्ड मेम्बरों के तीन-तीन महत्वपूर्ण पद खाली पड़े होने के बावजूद रेलवे बोर्ड को इसकी कोई चिंता नहीं थी. यही नहीं अब भी मेम्बर ट्रैफिक (एमटी) कि नियुक्ति का फैसला नहीं हो पाया है. यह अत्यंत शर्म कि बात है, क्योंकि जहाँ अन्य केंद्रीय मंत्रालयों में महीनों पहले सबको यह पाता होता है कि कौन आगे क्या बनेगा, वहीँ रेल मंत्रालय (रेलवे बोर्ड) मदारियों का अड्डा बनकर रह गया है. जहाँ सिर्फ वही होता है जो 'जमूरा' चाहता है, क्योंकि 'मदारी' का उस पर कोई जोर नहीं है.

इसके अलावा जोनल महाप्रबंधकों के 8 पद महीनो से खाली पड़े हैं जिनके बारे में किसी को कोई चिंता नहीं है, जबकि जीएम के न रहने से जोनो की तमाम प्रशासनिक व्यवस्था चरमरा गई है. यही नहीं, इस राजनीतिक जोड़तोड़ और सौदेबाजी ने कई कार्यक्षम रेल अधिकारियों का न सिर्फ कैरियर चौपट करके रख दिया है, बल्कि पूरी भारतीय रेल के भविष्य को भी अंधकारमय बना दिया है. उम्मीद ही की जा सकती है कि अब एमटी और कुल 11 जोनल महाप्रबंधकों की भी नियुक्ति जल्दी ही हो जाएगी. तथापि एमटी की पोस्ट पर जो गलत और गैर-क़ानूनी परंपरा 'विषधर' डाल गए हैं, फ़िलहाल वही जारी रहने के संकेत मिल रहे हैं.


 

कुत्तों के लिए रिटेन कर रखा है रेलवे का बंगला ?

चेन्नई : जहाँ रेल अधिकारियों को रहने के लिए रेलवे आवास नहीं मिल रहे हैं वहां कुछ उच्च पदस्थ रेल अधिकारियों ने अपने रेलवे आवास दो-दो साल से सिर्फ कुत्तों के लिए रिटेन कर रखा है. यहाँ जहाँ एक बंगले में सिर्फ एक कुत्ता बंधा रहता है और उसकी देखभाल के लिए एक चौकीदार नियुक्त है वहीँ कुछ बंगलों और फ्लैटों की रखवाली सिर्फ चौकीदार या कोई नाते-रिश्तेदार कर रहा है. मगर इन्हें अन्य रेल अधिकारियों को आवंटित नहीं किया जा पा रहा है. प्राप्त जानकारी के अनुसार द. रे. के स्टर्लिंग रोड स्थित स्टर्लिंग गार्डेन रेलवे अधिकारी निवास के बंगला नंबर 8 में पिछले दो वर्षों से सिर्फ एक कुत्ता बंधा हुआ है और इस कुत्ते एवं बंगले की रखवाली एक चौकीदार द्वारा की जा रही है. बताते हैं कि यह बंगला जीएम/एनएफआर कंस्ट्रक्शन श्रीमती विजया कान्त का है जो कि उन्होंने पिछले दो साल से अपने पास रिटेन किया हुआ है. यही नहीं इसे सामान्य रेलवे रेंट पर ही रखा गया है. जबकि बंगला नंबर 7 मान सिंह के पास है और उन्होंने भी इसे अपने पास दो साल से रिटेन किया हुआ है. इसी प्रकार बताया जाता है कि यहाँ करीब 15 रेलवे फ़्लैट भी विभिन्न रेल अधिकारियों ने लम्बे समय से अपने पास रिटेन किए हुए हैं. जिनकी पोस्टिंग द. रे. के अन्य मंडलों में है या अन्य रेलों में हो गई है. इसके कारण यहाँ पदस्थ हुए रेल अधिकारियों को रेलवे आवास नहीं मिल पा रहे हैं. सूत्रों का कहना है कि इन रिटेन किए हुए किसी भी रेलवे आवास में पेनल या डेमरेज रेंट नहीं लगाया जा रहा है. बताते हैं की यहाँ जिस अधिकारी से रेलवे आवास आवंटन अधिकारी की कोई खुन्नस हो जाती है उसे या दो महीने में ही निकालकर बाहर कर दिया जाता है या फिर उस पर पेनल/डेमरेज रेंट लागू कर दिया जाता है और इस प्रकार अधिकारियों का उत्पीड़न किया जा रहा है. यहाँ भी जाति-वर्ग वाद का बोलबाला है. जिसका अंदाज यहाँ लम्बे समय से पदस्थ कुछ अधिकारियों की यहाँ-वहां पोस्टिंग को देखकर किया जा सकता है. अधिकारियों का मानना है कि जिन लोगों ने लम्बे समय से यहाँ अपने आवास रोक कर रखे हैं उनसे बाज़ार दरों पर किराया वसूल किया जाना चाहिए और ऐसे सभी आवास तुरंत खाली करवाए जाने चाहिए.


"जाट मरा तब जानिए जब तेरहवीं हो जाए..!!"

'विषधर' का प्रेत चला रहा है रेल मंत्रालय..

  • हाई पावर कमेटी में आने का हौव्वा बनाकर अपनी अहमियत बरकरार रखने का प्रयास कर रहे हैं विषधर उर्फ़ विवेक सहाय
  • सीआरबी बनवाने की अहसानमंदी दिखाकर विनय मित्तल से अपने अधूरे कार्य करवाने का प्रयास कर रहे हैं विवेक सहाय
  • अति महत्वपूर्ण और गोपनीय फाइलें बंगले पर मंगाकर देख रहे हैं विवेक सहाय
  • वी. एन. त्रिपाठी को आवंटित बंगला अपने नाम आवंटित करवाया विवेक सहाय ने
  • पद पर रहते निजी कंपनियों के जो काम नहीं कर पाए थे, उन्हें अब अपने अहसान तले दबे मित्तल से करवाने का प्रयास कर रहे हैं विवेक सहाय

जैसी कि विवेक सहाय की 'फितरत' रही है, उसके अनुसार उनका 'विषधर' नामकरण 'रेलवे समाचार' ने नहीं, बल्कि उनके एक 'अति प्रिय' रहे रेल अधिकारी ने ही काफी पहले किया था. अब यह बात अलग है कि 'रेलवे समाचार' ने इस नाम को इससे पहले उनके लिए बहुत ज्यादा उपयुक्त नहीं मना था, मगर पिछले दो-तीन वर्षों में उनके जो 'कृत्य' सामने आये हैं, उनसे अब लगने लगा है कि वास्तव में उनका यह नामकरण एकदम उचित हुआ था. रेल सेवा में रहते, खासतौर पर जीएम/उ.म.रे., जीएम/उ.रे., एमटी/रे.बो. और सीआरबी के पदों पर रहते, विवेक सहाय का जो 'चरित्र' उभर कर सबके सामने आया और जिस तरह इन पदों को हथियाने के लिए जोड़-तोड़ एवं तिकड़मबाजी उन्होंने की तथा जिस तरह उन्होंने पूरी रेल व्यवस्था को नष्ट - भ्रष्ट किया, अपने विरोधियों को उत्पीड़ित एवं अपने चहेतों को उपकृत किया, उस परिप्रेक्ष्य में उनका यह नामकरण बिलकुल सटीक हुआ है.

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विनय मित्तल बने सीआरबी

आखिर सब कयासों को धता बताते हुए विनय मित्तल सीआरबी बन गए. पिछले अंक में 'रेलवे समाचार' द्वारा व्यक्त की गई विवेक सहाय की 'बिरादरी नीति' का आधा हिस्सा पूरा हो गया है. बाकी आधा हिस्सा, वह यह कि एमटी की पोस्ट 'बिरादरी' के बाहर नहीं जाएगी, भी एक-दो दिन में पूरा हो जाने की पूरी संभावना है. श्री मित्तल के सीआरबी बन जाने से अब के. के. श्रीवास्तव के मेम्बर टैफिक (एमटी) बनने का रास्ता साफ़ हो गया है. हालांकि एमटी की पोस्ट पर कुलदीप चतुर्वेदी ने भी यह कहते हुए दावा किया है की 1 मई 2010 को खाली हुई इस पोस्ट पर उनका हक़ मारा गया था, जबकि के. के. सक्सेना ने यह कहकर दावा किया है कि उन्हें उत्पादन इकाई में पदस्थ किए जाने में उनकी कोई गलती नहीं है.

श्री मित्तल के सीआरबी बन जाने से एक बात और साबित हो गई है कि ए. पी. मिश्रा - विवेक सहाय के 'काईयांपन' को नहीं समझ पाए. जबकि वह उनके सहयोग से सीआरबी बन जाने के लिए पूरी तरह से आश्वस्त थे. तथापि सहाय ने उनके विश्वास को धता बताते हुए उन्हें राजीव भार्गव के केस के साथ लिंक करके उनके सारे मंसूबों पर पानी फेर दिया. यही नहीं बताते हैं कि सहाय ने तो उनकी एक सीआर भी ख़राब कर दी है. इसके अलावा सहाय ने अपनी इस तिकड़म से इंजीनियरिंग कैडर को भी निराश किया है.


विवेक सहाय की विदाई

अंततः विवेक सहाय की रेलवे से विदाई हो ही गई. हालांकि वह अंत तक इस जुगाड़ में रहे कि उन्हें या तो सेवा विस्तार मिल जाएगा या फिर किसी अन्य सरकारी संस्थान में प्रतिनियुक्ति मिल जाएगी अथवा रेल भवन के प्रवेश द्वार पर सीढ़ियों के या सामने रखे रेल इंजन के पास कम से कम एक स्टूल डालकर बैठने की सुविधा तो अवश्य ही मिल जाएगी, मगर इनमें से उनकी कोई अभिलाषा अंततः पूरी नहीं हो पाई और साढ़े चार बजे रेल भवन के दूसरे माले पर स्थित सम्मलेन कक्ष में रेल राज्य मंत्री के. एच. मुनियप्पा ने उन्हें सूखी-सूखी विदाई देकर रेल भवन से विदा कर दिया और कुछ लोग उन्हें रेल भवन के सामने स्थित चौराहे को पार कराकर दूर तक इसलिए छोड़ आए कि कहीं वे फिर से न आकर सीआरबी की कुर्सी पर बैठ जाएँ...

आज रेल भवन में यह चर्चा बड़ी जोर से थी की विदाई के समय सम्मलेन कक्ष में रेलवे बोर्ड का कहीं कोई चपरासी श्री सहाय पर अपना फटा-पुराना जूता या चप्पल न फेंक दे, इसलिए यह नजारा देखने की उत्सुकता में सम्मलेन कक्ष में विदाई के समय आज अन्य तारीखों की अपेक्षा काफी भीड़ थी. बहरहाल ऐसा कुछ नहीं हुआ और लागों को निराश लौटना पड़ा.

'रेलवे समाचार' ने सहाय को विदाई किस तरह और कैसे दी जानी चाहिए, इस पर अपनी वेब साईट पर ई-मेल, एसएम्एस और फोन के जरिए रेल कर्मियों की प्रतिक्रिया मांगी थी. इनमे से सबसे पहले एक रेलकर्मी की जो प्रतिक्रिया एसएम्एस के जरिए आई है वह इस प्रकार है.. "जूतों की माला पहनानी चाहिए, ये अंग्रेजों की औलाद रेल-बहादुर पहले देश और देशवासियों को बेवकूफ बनाते थे, अब समझते हैं..!!" श्री सहाय से बुरी तरह खुन्नस खाए इस रेलकर्मी की इस प्रतिक्रिया में कुछ शब्द गालियों के भी हैं जिन्हें भाषा की गरिमा को ध्यान में रखते हुए निकाल दिया गया है, आशा है कि यह रेलकर्मी इस बात को समझकर अपनी खुन्नस को यहीं दबा लेगा.

एक अन्य रेलकर्मी ने अपनी प्रतिक्रिया कुछ इस प्रकार से दी.."श्री सहाय की एमटी और सीआरबी के पदों पर अवैध नियुक्ति को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल की गई 'रेलवे समाचार' की जनहित याचिका के बाद हमने 'रेलवे समाचार' के पिछले दो अंक पढ़े, जिनसे रेलवे बोर्ड में चलने वाली हाई प्रोफाइल तिकड़मबाजी के बारे में पता चला. दोनों अंक बहुत ही बढ़िया अंदाज में प्रस्तुत किए गए हैं. यह सब जानकार तो यही कहना पड़ेगा कि सहाय को बिना किसी सम्मान या औपचारिकता के ही विदा कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि उन्होंने रेलवे की व्यवस्था को बहुत नुकसान पहुँचाया है..!"

एक रेल अधिकारी और सहाय के काफी 'अजीज' रहे अजीत सक्सेना से जब इस बारे में उनकी राय मांगी गई तो उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के तड से एक शेर सुना दिया, जो इस प्रकार है..

"मेरी निगाह में वो शख्स आदमी भी नहीं..!
जिसे लगा था ज़माना खुदा बनाने में...!!

इस एक शेर से तो सामान्य रेल कर्मचारियों की समझ में आपकी राय कुछ ख़ास नहीं आएगी, यह कहकर जब उन्हें और कुरेदा गया, तो उन्होंने लगे हाथ एक शेर और दाग दिया..

"दोज़ख के इंतज़ाम में उलझा था रात-दिन...!
दावा यह कर रहा था कि ज़न्नत में जाएगा...!!"

यह दूसरा शेर कहकर श्री सक्सेना ने फोन कुछ इस तरह काट दिया कि ऐसा लगा कि उन्होंने सहाय के प्रति अपनी सारी कड़वाहट रिसीवर को क्रेडल पर पटक कर निकाल दी है..

श्री सहाय के सताए हुए और रेलवे को छोड़कर जा चुके कई अधिकारियों ने अपना नाम न देने की शर्त पर कहा कि 'ये शख्स किसी इज्जत के लायक नहीं था, फाइनली इससे रेलवे का पिंड छूट गया, अब रेलवे की प्रगति की कुछ उम्मीद की जा सकती है.' कुछ और उदगार व्यक्त करने के लिए कहने पर उनका कहना था कि 'इस व्यक्ति ने अपने निजी हित की खातिर रेलवे में गलत परम्पराएं डालीं, सारे स्थापित नियमों का उल्लंघन किया, योग्य और कर्त्तव्यनिष्ठ रेल अधिकारियों को दरकिनार किया, उनका काफी उत्पीड़न किया, जिससे कई योग्य एवं ईमानदार रेल अधिकारी न सिर्फ अवसादग्रस्त हुए बल्कि रेलवे को छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो गए.'

इसके अलावा अन्य बहुत से रेलकर्मियों ने भी अपनी बेबाक राय भेजी है मगर वह सब इतनी ज्यादा असंवैधानिक भाषा में हैं कि उन्हें सम्पादित करके भी प्रस्तुत कर पाना मुश्किल हो रहा है. हमारा मानना है कि उपरोक्त प्रस्तुत प्रतिनिधि प्रतिक्रियाएं भी काफी हैं, जिनसे कम से कम श्री सहाय को अब यह समझ लेना चाहिए कि उनकी कारगुजारियों के परिप्रेक्ष्य में रेलवे के करीब 13.50 लाख कर्मचारी उनसे कितनी नफ़रत करने लगे थे. इसलिए 'रेलवे समाचार' उनके स्वस्थ और दीर्घ जीवी होने की कामना करते हुए अपनी राय में उन्हें सिर्फ एक शेर समर्पित कर रहा है...

"संजीदगी से अब कोई तामीरी काम कर...!
कब तक यूँ ही हवा में पतंगें उड़ाएगा...!!"


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