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सीआरबी को सेवा-विस्तार : लेबर/ऑफिसर्स फेडरेशनों ने जताया रेलमंत्री से विरोध    ||    रेलवे में काम कम, घोषणाएं ज्यादा !    ||    तब और ज्यादा हो जाएगा भारतीय रेल का बंटाधार    ||    विदेशों में एफडीआई के लिए ‘भीख’ मांगेगी भारतीय रेल -अरुणेंद्र कुमार    ||    एफडीआई और निजी घरेलू निवेश से ही सुधरेगी रेलवे की आर्थिक स्थिति -सुरेश प्रभु    ||    चार सांसदों से शिकायत लेकर हटाया गया ए. पी. सिंह को..    ||    यात्रियों की अपेक्षाएं पूरा करना रेलवे की जिम्मेदारी है -मनोज सिन्हा, रेल राज्यमंत्री    ||    आउटस्टैंडिंग डीआरएम/बिलासपुर अजय प्रताप सिंह का अचानक और अकारण ट्रांसफर    ||    पूर्वोत्तर रेलवे में बढ़ती रेल दुर्घटनाएं, 5 बच्चों की दुखद मृत्यु, 8 घायल    ||    ‘रेलवे समाचार’ को द.पू.म.रे. के पांच अधिकारियों द्वारा दिया गया कानूनी नोटिस    ||    राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स के 14 कमांडो टीओटी में पकड़े गए    ||    उ.प.रे. सेंट्रल हॉस्पिटल द्वारा रेलकर्मियों को दी जा रही हैं एक्सपायरी डेट मेडिसिन    ||    मुफ्तखोरी करें अधिकारी, भरपाई करे सरकार !    ||    वाह प्रभू... पहले ही दिन से बजा दी सुधार की घंटी..    ||    सदानंद गौड़ा को आखिरकार ले डूबे अरुणेंद्र कुमार !    ||    मेंबर ट्रैफिक को आखिर क्यों आना पड़ा गोरखपुर?    ||    बिना किसी योग्यता के बनाए जा रहे इंजीनियर, भा. रे. का भगवान ही मालिक है..    ||    सतर्कता संगठन की सतर्कता से प्रतिमाह हो सकती है 25 लाख की बचत    ||    टिकट आरक्षण से इतर कार्यों के खिलाफ रेल आरक्षण कर्मियों का विरोध    ||    आरओबी/आरयूबी के लिए रेलवे की मंजूरी की जरुरत नहीं होगी

Suresh Tripathi, Editor, 105, Doctor House, 1st Floor, Raheja Complex, Kalyan (West) - 421301. Distt. Thane (Maharashtra). Contact:+919869256875 Email : editor@railsamachar.com, railwaysamachar@gmail.com

सीआरबी को सेवा-विस्तार : लेबर/ऑफिसर्स फेडरेशनों ने जताया रेलमंत्री से विरोध    ||    रेलवे में काम कम, घोषणाएं ज्यादा !    ||    तब और ज्यादा हो जाएगा भारतीय रेल का बंटाधार    ||    विदेशों में एफडीआई के लिए ‘भीख’ मांगेगी भारतीय रेल -अरुणेंद्र कुमार    ||    एफडीआई और निजी घरेलू निवेश से ही सुधरेगी रेलवे की आर्थिक स्थिति -सुरेश प्रभु    ||    चार सांसदों से शिकायत लेकर हटाया गया ए. पी. सिंह को..    ||    यात्रियों की अपेक्षाएं पूरा करना रेलवे की जिम्मेदारी है -मनोज सिन्हा, रेल राज्यमंत्री    ||    आउटस्टैंडिंग डीआरएम/बिलासपुर अजय प्रताप सिंह का अचानक और अकारण ट्रांसफर    ||    पूर्वोत्तर रेलवे में बढ़ती रेल दुर्घटनाएं, 5 बच्चों की दुखद मृत्यु, 8 घायल    ||    ‘रेलवे समाचार’ को द.पू.म.रे. के पांच अधिकारियों द्वारा दिया गया कानूनी नोटिस    ||    राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स के 14 कमांडो टीओटी में पकड़े गए    ||    उ.प.रे. सेंट्रल हॉस्पिटल द्वारा रेलकर्मियों को दी जा रही हैं एक्सपायरी डेट मेडिसिन    ||    मुफ्तखोरी करें अधिकारी, भरपाई करे सरकार !    ||    वाह प्रभू... पहले ही दिन से बजा दी सुधार की घंटी..    ||    सदानंद गौड़ा को आखिरकार ले डूबे अरुणेंद्र कुमार !    ||    मेंबर ट्रैफिक को आखिर क्यों आना पड़ा गोरखपुर?    ||    बिना किसी योग्यता के बनाए जा रहे इंजीनियर, भा. रे. का भगवान ही मालिक है..    ||    सतर्कता संगठन की सतर्कता से प्रतिमाह हो सकती है 25 लाख की बचत    ||    टिकट आरक्षण से इतर कार्यों के खिलाफ रेल आरक्षण कर्मियों का विरोध    ||    आरओबी/आरयूबी के लिए रेलवे की मंजूरी की जरुरत नहीं होगी

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सीआरबी को सेवा-विस्तार : लेबर/ऑफिसर्स फेडरेशनों ने जताया रेलमंत्री से विरोध

यदि वर्तमान सीआरबी को सेवा-विस्तार दिया जाता है, तो यह भारतीय रेल का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा
वर्तमान सीआरबी बतौर जीएम एवं सीआरबी मैनीपुलेशन एवं करप्शन के अलावा अपनी कोई भी छाप रेलकर्मियों और रेल अधिकारियों में छोड़ने में कामयाब नहीं हुए हैं
तीन जीएम ने सेवा-विस्तार हेतु अपना आवेदन देने से मना किया, कहा- यदि जरुरत है तो सरकार स्वतः करे सेवा-विस्तार

केंद्र सरकार नौकरशाहों को सेवा-विस्तार देने की एक बहुत ही गलत परंपरा डाल रही है. रेल भवन सहित पूरी भारतीय रेल में इस बात की भारी चर्चा है कि इसी 31 दिसंबर को रिटायर होने जा रहे वर्तमान सीआरबी को सेवा विस्तार (एक्सटेंशन) दिया जा रहा है. इस चर्चा से भारतीय रेल के लगभग सभी अधिकारी हतोत्साहित हो रहे हैं. उनका कहना है कि यदि वर्तमान सीआरबी को सेवा-विस्तार दिया जाता है, तो यह भारतीय रेल का सबसे बड़ा दुर्भाग्य होगा. यहां तक कि वर्तमान में पदस्थापित लगभग सभी जोनल महाप्रबंधकों, जिनमें से वर्तमान में आठ जोनल महाप्रबंधकों के पद खाली हैं, ने भी अन्य सभी अधिकारियों की राय से अपना पूरा इत्तिफाक जाहिर क्या है. एक महाप्रबंधक, जिनकी एसीआर वर्तमान सीआरबी ने कथित तौर पर खराब की है, का तो यहां तक कहना है कि यह बात बिलकुल सही है कि वर्तमान सीआरबी को यदि सेवा-विस्तार दिया जाता है, तो यह वास्तव में भारतीय रेल का बहुत बड़ा दुर्भाग्य होगा, क्योंकि उनकी कार्य-प्रणाली किसी भी रेल अधिकारी या कर्मचारी को पसंद नहीं आई है. उनका यह भी कहना था कि वर्तमान सीआरबी बतौर जीएम और सीआरबी मैनीपुलेशन एवं करप्शन के अलावा अपनी कोई भी छाप रेलकर्मियों और रेल अधिकारियों में छोड़ने में कामयाब नहीं हुए हैं.

ऐसी चर्चा हो रही है कि पूर्व रेलमंत्री सदानंद गौड़ा द्वारा उनके सेवा विस्तार की भेजी गई फाइल सुरेश प्रभु के रेलमंत्री बनने पर पीएमओ से वापस आ गई थी. मगर अब खबर है कि नए रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने भी उनके सेवा विस्तार की सिफारिश कर दी है और यह फाइल सोमवार, 15 दिसंबर को पीएमओ चली गई है. इस विषय में ‘रेलवे समाचार’ ने कई पूर्व महाप्रबंधकों और पूर्व रेलवे बोर्ड सदस्यों से भी उनकी राय मांगी थी. इन सभी अनुभवी पूर्व उच्च रेल अधिकारियों का कहना है कि रेलवे बोर्ड के वर्तमान चेयरमैन की न तो कार्य-प्रणाली सही रही है, और न ही उनकी छवि अच्छी बन पाई है, वह तो राजनीतिक जोड़तोड़ से सभी स्थापित नियमों को धता बताकर सीआरबी बनने में कामयाब हुए थे. उनका यह भी कहना था कि यह शायद पहला अवसर था जब रेलवे में कोई दस-बारह साल पुराना और गलत मामला खोलकर तथा ऐन मौके पर सीआरबी पद हेतु सबसे उपयुक्त अधिकारी के दावे को दरकिनार करके पूर्व सरकार ने अपने फायदे के लिए अरुणेंद्र कुमार को सीआरबी बनाया था, जबकि उनके सीआरबी बनने से रेलवे की ही छवि खराब हुई है.

रेलवे में काम कम, घोषणाएं ज्यादा !

पिछले आठ महीनों में तनिक भी नहीं बदला है रेलवे का अंदरूनी परिदृश्य

सुरेश त्रिपाठी

ऐसा लगता है कि वर्तमान केंद्र सरकार रेलवे में आमूलचूल परिवर्तन करने की बहुत जल्दी में है. यहां हर दिन रेलवे को लेकर कोई न कोई घोषणा की जा रही है. कभी अधिकारियों को निर्देश दिया जा रहा है कि गाड़ियों के ऑपरेशन और समयपालन में कोई कोताही न बरती जाए, कभी कहा जा रहा है कि सबसे पहले लंबित रेल परियोजनाओं को पूरा किया जाएगा, कभी कहा जा रहा है कि लंबित योजनाओं के लिए चार से छह लाख करोड़ रुपए के फंड की आवश्यकता है, कभी कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री की इच्छानुसार रेलवे की सूरत और सीरत को संवारा जाएगा, कभी यह कहा जा रहा है कि रेलवे की खराब हालत को सुधारने के लिए काफी कड़े फैसले लेने होंगे, जो कि कुछ लोगों को पसंद नहीं आ सकते हैं, मगर कैसे, कौन से और किस प्रकार के कड़े फैसले लिए जाएंगे, इस बात का कोई खुलासा पूछने पर भी नहीं किया जा रहा है. आए दिन किसी न किसी रेलवे सुधार संबंधी कमेटी के गठन की घोषणा की जा रही है.

तथापि प्रधानमंत्री अथवा रेलमंत्री द्वारा अब तक यह बयान नहीं दिया गया है कि अब रेलवे में किसी प्रकार का राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं होगा, जबकि उनका यह बयान सबसे पहले आना चाहिए था. इस दरम्यान रेलवे में सौ प्रतिशत विदेशी पूंजी निवेश को भी मंजूरी दे दी गई है. मगर इस सबके बीच रेलवे की आतंरिक हालत सुधारने के बारे में कोई बयान नहीं आ रहा है, और न ही ऐसा कोई प्रयास अब तक होता नजर आया है. जबकि भारतीय रेल की ऐसी भी स्थिति खराब नहीं हुई है, जैसी कि वर्तमान सरकार द्वारा प्रस्तुत की जा रही है.

अब ऐसा भी लगने लगा है कि रेलवे की सर्वाधिक कुटिल और भ्रष्ट अपर नौकरशाही पर आंख बंद करके भरोसा करने की जिस प्रकार की गलती पूर्व रेलमंत्री सदानंद गौड़ा कर रहे थे, और उसका खामियाजा उन्हें रेल मंत्रालय से बाहर होकर भुगतना पड़ा है, ठीक वैसी ही गलतियां यह कुटिल ब्यूरोक्रेसी नए रेलमंत्री सुरेश प्रभु से भी करवाने में जुट गई है. वरना कोई कारण नहीं था कि रेलवे प्लेटफार्मों से खानपान स्टाल हटाए जाने जैसा बचकाना बयान रेलमंत्री से दिलवाया गया होता. इसी के साथ प्लेटफार्मों पर खाद्य वस्तुएं नहीं पकाने का बयान भी रेलमंत्री से दिलवाया गया, जबकि यह प्रक्रिया करीब तीन साल पहले ही बंद हो चुकी है.

तब और ज्यादा हो जाएगा भारतीय रेल का बंटाधार
रेल भवन और दिल्ली सहित पूरी भारतीय रेल में 31 दिसंबर को रिटायर होने जा रहे सीआरबी को सेवा विस्तार (एक्सटेंशन) दिए जाने की बहुत मजबूत चर्चा हो रही है. ऐसी चर्चा हो रही है कि पूर्व रेलमंत्री सदानंद गौड़ा द्वारा उनके सेवा विस्तार की भेजी गई फाइल सुरेश प्रभु के रेलमंत्री बनने पर पीएमओ से वापस आ गई थी. मगर अब खबर है कि सीआरबी ने सुरेश प्रभु को भी अपने आईने में उतार लिया है, जिसके फलस्वरूप सुरेश प्रभु ने भी उनके सेवा विस्तार की सिफारिश कर दी है और यह फाइल सोमवार, 15 दिसंबर को पीएमओ चली गई है.
 
यदि यह खबर सही है और यदि वास्तव में ऐसा होता है, तो भारतीय रेल का और ज्यादा बंटाधार होना सुनिश्चत है. जबकि रेलवे बोर्ड सहित पूरी भारतीय रेल के लगभग सभी अधिकारी सीआरबी को सेवा विस्तार दिए जाने के विरोध में हैं. खबर यह भी है कि सभी लेबर फेडरेशन और दोनों ऑफीसर्स फेडरेशनों ने भी सीआरबी को एक्सटेंशन दिए जाने के खिलाफ रेलमंत्री सुरेश प्रभु से मिलकर अपनी राय व्यक्त की है.
विदेशों में एफडीआई के लिए ‘भीख’ मांगेगी भारतीय रेल -अरुणेंद्र कुमार

रेल भवन, नई दिल्ली में 5 दिसंबर को निजी निवेशकों की बैठक के बाद मीडिया प्रतिनिधियों से बात करते हुए चेयरमैन, रेलवे बोर्ड अरुणेंद्र कुमार ने कहा कि एफडीआई के लिए भारतीय रेल द्वारा विदेशों में ‘रोड शो’ किया जाएगा. यानि उनका मंतव्य यह था कि उन्होंने भारतीय रेल को आज इस हालत में लाकर छोड़ा है कि अब अपनी सेहत सुधारने के लिए विदेशों में फंड जुटाने हेतु भारतीय रेल को विदेशी सड़कों पर उतर कर भीख मांगने जाना पड़ेगा. अरुणेंद्र कुमार ने इसके लिए फिलहाल जर्मनी, सिंगापुर, जापान, फ्रांस, बेल्जियम और दक्षिण कोरिया जैसे अपने प्रिय देशों की एक सूची मीडिया को बताई है. उन्होंने यह भी कहा कि विदेशी निवेश के जरिए भारतीय रेल अपने में दुनिया की सर्वश्रेष्ठ तकनीकों तथा तकनीकी कामकाज का समावेश करना चाहती है. इससे हाई स्पीड ट्रेनों, सेमी हाई स्पीड ट्रेनों के अलावा वर्ल्ड क्लास रेलवे स्टेशनों, रेलवे लाइनों, इंजन और डिब्बों का देश में निर्माण किया जा सकेगा.

रेल भवन, नई दिल्ली में 5 दिसंबर को रेलवे में पीपीपी मॉडल और एफडीआई पर संभावित निवेशकों को रेलमंत्री द्वारा संबोधित किए जाने के बाद खाली पड़ा मंच.

जो अधिकारी रेलवे को बेच रहा है और रेलवे की हर तरह की बरबादी के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार है तथा इसी महीने 31 दिसंबर को रिटायर होने जा रहा है, वह रेलवे की तमाम कोच एवं इंजन बनाने वाली फैक्टरियों में भरपूर क्षमता होने के बावजूद निजी क्षेत्र को सिर्फ इसलिए यात्री कोच बनाने की अनुमति दे देता है, जिससे उसका निजी स्वार्थ पूरा हो सके, जब वह उपरोक्त जैसी बातें कह रहे थे, तब रेलवे के तमाम अधिकारियों को हंसी आ रही थी. अरुणेंद्र कुमार ने निवेशकों की बैठक को सफल बताया है, मगर जब इस बैठक में किसी भी निवेशक ने रेलवे में निवेश करने का कोई आश्वासन नहीं दिया है, तब यह कथित निवेशक सम्मलेन किस प्रकार से सफल रहा है? यह बताने को वह तैयार नहीं हैं. उन्होंने खुद कहा कि वर्तमान नीतियां विदेशी प्रत्यक्ष निवेश और घरेलू निजी निवेश के लिए बनाई गई हैं, यदि इनमें इन निवेशकों ने रुचि दिखाई अथवा उनके कुछ सुझाव आते हैं, तो इन नीतियों में उनकी मांग या सुझाव के अनुसार आवश्यक बदलाव भी किया जाएगा. इससे निवेशकों की बात सही साबित है कि रेलवे की नीतियों में स्पष्टता का भारी आभाव है.

एफडीआई और निजी घरेलू निवेश से ही सुधरेगी रेलवे की आर्थिक स्थिति -सुरेश प्रभु

निजी निवेशकों के लिए सरकार रेलवे को उपयोगी उद्यम बनाएगी -रेलमंत्री
इंवेस्टर्स फोरम में जुटे 65 कंपनियों के 125 प्रतिनिधि, निवेश का आश्वासन जीरो
रेलमंत्री के संबोधन के बाद खाली हो गया मंच, निवेशकों में दिखी भारी उदासीनता
विदेशों में एफडीआई के लिए रोड शो करेगी (भीख मांगेगी) भारतीय रेल -अरुणेंद्र कुमार

रेल मंत्रालय ने 5 दिसंबर को रेल भवन में रेलवे में निवेश के संभावित निवेशकों की एक बैठक का आयोजन किया. इस बैठक का उदघाटन रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने किया. मगर निवेशकों का मानना है कि यह बैठक पूरी तरह से बेमतलब साबित हुई है, क्योंकि रेलवे बोर्ड ने इसके लिए समुचित तैयारी नहीं की थी. इसके परिणामस्वरूप वह इस बैठक के जरिए निवेशकों में कोई उत्साह नहीं पैदा कर पाया है. बैठक के दौरान एक समय ऐसा भी देखने को मिला, जब रेलमंत्री के संबोधन के बाद पूरा मंच खाली हो गया. इससे निवेशकों में भारी उदासीनता का वातावरण दिखाई दिया. जबकि रेलवे को बरबाद करने वाले वर्तमान सीआरबी ने बैठक के बाद इसे सफल बताने की असफल कोई की.

रेल भवन, नई दिल्ली में 5 दिसंबर को रेलवे में पीपीपी मॉडल और एफडीआई पर संभावित निवेशकों की बैठक को संबोधित करते हुए रेलमंत्री सुरेश प्रभु. मंच पर बैठे हैं रेलवे बोर्ड के वर्तमान सभी उच्च अधिकारी

रेलवे में संभावित निवेशकों की इस महत्वपूर्ण बैठक में 65 देशी-विदेशी कंपनियों के कुल 125 प्रतिनिधि शामिल हुए. इनमें आईडीएफसी, गैमन इंडिया, एनएमडीसी, जीएमआर हाइवेज, अडानी, सीमेंस, एचएसबीसी, टाटा इन्फ्रा और रिलायंस जैसी कंपनियां शामिल थीं. उनके सामने रेलवे ने कई आकर्षक प्रस्ताव रखे, मगर रेलवे की नीतियों में स्पष्टता का आभाव यहां भी देखने को मिला. ज्यादातर निवेशकों ने रेलवे की नीतियों में सरलता न होने, निर्णयों, मंजूरियों तथा भूमि अधिग्रहण में होने वाले भारी विलम्ब जैसे मुद्दों पर रेलमंत्री का ध्यान भी आकर्षित किया. निवेशकों द्वारा विभिन्न रेल परियोजनाओं से सम्बंधित समझौतों की कई शर्तों पर भी आपत्ति जताई गई है.

चार सांसदों से शिकायत लेकर हटाया गया ए. पी. सिंह को..

डीआरएम, बिलासपुर के पद से ए. पी. सिंह को हटाए जाने के मामले में नया खुलासा हुआ है. बिलासपुर मंडल के कुछ कर्मचारियों और एक सांसद के बीच हुई बातचीत की ऑडियो रिकॉर्डिंग से भी इसका पता चलता है. जबकि कुछ वरिष्ठ अधिकारियों की एक अन्य रिकार्डेड बातचीत से पता चला कि दो सांसदों से सीआरबी ने और दो सांसदों से जीएम/द.पू.म.रे. ने ए. पी. सिंह के खिलाफ फर्जी शिकायतें लिखवाई थीं, उन्हीं को आधार बनाकर श्री सिंह को बिलासपुर से हटाया गया है. यह भी पता चला है कि इस सब मामले में द.पू.म.रे. के एक वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारी ने सीआरबी और जीएम के बीच समन्वय के महती कार्य को अंजाम दिया है.

सुरेश त्रिपाठी

दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे का बिलासपुर मंडल न सिर्फ सबसे ज्यादा माल लोडिंग के लिहाज से, बल्कि रेलवे और कुछ अधिकारियों की अवैध कमाई के लिए भी भारतीय रेल का बहुत महत्वपूर्ण मंडल है. परंतु यहां करीब पंद्रह महीने पहले दैव-योग से बतौर मंडल रेल प्रबंधक ए. पी. सिंह उर्फ अजय कुमार सिंह की नियुक्ति हो जाने से रेलवे बोर्ड सहित द.पू.म.रे. के कई अधिकारियों की इस अवैध कमाई पर भारी अंकुश लग गया था, जिससे ए. पी. सिंह लगातार उन सभी की नजरों में बहुत बुरी तरह से खटक रहे थे. उनके रहते इन अधिकारियों सहित कुछ स्थानीय कॉर्पोरेट घरानों और बड़े इंजीनियरिंग ठेकेदारों के निहितस्वार्थ पूरे नहीं हो पा रहे थे. इसीलिए उन्हें एक साजिश के तहत आनन-फानन में हटाकर संभलपुर मंडल, पूर्व तट रेलवे के मंडल रेल प्रबंधक पद पर शिफ्ट कर दिया गया और वहां के मंडल रेल प्रबंधक रहे देवराज पंडा को बिलासपुर में लाकर बैठा दिया गया है.

विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार यह साजिश 2 दिसंबर को पूर्व जीएम/द.पू.म.रे. और वर्तमान चेयरमैन, रेलवे बोर्ड के बेटे की शादी के दिन दिल्ली में रची गई थी. सूत्रों का कहना है कि सीआरबी के बेटे की इस शादी में बिलासपुर और उसके आसपास स्थित तमाम हैवीवेट कॉर्पोरेट घरानों के मालिकों और कुछ बड़े इंजीनियरिंग ठेकेदारों तथा द.पू.म.रे. के मुख्यालय परिचालन विभाग एवं इसके अन्य सभी बड़े अधिकारी पूरी तैयारी तथा भारी-भरकम गिफ्टों के साथ शामिल हुए थे. बताते हैं कि वहीं पर इन सबने ए. पी. सिंह की शिकायत की थी कि उनकी वजह से उन सबका सारा काम अटक गया है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार हाल ही में अनूपपुर के पास स्थापित हो रही एक बड़ी कंपनी को अनूपपुर गुड्स यार्ड से कोयले की लोडिंग-अनलोडिंग करने की अनुमति द.पू.म.रे. के परिचालन विभाग द्वारा अपने तौर पर सीधे दे दी गई थी. पता चला है कि स्थानीय लोगों से इस बारे में जानकारी मिलने पर अनूपपुर गुड्स यार्ड से कोयले की लोडिंग-अनलोडिंग को जिला कलेक्टर नंद कुमार ने यह कहकर रुकवा दिया कि इससे शहर में भारी प्रदूषण होने का खतरा पैदा हो गया है और उनसे शहरवासियों ने शहर में प्रदूषण बढ़ने की शिकायत की है. जबकि पता चला है कि सीनियर डीओएम/बिलासपुर एवं बतौर डीआरएम ए. पी. सिंह ने अनूपपुर गुड्स यार्ड में परिचालन सम्बंधी आ रही कुछ बड़ी अड़चनों के चलते मंडल स्तर पर कंपनी को यह अनुमति प्रदान नहीं की थी.

यात्रियों की अपेक्षाएं पूरा करना रेलवे की जिम्मेदारी है -मनोज सिन्हा, रेल राज्यमंत्री

रेलवे का निजीकरण नहीं होने जा रहा है -मनोज सिन्हा का खंडन
रेलवे में बड़े पैमाने पर निजी एवं विदेशी पूंजी निवेश की जरुरत है
भारतीय रेल का सम्पूर्ण विकास भारत सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता
रेल राज्यमंत्री ने मंडुवाडीह-जबलपुर साप्ताहिक एक्सप्रेस को दिखाई हरी झंडी

वाराणसी : वर्तमान परिवेश में रेल यात्री कम समय में ज्यादा लंबी यात्रा करना चाहते हैं, रेल यात्रियों को रेलवे से बहुत सारी अपेक्षाएं होती हैं, जिन्हें पूरा करना रेलवे की जिम्मेदारी है. यह कहना है रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा का. वह यहां शनिवार, 6 दिसंबर को 15117/15118 मंडुवाडीह - जबलपुर साप्ताहिक एक्सप्रेस के उदघाटन अवसर पर रेल अधिकारियों और कर्मचारियों सहित बड़ी संख्या में उपस्थित स्थानीय लोगों को संबोधित कर रहे थे. इस अवसर पर उन्होंने यह भी कहा कि रेलयात्रियों को अधिक से अधिक सुविधा प्रदान करने और रेलवे को आधुनिक सुविधाओं से युक्त करने के लिए विदेशी पूंजी के साथ ही निजी घरेलू पूंजी निवेश की बड़ी आवश्यकता है. रेल राज्यमंत्री ने इस बात का पुरजोर खंडन किया कि रेलवे का निजीकरण होने जा रहा है.

आउटस्टैंडिंग डीआरएम/बिलासपुर अजय प्रताप सिंह का अचानक और अकारण ट्रांसफर

ट्रैफिक अधिकारियों ने कहा, कहां खो गई है मेंबर ट्रैफिक की मर्दानगी?
दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे के महाप्रबंधक नवीन टंडन हैं या अरुणेन्द्र कुमार?
मेंबर ट्रैफिक के खिलाफ तमाम ट्रैफिक एवं अन्य अधिकारियों में भारी रोष

बहुत पहले से ही जिस बात की आशंका थी, आखिर वही हुआ. शुक्रवार, 5 दिसंबर को मंडल रेल प्रबंधक, बिलासपुर अजय प्रताप सिंह उर्फ ए. पी. सिंह का अचानक संभलपुर मंडल में ट्रांसफर कर दिया गया. उनकी जगह संभलपुर मंडल के मंडल रेल प्रबंधक देवराज पंडा को आनन-फानन, वह भी अजय प्रताप सिंह की अनुपस्थिति, में बिलासपुर में ज्वाइन भी करा दिया गया. रेल प्रशासन के इस घटिया रवैए पर महाप्रबंधक नवीन टंडन और खासतौर पर मेंबर ट्रैफिक, रेलवे बोर्ड देवी प्रसाद पांडेय के प्रति दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे मुख्यालय एवं बिलासपुर मंडल के ट्रैफिक सहित समस्त अधिकारियों में भारी रोष व्याप्त हो गया है. ‘रेलवे समाचार’ से बात करते हुए रेल प्रशासन के इस अमर्यादित निर्णय के खिलाफ लगभग सभी मंडलों के मंडल रेल प्रबंधकों और कई जोनल महाप्रबंधकों ने भी भारी नाखुशी जाहिर की है.

प्राप्त जानकारी के अनुसार अपने पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के तहत मंडल रेल प्रबंधक, बिलासपुर अजय प्रताप सिंह शुक्रवार, 5 दिसंबर को सुबह ही अंबिकापुर सेक्शन के निरीक्षण के लिए निकल गए थे. बताते हैं कि उनके इस कार्यक्रम की जानकारी रेल प्रशासन (महाप्रबंधक) को पहले से ही थी, इसीलिए डीआरएम/संभलपुर देवराज पंडा को पहले से ही बिलासपुर बुला लिया गया था. बताते हैं कि अभी अजय प्रताप सिंह अभी अंबिकापुर के रास्ते में ही थे कि उनकी जगह उनकी अनुपस्थिति में देवराज पंडा को बिलासपुर मंडल के मंडल रेल प्रबंधक का चार्ज सौंप दिया गया और उन्होंने तत्काल वहां ज्वाइन भी कर लिया. जानकारों का कहना है कि अजय प्रताप सिंह को उनके ट्रांसफर की जानकारी अंबिकापुर पहुंचने से पहले ही मिल चुकी थी, तथापि वह अपना निर्धारित निरीक्षण करने के बाद ही शाम को वापस बिलासपुर पहुंचे थे.

उल्लेखनीय है कि अजय प्रताप सिंह का अब तक पूरा कैरियर आउट स्टैंडिंग रहा है. बताते हैं कि वह एक स्ट्रेट फॉरवर्ड और बहुत ही स्ट्रांग ट्रैफिक अधिकारी हैं. जबकि देवराज पंडा के बारे में अधिकारियों का कहना है कि वह एक अत्यंत लो-प्रोफाइल ट्रैफिक अधिकारी हैं, और उन्हें सीओएम और जीएम द्वारा जो निर्देश दिया जाएगा, वह उसे सर-माथे पर ले लेंगे. अधिकारियों का कहना है कि बिलासपुर में बतौर मंडल रेल प्रबंधक अजय प्रताप सिंह ने अपने करीब 15 महीनों के कार्यकाल में मंडल की कार्य-क्षमता बनाए रखने के लिए कड़ी मेहनत की है. उन्होंने मंडल की सबसे प्रमुख गतिविधि माल लोडिंग में कोई कमी नहीं आने दी थी. और यदि माल लोडिंग में कहीं कोई थोड़ी-बहुत कमी आई भी थी, तो उसके लिए वह नहीं, बल्कि मुख्य परिचालन प्रबंधक (सीओएम) और मुख्य माल परिवहन प्रबंधक (सीएफटीएम) जिम्मेदार थे. द.पू.म.रे. के कई अन्य अधिकारियों के साथ ही तमाम ट्रैफिक अधिकारियों का यह भी कहना है कि बिलासपुर जैसे अति महत्वपूर्ण मंडल के अत्यंत कार्यक्षम मंडल रेल प्रबंधक का अचानक और अकारण ट्रांसफर किया जाना रेल प्रशासन का एक बहुत ही घटिया और अमर्यादित निर्णय है.

पूर्वोत्तर रेलवे में बढ़ती रेल दुर्घटनाएं, 5 बच्चों की दुखद मृत्यु, 8 घायल

मानवीय भूलों से होने वाली इस तरह की रेल दुर्घटनाओं के बाद कथित बेहतर चिकित्सा एवं अन्य व्यवस्थाएं किए जाने से तब तक कोई स्थाई हल नहीं निकालने वाला है, जब तक कि ऐसी घटनाओं के लिए रेलवे के डीआरएम, जीएम और सीआरबी तक के पदों पर बैठे उच्च रेल अधिकारियों को जिम्मेदार मानकर उन्हें तत्काल निलंबित करके उनके खिलाफ कड़ी दंडात्मक और अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं की जाएगी. रेलमंत्री और रेल राज्यमंत्री को रेलवे को सुधारने की बड़ी-बड़ी घोषणाएं करने से पहले अपने बड़े रेल अधिकारियों के आचरण और अनुशासन को सुधारने पर प्रमुखता से ध्यान लगाना चाहिए.

-संपादक

पूर्वोत्तर रेलवे को लगता है कि कोई पनौती लगी हुई है, क्योंकि इसके कार्य-क्षेत्र में लगातार रेल दुर्घटनाएं हो रही हैं, मगर उन पर प्रशासन कोई नियंत्रण नहीं कर पा रहा है. अब पुनः गुरुवार, 4 दिसंबर को पूर्वोत्तर रेलवे, वाराणसी मंडल के अंतर्गत शाहगंज-मऊ रेल खण्ड के खुरहट-मऊ स्टेशनों के बीच दिन-दहाड़े सुबह लगभग 8.04 बजे मानवरहित लेवल क्रासिंग गेट संख्या-6/सी पर स्कूली बच्चों को ले जा रही टाटा मैजिक गाड़ी नंबर 55135 आजमगढ़-मऊ सवारी गाड़ी से टकरा गई. परिणामस्वरूप 5 बच्चों की दुर्घटना स्थल पर ही दुखद मौत हो गई, जबकि 8 अन्य बच्चे बुरी तरह से घायल हो गए. घायल बच्चों में 1 को प्रकाश हास्पिटल, मऊ, 3 को शारदा नरायण अस्पताल, मऊ तथा 4 को बीएचयू, वाराणसी में भर्ती कराया गया है.


दुर्घटना स्थल पर पहुंचकर रेलमंत्री सुरेश प्रभु और रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा ने गहरी संवेदना व्यक्त की है. उन्होंने मृतकों के परिजनों को मानवीय आधार पर तत्काल अनुग्रह राशि के रूप में दो-दो लाख रुपए, गम्भीर रूप से घायलों को एक-एक लाख रुपए तथा साधारण रूप से घायलों को बीस हजार रुपए तत्काल प्रदान करने की घोषणा की है. प्राप्त जानकारी के अनुसार रेलवे द्वारा नियमानुसार अधिकतम नकद धनराशि जो देय है, उसके अंतर्गत मृतकों के परिजनों को तत्काल 50000 रु. नकद तथा गम्भीर रूप से घायलों को 25000 रु. नकद प्रदान करने तथा शेष अनुग्रह राशि चेक द्वारा देने की व्यवस्था की जा रही है.

‘रेलवे समाचार’ को द.पू.म.रे. के पांच अधिकारियों द्वारा दिया गया कानूनी नोटिस

अखबार की खबर निर्विवाद अदालती कार्यवाही नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य तथ्यों पर आधारित होती है

‘परिपूर्ण रेलवे समाचार’ के 1 से 15 नवंबर 2014 के अंक में ‘द.पू.म.रे. के 5 अधिकारियों को करवाया गया मुफ्त विदेश भ्रमण’ शीर्षक से प्रकाशित खबर पर श्री अवनी भूषण गुप्ता, वरिष्ठ मंडल अभियंता/समन्वय, नागपुर मंडल, द.पू.म.रे., श्री राजेंद्र कुमार अग्रवाल, उपमहाप्रबंधक/ सामान्य, द.पू.म.रे., बिलासपुर, श्री मनीष अवस्थी, वरिष्ठ मंडल अभियंता/सामान्य, बिलासपुर मंडल, द.पू.म.रे., श्री ललित कुमार धुरंधर, उपमुख्य यांत्रिक अभियंता/कोचिंग, द.पू.म.रे., बिलासपुर और श्री अमलान तिर्की, सचिव/महाप्रबंधक, द.पू.म.रे., बिलासपुर ने अपने वकील श्री राजेश कुमार दुबे के माध्यम से ‘परिपूर्ण रेलवे समाचार’ को एक कानूनी नोटिस भेजकर कहा है कि उक्त शीर्षक खबर के प्रकाशन से उनकी मानहानि हुई है. 24 नवंबर को डिस्पैच की गई यह कानूनी नोटिस ‘परिपूर्ण रेलवे समाचार’ को 26 नवंबर को प्राप्त हुई है.

उपरोक्त पांचों अधिकारियों द्वारा भेजी गई इस कानूनी नोटिस का बिंदु वार जवाब और स्पष्टीकरण इस प्रकार है..

1. इसमें कोई शक नहीं है कि उपरोक्त सभी पांचों अधिकारीगण भारतीय रेल के वरिष्ठ पदों पर पदस्थ हैं और समाज के सम्मानित एवं संभ्रांत व्यक्ति हैं. इस बारे में उक्त प्रकाशित खबर में कोई टिप्पणी नहीं की गई है. मगर यह बात संदेहास्पद है कि इनकी रेलवे विभाग में अत्यंत ख्याति और प्रतिष्ठा है, इस बारे में द.पू.म.रे. के सभी अधिकारी और कर्मचारी भलीभांति वाकिफ हैं कि इनकी कैसी ख्याति और प्रतिष्ठा है? उन्हें इस बारे में ‘परिपूर्ण रेलवे समाचार’ को अब और ज्यादा बताने की जरुरत नहीं है.

2. यह कि उपरोक्त पांचों अधिकारियों ने रेलवे विभाग के विभिन्न पदों और स्थानों में तैनात रहकर किस प्रकार से पूर्ण निष्ठा और ईमानदारीपूर्वक अपने दायित्वों अथवा अपने पदीय कर्तव्यों का निर्वाह किया है, यह रेलवे के सभी अधिकारी और कर्मचारी भलीभांति जानते हैं. उनके द्वारा किए गए कार्यों और क्रिया-कलापों के फलस्वरूप आम जन के मन में उनके प्रति अत्यंत सम्मान का भाव होने के कारण उनकी ख्याति किस तरह उत्तरोत्तर बढ़ती रही है, यह भी किसी से छिपा नहीं है.

3. यह सही है कि मैं ‘परिपूर्ण रेलवे समाचार’ का प्रकाशन करता हूँ और मैं इसका मालिक, संपादक, प्रकाशक और मुद्रक हूँ. यह भी सही है कि इसमें मुख्यतः रेलवे से ही सम्बंधित समाचार प्रकशित होते हैं और मैं सर्वसामान्य की अपेक्षा के अनुरूप ही भारतीय संविधान के तहत प्राप्त अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का प्रयोग अपनी मर्यादा में रहकर ही कर रहा हूँ. इसके लिए मुझे उपरोक्त पांचों अधिकारियों से कुछ भी जानने अथवा सीखने की आवश्यकता महसूस नहीं हो रही है.

राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स के 14 कमांडो टीओटी में पकड़े गए

सबको चार्ज किया गया और 25,580 रुपए वसूल किए गए
रेल अधिकारियों द्वारा पूरे मामले को दबाने की भरपूर कोशिश की गई

जम्मू एवं कश्मीर में होने वाले विधानसभा चुनावों के दौरान प्रदेश में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए दिल्ली से भेजे गए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड्स (एनएसजी) के 14 जवानों/कमांडो को ट्रांसफर ऑफ़ टिकट (टीओटी) के मामले में पकड़ा गया है. यह सभी कमांडो दिल्ली से ऊधमपुर जा रहे थे. इन पर टीओटी का शक तब हुआ जब इन्होंने अपना वारंट और पहचान पत्र दिखाने से मना किया कर दिया था. यह मामला 17 नवंबर का है. रेल अधिकारियों द्वारा इस पूरे मामले को दबाने की भरपूर कोशिश गई थी.

टीओटी का टिकट, जो एनएसजी जवानों से बरामद किया गया

अत्यंत विश्वसनीय सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार गाड़ी नंबर 12445, उत्तर संपर्क क्रांति एक्स. से नई दिल्ली से ऊधमपुर के लिए 3-एसी कोच नंबर बी-1 में बर्थ नंबर 22 और 25 से 30 तथा 33 से 38 पर और एक प्रतीक्षा सूची यात्री सहित कुल 14 यात्रियों को जब रात करीब 3.45 बजे कोच कंडक्टर ने चेक किया, तो उन्होंने पुलिस अथॉरिटी नंबर 3866 पर बनी टिकट दिखाई. मगर जब उनसे ओरिजनल वारंट/अथॉरिटी और ओरिजनल पहचान पत्र (आईडी) दिखाने को कहा गया, तो उन्होंने इससे मना कर दिया और पुलिसिया रौब भी दिखाया.

उ.प.रे. सेंट्रल हॉस्पिटल द्वारा रेलकर्मियों को दी जा रही हैं एक्सपायरी डेट मेडिसिन

दवा कंपनियों, दवा दलालों और मेडिकल अधिकारियों का अनैतिक एवं भ्रष्ट गठजोड़
मेडिकल अधिकारियों का समयबद्ध ट्रांसफर सुनिश्चित नहीं किए जाने का दुष्परिणाम

उत्तर पश्चिम रेलवे के जयपुर स्थित केंद्रीय रेलवे अस्पताल (सेंट्रल हॉस्पिटल) द्वारा रेल कर्मचारियों और अधिकारियों को एक्सपायरी डेट वाली दवाईयां दी जा रही हैं. इस बारे में उत्तर पश्चिम रेलवे के कई कर्मचारियों और अधिकारियों द्वारा पिछले कई दिनों से ‘रेलवे समाचार’ को लिखित और मुंहजबानी शिकायतें भेजी गई हैं. कर्मचारियों और अधिकारियों ने अंततः मांग किए जाने पर उन्हें केंद्रीय रेलवे अस्पताल, जयपुर द्वारा दी गई दवाईयों की फोटो भी ‘रेलवे समाचार’ को भेजी हैं. यहां प्रस्तुत फोटो में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है कि इन दवाईयों पर 11/2014 की एक्सपायरी डेट छपी हुई है. इसमें पैकिंग डेट 6/2013 और बैच नंबर 15363 के साथ ‘स्ट्रिक्टली नॉट फॉर सेल’ भी छपा हुआ है.

उत्तर पश्चिम रेलवे के जयपुर स्थित केंद्रीय रेलवे अस्पताल द्वारा एक रेल अधिकारी को दी गई दवाईयां

उत्तर पश्चिम रेलवे मुख्यालय और जयपुर मंडल के कई अधिकारियों एवं कर्मचारियों ने बताया कि ऐसी दवाईयां उन्हें काफी दिनों से दी जा रही हैं. उनका कहना है कि इस बारे में शिकायत करने पर अस्पताल प्रशासन द्वारा कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है. उन्होंने बताया कि वास्तव में रेलवे द्वारा एक्सपायरी डेट की अथवा एक्सपायरी डेट के करीब पहुंच चुकी दवाईयां खरीदी जाती हैं, जिनको खाने से रेल कर्मचारियों को फायदा होने के बजाय नुकसान ज्यादा हो रहा है. उनका यह भी कहना है कि कुछ मेडिकल अधिकारियों की मिलीभगत से दवाईयां सप्लाई करने वाली कंपनियां एक्सपायरी डेट वाली अथवा एक्सपायरी डेट के करीब पहुंच चुकी दवाईयां सप्लाई की जा रही हैं.

मुफ्तखोरी करें अधिकारी, भरपाई करे सरकार !

‘जेतना अंधरऊ बरत जाएं, वोतना पड़वुनू चबात जाएं’
यही है मध्य रेलवे के अकर्मण्य अधिकारियों का रवैया
मध्य रेल की परफोर्मेंस से रेल मंत्रालय ने कई बार अप्रसन्नता भी व्यक्त की है
पानी नाक के ऊपर चले जाने के बाद स्थिति सुधारने हेतु सक्रिय हुए महाप्रबंधक

सुरेश त्रिपाठी

मध्य रेलवे रोजाना चालीस लाख से ज्यादा दैनिक उपनगरीय यात्रियों को उनके गंतव्य तक लाने-लेजाने का विश्व में सबसे जटिल सबर्बन रेल नेटवर्क का संचालन करती है. इतनी बड़ी संख्या में दैनिक यात्रियों को सेवा देने का दबाव दुनिया की किसी भी रेल सर्विस में नहीं है. यह सत्य है, और इसके लिए कुछ काबिल रेल अधिकारी बधाई के पात्र भी हैं. मगर यहां स्थिति यह है कि ‘जेतना अंधरऊ बरत जाएं, वोतना पड़वुनू चबात जाएं’ यानि रेल मंत्रालय (भारत सरकार) जितनी कोशिश स्थिति में सुधार लाने और भरपाई करने की करता जा रहा है, मध्य रेलवे के अकर्मण्य अधिकारी और उनका अकुशल नेतृत्व उसकी इस कोशिश को पलीता लगाता जाता है.


पिछले करीब एक वर्ष के दौरान मध्य रेल की कार्य-प्रणाली और कार्य-निष्पादन के तौर-तरीकों तथा इसके चलते कार्य-कुशलता में आई भारी गिरावट को देखते हुए मध्य रेलवे की परफोर्मेंस से रेल मंत्रालय ने कई बार अप्रसन्नता भी व्यक्त की है. अब स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि न सिर्फ महाप्रबंधक को इसे सुधारने हेतु सक्रिय होना पड़ा है, बल्कि उन्हें रेलवे बोर्ड से इसके लिए 2000 करोड़ रुपए का अतिरिक्त फंड अविलंब जारी किए जाने की गुहार भी लगानी पड़ी है. उनकी इस गुहार के प्रत्युत्तर में रेलवे बोर्ड ने भी कमाई बढ़ाने की हिदायत देते हुए ऊंट के मुंह में जीरे की भांति मात्र 60 करोड़ रुपए की राशि विशेष पैकेज के रूप में मध्य रेलवे को दिए जाने का आश्वासन दिया है.

मध्य रेलवे को अपने उपनगरीय क्षेत्र में 24 कोच के प्लेटफार्म बनाने के लिए करीब 72 करोड़, विद्युतीकरण के लिए लगभग 122 करोड़, डिजिटल एक्सेल काउंटर लगाने के लिए 11 करोड़, लेवल क्रासिंग्स पर रोड ओवर ब्रिज बनाने हेतु 53 करोड़, कुछ उपनगरीय स्टेशनों पर फुट ओवर ब्रिज (एफओबी) बनाने के लिए 15 करोड़, लगभग इतने ही उपनगरीय स्टेशनों पर प्लेटफार्म छत (सीओपी) लगाने के लिए 5.5 करोड़, रोड सेफ्टी, एसएंडटी वर्क एवं स्टाफ की जरूरतों के लिए 130 करोड़ और बंद दरवाजों वाली लोकल गाड़ियों के लिए 600 करोड़ तथा लंबी दूरी की ट्रेनों के हाल्ट बढ़ाने के लिए 58 करोड़ सहित पूरी मध्य रेलवे के लिए 2000 करोड़ रुपए चाहिए. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि मध्य रेलवे ने वर्ष 2012-13 और 2013-14 में प्रतिवर्ष 727 करोड़ रुपए (कुल करीब 1454 करोड़ रुपए) का घाटा होने की बात कही है. यह घाटा सीजन पास में की जाने वाली वृद्धि को वापस लिए जाने सहित कुछ अन्य कारणों से हुआ, ऐसा बताया गया है.

वाह प्रभू... पहले ही दिन से बजा दी सुधार की घंटी..

सुरेश त्रिपाठी

नव-नियुक्त रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने अपना पदभार ग्रहण करने के पहले ही दिन से जिस तरह और जिस तेजी से रेलवे की चीजों को लेना शुरू किया है, उससे न सिर्फ यह कहने का मन कर रहा है कि वाह प्रभू.. आपने तो कमाल कर दिया, आपने पहले ही दिन यह भी संकेत दिया है कि भारतीय रेल अब एक मजबूत इरादों वाले व्यक्ति के हाथों में है और अब इसमें तेजी से सुधार की प्रक्रिया शुरू होने वाली है. श्री प्रभु ने पहले ही दिन यात्री संतुष्टि, रेल परिचालन में संरक्षा की स्थिति और देश की अर्थव्यवस्था के विकास में रेलवे की भूमिका आदि विषयों पर अधिकारियों के साथ चर्चा और समीक्षा भी की. इसके अलावा पहले दिन से ही उन्होंने रेलवे बोर्ड और रेलवे के पीएसयू के प्रमुखों तथा मान्यताप्राप्त रेल संगठनों के प्रतिनिधियों के साथ भी बैठकें करके रेलवे की और उनकी समस्याओं को सुना एवं समझा है. उन्होंने विभिन्न रेल परियोजनाओं पर पूरी पारदर्शिता और कुशलता के साथ अमल किए जाने का निर्देश दिया है.

10 नवंबर को रेल भवन, नई दिल्ली में अपना कार्यभार संभालते हुए नव-नियुक्त रेलमंत्री सुरेश प्रभु

श्री प्रभु ने सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण निर्णय यह लिया है कि अबसे कोई भी टेंडर रेलमंत्री के स्तर पर तय नहीं किया जाएगा, बल्कि इसके अधिकार अब जोनों में जीएम स्तर पर बहाल किए जाएंगे, जिससे न सिर्फ उनको समय से जारी किया जाएगा, बल्कि उनकी जिम्मेदारी भी तय की जा सकेगी. इसके साथ ही श्री प्रभु ने रेलवे बोर्ड के पूर्व मेंबर इंजीनियरिंग और हाल ही में एमडी/दिल्ली मेट्रो से अवकाश ग्रहण किए श्री ई. श्रीधरन को पुनः रेलवे से जोड़ लिया है. उन्होंने श्रीधरन की अक्षुण्य प्रतिभा का इस्तेमाल करने के लिए उनके नेतृत्व में एक सदस्यीय समिति का गठन इस बात के लिए किया है कि जिससे वाणिज्यिक निर्णय लेने में जीएम स्तर पर टेंडरिंग सहित जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व तथा पारदर्शिता की प्रक्रिया को सुनिश्चित किया जा सके, यह सुझाव यह एक सदस्यीय समिति देगी.

सदानंद गौड़ा को आखिरकार ले डूबे अरुणेंद्र कुमार !

गौड़ा ने की थी वर्तमान सीआरबी को छह महीने का एक्सटेंशन देने की सिफारिश
प्रधानमंत्री को लग चुकी थी सीआरबी और गौड़ा के अनैतिक गठजोड़ की भनक
अकर्मण्य और भ्रष्ट अधिकारियों के खिलाफ बिना संज्ञान लिए ही क्या भारतीय रेल में तीव्र सुधार की प्रधानमंत्री की महत्वाकांक्षा पूरी हो जाएगी?

सुरेश त्रिपाठी

केंद्रीय मंत्रिमंडल के विस्तार से करीब 15-20 दिन पहले से ही इस बात के संकेत मिलने लगे थे और रेलवे बोर्ड में भी यह चर्चा खूब गरम रही कि रेलमंत्री पद से डी. वी. सदनाद गौड़ा की छुट्टी होने जा रही है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी जगह किसी और को रेलमंत्री बनाने जा रहे हैं. इसके साथ ही यह भी सर्वविदित रहा है कि वर्तमान चेयरमैन, रेलवे बोर्ड अरुणेंद्र कुमार को प्रधानमंत्री पसंद नहीं करते हैं. हालांकि इसके साथ यह भी चर्चा रही कि प्रधानमंत्री तो सदानंद गौड़ा को काफी हद तक पसंद नहीं करते हैं. यह तमाम अटकलें और चर्चाएं तब फलीभूत हो गईं जब वास्तव में सदानंद गौड़ा को रेल मंत्रालय से हटा दिया गया. रेलवे के तमाम अधिकारियों और राजनीतिक क्षेत्र के कई लोगों का मानना है कि श्री गौड़ा को हटाए जाने का प्रमुख कारण अरुणेंद्र कुमार ही रहे हैं. इसके अलावा श्री गौड़ा की धीमी कार्य-शैली और तेजी से निर्णय नहीं ले पाने की उनकी अक्षमता भी उनके विपरीत रही है. तथापि उन्हें रेलमंत्री पद से मात्र छह महीनों में ही हटा दिए जाने का प्रमुख कारण अरुणेंद्र को ही माना जा रहा है.

रेल भवन में जीएम और डीआरएम की ऐतिहासिक मीटिंग को संबोधित करते हुए पूर्व रेलमंत्री डी. वी. सदानंद गौड़ा.

चूंकि रेलवे में तीव्र सुधार के लिए प्रधानमंत्री की कसौटी पर सदानंद गौड़ा खरे नहीं उतर पाए, रेलवे बोर्ड के कई अधिकारियों का यह मानना भी बहुत हद तक सही है, रेलमंत्री का पदभार संभालने के तुरंत बाद जब श्री गौड़ा ने भारतीय रेल के इतिहास में सर्वथा पहली बार जीएम और डीआरएम की एक साथ बैठक रेल भवन में बुलाई थी, तब ऐसा लगा था कि रेलवे में सुधार की गति में भूचाल आने वाला है. परंतु उनकी यह शुरुआत कुछ ही दिनों बाद कहां फुस्स हो गई, किसी को पता भी नहीं चल पाया. इन छह महीनों में यह भी देखने को मिला कि अन्य रेलमंत्रियों की ही तरह रेलवे की स्थिति में सुधार करने के बजाय श्री गौड़ा का भी पूरा ध्यान अपने संसदीय क्षेत्र बंगलुरु तक ही सीमित होकर रह गया था. उनका हर कार्यक्रम बंगलुरु में ही बैठकर तय हो रहा था. बाकी देश से और वहां की रेल समस्याओं से उनका कोई जुड़ाव नहीं हो पाया था.

मेंबर ट्रैफिक को आखिर क्यों आना पड़ा गोरखपुर?

मंडल परिचालन प्रबंधकों के बीच समन्वय को घोर आभाव
हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी नहीं बढ़ी रेलवे की आय
यात्री गाड़ियों की गति नहीं बढ़ी, कई-कई दिनों तक अटकी रहती हैं मालगाड़ियां

विजय शंकर श्रीवास्तव, ब्यूरो प्रमुख/एनईआर

‘मेंबर ट्रैफिक को आखिर क्यों आना पड़ा गोरखपुर?’ यह सवाल बड़ा मौजूं है, क्योंकि इसकी चर्चा उसी दिन से पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय, गोरखपुर में हो रही है, जिस दिन मेंबर ट्रैफिक गोरखपुर स्टेशन पर उतरे थे. इसके दो कारण प्रमुखता से चर्चा में हैं, वह यह कि हजारों करोड़ रुपए खर्च करके पूर्वोत्तर रेलवे की प्रमुख मेन लाईनों का दोहरीकरण काफी समय पहले पूरा हो जाने के बावजूद इसका बढ़ी हुई लाइन कैपेसिटी का अपेक्षित उपयोग नहीं हो पा रहा है. और दूसरा यह कि कुछ ऑपरेटिंग अधिकारियों की आपसी खींचतान अथवा टसल के कारण माल गाड़ियों का निकास समय से न हो पाने से रेलवे को अपेक्षित आय नहीं मिल पा रही है. इसके अलावा करीब 25 करोड़ रुपए की लागत से गोरखपुर स्टेशन यार्ड की हाल ही में हुई रि-मॉडलिंग का पूरा लाभ न तो यात्रियों को मिल पा रहा है, और न ही इससे अब तक रेलवे की छवि में कोई सुधार आया है.

पूर्वोत्तर रेलवे मुख्यालय, गोरखपुर में 9 नवंबर को उत्तर रेलवे, पूर्वोत्तर रेलवे और पूर्व मध्य रेलवे के वरिष्ठ ट्रैफिक अधिकारियों के साथ समन्वय/समीक्षा बैठक करते हुए मेंबर ट्रैफिक, रेलवे बोर्ड डी. पी. पांडेय और एडिशनल मेंबर ट्रैफिक ए. के. मैत्रा.

पहचान उजागर न करने की शर्त पर पूर्वोत्तर रेलवे के कुछ अधिकारियों का कहना है कि इस क्षेत्र की तीनों रेलों - उत्तर रेलवे, पूर्व मध्य रेलवे और पूर्वोत्तर रेलवे - के मंडल स्तरीय परिचालन अधिकारियों के बीच आपसी तालमेल की कमी के कारण दोहरीकरण के बावजूद न तो लाइन कैपेसिटी का पूरा उपयोग हो पा रहा है, और न ही यात्री एवं माल गाड़ियों को समय से चलाया जा पा रहा है. इसी कारण रेलवे को इससे अपेक्षित आय भी नहीं मिल पा रही है. उनका कहना है कि स्थिति यह है कि लखनऊ के दोनों मंडलों, इज्जतनगर, वाराणसी और समस्तीपुर एवं सोनपुर आदि मंडलों से होकर पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे अथवा अन्य किसी दूर-दराज स्थानों को जाने वाली माल गाड़ियां पूर्वोत्तर रेलवे के दायरे में 2-4 दिन से लेकर एकाध हफ्ते तक भी अटकी रहती हैं, जिससे माल ढुलाई में देरी हो रही है और पार्टियों का माल भी निर्धारित समय से उनके गंतव्य स्थान पर नहीं पहुंच पा रहा है.

बिना किसी योग्यता के बनाए जा रहे इंजीनियर, भा. रे. का भगवान ही मालिक है..

अंधा बांटे रेवड़ी, पुनि-पुनि अपनो को दे. अंधेर नगरी, चौपट राजा, टका सेर जेई, टका सेर एसएसई

रेलवे बोर्ड (रेल मंत्रालय) के पत्र संख्या पीसी-3/2013/सीआरसी/4, आरबीई संख्या 102/2013, दि. 8.10.2013 के आदेश के तहत वर्तमान में इंजीनियरिंग कैडर के एनेक्सचर-सी में अंकित तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को रिस्ट्रक्चरिंग के तहत पदोन्नति दी जा रही है. इस आदेश में अत्यंत त्रुटिपूर्ण व्यवस्था दी गई है, जिससे रेलवे ट्रैक के दिन-प्रतिदिन का रखरखाव (मेंटेनेंस) करवाने वाले पद जैसे रेलवे मिस्त्री / सुपरवाइजर आदि के पद समाप्त हो गए हैं. इसके बजाय अच्छा तो यह होता कि राष्ट्र और रेल हित में तमाम रेल अधिकारी अपने बंगले और अपने बच्चों-रिश्तेदारों और अन्य दूसरे ब्रांच अधिकारी की सेवा में लगाए गए इंजीनियरिग विभाग के सैकड़ों कर्मचारियों के पदों को सरेंडर कर दिया होता. यह महत्पूर्ण पद हैं, जिनका उल्लेख ब्रिटिशकाल से अब तक रेलवे इंजीनियरिंग मैन्युअल के क्रम संख्या 146 और 147 में वर्णित है और साथ ही अग्रिम शुद्धि पत्र संख्या 118, रेलवे बोर्ड पत्र संख्या 2009/सीई/II/सीएस/I, दि..30.07.2010 में लिखित है तथा दैनिक ट्रैक मेंटेनेंस की जिम्मेदारी शुद्धिपत्र के साथ भी बार-बार रेलवे बोर्ड (रेल मंत्रालय) द्वारा भी  पदनाम पर दी गई है.

इन पदों को समाप्त करने वाले अधिकारी भविष्य में इन पदों की कमी के चलते होने वाली घटनाओं या दुर्घटनाओं की जिम्मेदारी नहीं लेंगे. तब तो कहेंगे कि पीडब्ल्यूआई जिम्मेदार है, लेकिन उन्हें इस बात का भी जबाब देने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए कि ट्रैक मेंटेनेंस कौन करेगा? क्योंकि अब तो सभी को सीनियर सेक्शन इंजीनियर बना दिया गया है. यहां वह कहावत एकदम सटीक बैठ रही है कि अंधा बांटे रेवड़ी, पुनि-पुनि अपनो को दे. अंधेर नगरी, चौपट राजा, टका सेर जेई, टका सेर एसएसई. इस तरह के आदेश से भारतीय रेल के इंजीनियरिग डिपार्टमेंट में सभी डिप्लोमा और डिग्रीधारी सिविल इंजीनियर में  घोर असंतोष व्याप्त है. साथ ही सीनियर - जूनियर की गरिमा भी समाप्त हो गई है. सभी लोहार-बढ़ई सीनियर सेक्शन इंजीनियर (एसएसई) बना दिए गए हैं. वह भी बिना किसी तकनीकी डिग्री/डिप्लोमा के ही. जबकि नियमानुसार ऐसे किसी एक पद पर कम से कम अगली पदोन्नति होने से पूर्व तीन सेवा आवश्यक मानी जाती थी, सबको दरकिनार कर दिया गया है. इस तरह की पदोन्नति के हो  रहे फैसले के बारे में किसी जानकारी को प्रशासन द्वारा प्रचारित नहीं किया जाता है. यदि ऐसा होता तो कर्मचारी उसी समय न्यायालय की शरण में चले जाते. वैसे अब वह न्यायालय की शरण में सामूहिक रूप से जा रहे हैं. पूर्व में पी-वे मिस्त्री/सुपरवाइजर के पक्ष में एक फैसला भी हुआ है. तथापि पदोन्नति के मामले में इंजीनियर बिना तकनीकी डिग्री वाले  को बनाने के लिए तो उसके लिए पूर्व से इंजीनियर डिग्री वाले सेलेक्शन पद पर योग्यता को दरकिनार नहीं किया जा सकता है.

इसके साथ ही सभी सीनियर/जूनियर की गरिमा समाप्त हो गई है. स्थिति यह है कि रेलवे में कार्यरत सभी पूर्व लोहार/बढ़ई अब सीनियर सेक्शन इंजीनियर बना दिए गए हैं, जबकि यह सेलेक्शन पद है और इस पद पर रेलवे भर्ती बोर्ड से या डिपार्टमेंटल सेलेक्शन और वरीयता के आधार ही भर्ती की जाती है. यह वैसा ही जैसे बिना आवश्यक मेडिकल डिग्री के ही किसी को डॉक्टर और बिना क़ानूनी डिग्री के किसी को जज बना दिया जाए. रेलवे में भी वैसा ही हो रहा है. यहां बिना तकनीकी डिप्लोमा अथवा इंजीनियरिंग डिग्री लिए ही किसी भी सामान्य मैट्रिक या इंटरमीडियट पास अधीनस्थ और गैर-तकनीकी कर्मचारी को बैक डेट से पदोन्नति देते हुए एसएसई बना दिया गया है. ऐसे में क्या रिजल्ट आएगा, इस बारे में सरकार और न्यायलय को ही अब विचार करना चाहिए. बिना तकनीकी डिग्रीधारी कर्मचारी को तकनीकी पद पर तभी पदोन्नति दी जा सकती है, जब वह एक पद पर कम से काम अगली पदोन्नति होने से पहले 3 साल की सेवा के साथ आवश्यक जेडटीआई ट्रेनिंग कोर्स को पास कर ले. परंतु यहां इस सब आवश्यकता को दरकिनार कर दिया गया है.

सतर्कता संगठन की सतर्कता से प्रतिमाह हो सकती है 25 लाख की बचत

सतर्कता संगठन, पूर्व मध्य रेलवे द्वारा 16वां सतर्कता बुलेटिन निकालने के लिए बधाई. परंतु इसके साथ ही जमीनी स्तर पर सभी नियमों का पालन सुनिश्चित भी करना होगा. मगर यह कब होगा, क्योंकि तीन साल से ज्यादा समय से एक ही जगह/पद पर पदस्थापित अधिकारियों और निरीक्षकों का स्थानांतरण न होने अथवा न किए जाने और स्थानांतरण आदेश हो जाने के बाद भी स्पेयर नहीं किए जाने से तो कोई प्रशासनिक सुधार होने वाला नहीं है. सतर्कता संगठन में नियुक्ति पर किसे लेना है, यह निर्णय खुद सतर्कता संगठन का होना चाहिए, न कि किसी अन्य अधिकारी का. फील्ड में काम करने वाले अधिकारी नहीं चाहते हैं, यह आधार किसी सफल कर्मचारी को नहीं लिए जाने के लिए नहीं बनाया जाना चाहिए. क्योंकि ऐसे में सतर्कता संगठन की कोई हैसियत नहीं रह जाएगी.

प्रशासन आखिर इतना कमजोर क्यों हो जाता है? यह सब रेल हित में पूर्व मध्य रेलवे में बंद होना चाहिए. प्रशासनिक हित में स्थानीय अधिकारियों का पूर्व मध्य रेलवे से बाहर स्थानांतरण किया जाना चाहिए ताकि जातिगत ग्रुपिज्म के तहत अन्य जाति के लोगों को मानसिक प्रतारणा से मुक्ति मिल सके. महाप्रबंधक और अन्य पुरस्कार प्राप्त करने का भी जातिगत जुगाड़ या शिष्टाचार के तहत ठेकेदार को कितनी मदद कर सकते हैं, यह आधार होता है. जबकि यहां स्थिति यह है कि सत्यमेव जयते की बात करने वाले को ही दंड सहना पड़ता है. सत्य है कि अगर उच्च पद पर बिहार से बाहर प्रदेशों के कुछ न्यायप्रिय अधिकारियों की पदस्थापना नहीं होती, तो कुछ सामंती मानसिकता के अधिकारी इस रेलवे का नामोनिशान मिटा कर केवल अपनी जाति और सेवकों के नाम कर देते.

यहां टेंडर भी एडवांस में कर दिया जाता है, जबकि कार्य दो से पांच वर्ष बाद होना है. यही नहीं, अपने लोगों के फायदे के लिए सिंगल टेंडर, लिमिटेड टेंडर, अधिकतम दर पर वर्क, इमरजेंसी दिखाकर और इसके साथ ही मार्केट रेट भी अधिकतर फर्जी लगाया जाता है. टेंडर दिया जाता है जबकि वास्तविकता में ओपेन टेंडर और पुनः ओपेन टेंडर के लिए पर्याप्त समय होता है. तमाम मेटेरियल सरप्लस पड़ा हुआ है, मिटटी का कार्य प्रारम्भ होना है या हुआ है. स्थानांतरण नहीं हो, इसके लिए 10 साल से भी अधिक समय से कार्य निरीक्षक / रेलपथ निरीक्षक/निर्माण जबरन भंडार रखे हुए हैं, जबकि उस भंडार का रेलवे को कोई फायदा नहीं है.

टिकट आरक्षण से इतर कार्यों के खिलाफ रेल आरक्षण कर्मियों का विरोध

इंटरनेट के माध्यम से बढ़ रही रेल टिकट बुकिंग का असर रेल आरक्षण केंद्रों (पीआरएस - पब्लिक रिजर्वेशन सिस्टम) के कार्यरत आरक्षण-कम-पूछताछ क्लर्कों (ईसीआरसी) पर दिखाई देने लगा है, क्योंकि रेल प्रशासन द्वारा उन्हें अब पब्लिक एनाउंसमेंट्स, फेस-टू-फेस जनरल इन्क्वारी, प्रोटोकॉल ड्यूटी, कोचों और प्लेटफॉर्म्स पर आरक्षण चार्ट लगाने, कोच गाइडेंस की डाटा फीडिंग, जीएम/सीसीएम को दैनिक अपडेट देने, रिटायरिंग रूम्स का एलाटमेंट और कोच नंबरिंग जैसे ईसीआरसी से इतर कार्यों पर जबरदस्ती लगाया जा रहा है. पश्चिम रेलवे, मुंबई सेंट्रल डिवीजन ने इस बारे में बकायदे 28 अगस्त 2014 को एक पत्र (संख्या सी-549/16/5 जनरल एंड मिस्लेनिअस) जारी किया है. इसके खिलाफ 13 नवंबर को पश्चिम रेलवे के समस्त ईसीआरसी स्टाफ ने काला फीता बांधकर अपना विरोध जताते हुए पूरा दिन काम किया.

पश्चिम रेलवे मुंबई मंडल के एक आरक्षण केंद्र में काला फीता बांधकर अपनी ड्यूटी करते आरक्षण कर्मचारी.

रेल प्रशासन की इस नई व्यवस्था की खिलाफत न सिर्फ पश्चिम रेलवे का समस्त ईसीआरसी स्टाफ कर रहा है, बल्कि उनके साथ पश्चिम रेलवे के दोनों मान्यताप्राप्त संगठन, वेस्टर्न रेलवे मजदूर संघ (डब्ल्यूआरएमएस) एवं वेस्टर्न रेलवे एम्प्लाइज यूनियन (डब्ल्यूआरईयू), भी कर रहे हैं. उनका कहना है कि रेल प्रशासन अपनी मनमानी करने पर अड़ा हुआ है. इस संबंध में संपर्क किए जाने पर डब्ल्यूआरएमएस के महामंत्री जे. जी. माहुरकर और मुंबई मंडल के मंडल सचिव अजय सिंह ने ‘रेलवे समाचार’ को बताया कि इस समस्या पर उन्होंने प्रशासन को कई पत्र लिखे हैं और डीआरएम से कई बार उनकी बैठक हो चुकी है, हर बार उनका यही आश्वासन होता है कि समस्या का समाधान किया जा रहा है. श्री सिंह ने यह भी कहा कि प्रशासन की यह मनमानी वह किसी भी तरह चलने नहीं देंगे, यदि जरुरत पड़ी तो वह इसके लिए किसी भी हद तक जाकर प्रशासन का विरोध करेंगे.

उधर डब्ल्यूआरईयू के विवेक गुप्ते और आर. के. गुप्ता का कहना है कि इस मामले में प्रशासन वास्तव में अपनी मनमानी करने पर तुला हुआ है. उन्होंने बताया कि आज भी मंडल में चल रही पीएनएम मीटिंग में उनका यह एजेंडा है. परंतु प्रशासन कोई पुख्ता और स्थाई हल नहीं निकाल रहा है. श्री गुप्ते ने बताया कि डब्ल्यूआरईयू और एआईआरएफ ने भी रेल प्रशासन को इस बारे में कई पत्र लिखे हैं. परंतु प्रशासन की लापरवाही के चलते आज मुंबई मंडल के सभी आरक्षण कर्मियों को प्रशासन के खिलाफ काला फीता लगाकर अपना विरोध जताने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

आरओबी/आरयूबी के लिए रेलवे की मंजूरी की जरुरत नहीं होगी

अब नई राष्ट्रीय राजमार्ग परियोजनाओं के साथ-साथ रेलवे क्रासिंग्स पर रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) और रोड अंडर ब्रिज (आरयूबी) का निर्माण किया जाएगा, जिसका पूरा खर्च भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा उठाया जाएगा, जबकि अब तक दोनों मंत्रालयों द्वारा इनका आधा-आधा खर्च उठाया जाता था. इन पुलों के निर्माण के लिए अब रेलवे से मंजूरी लेने की भी पाबंदी नहीं होगी. इस संबंध में सोमवार, 10 नवंबर को ही रेलमंत्री का पदभार संभालने के तुरंत बाद रेलमंत्री सुरेश प्रभु और भूतल परिवहन एवं जहाजरानी मंत्री नितिन गड़करी की उपस्थिति में दोनों मंत्रालयों के बीच सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए गए हैं. इस सहमति पत्र के अनुसार इस योजना के तहत एक पोर्टल शुरू किया जाएगा, जिसमें रेलवे रोड ओवर एवं अंडर ब्रिज के ड्राइंग/डिजाइन उपलब्ध रहेंगे. इसका सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि जो काम दो-ढ़ाई साल में शुरू हो पाता था, वह मात्र दो-ढ़ाई महीने में शुरू हो सकेगा.

रेल मंत्रालय और भूतल परिवहन एवं महामार्ग मंत्रालय के बीच रेलवे लाईनों पर रोड ओवर ब्रिज और रोड अंडर ब्रिज बनाए जाने को लेकर हुए सहमति/समझौते पर हस्ताक्षर के अवसर पर 10 नवंबर को नई दिल्ली में दोनों मंत्रालयों के अधिकारियों को संबोधित करते हुए नव-नियुक्त रेलमंत्री सुरेश प्रभु. उनके साथ हैं भूतल परिवहन, जहाजरानी एवं महामार्ग मंत्री नितिन गड़करी और रेल राज्यमंत्री मनोज कुमार सिन्हा.

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