प्रिंसिपल सीसीएम/एनईआर ने निरस्त की चार फर्मों की बोतल बंद पानी आपूर्ति

    मांगी गई पांच-पांच लाख की ‘दस्तूरी’ देने से इंकार करने पर निरस्ती का आरोप

    आदतन भ्रष्टाचार और कदाचार में सिरे तक डूबे हैं वर्तमान पीसीसीएम/एनईआर

    पीसीसीएम ने बनाया हुआ है रेल राज्यमंत्री का संरक्षण प्राप्त होने का प्रभामंडल

    विजय शंकर, ब्यूरो प्रमुख

    गोरखपुर : पूर्वोत्तर रेलवे में पैदाइशी जमे आलोक सिंह ने 14 फरवरी 2019 को पुनः प्रिंसिपल सीसीएम का पदभार ग्रहण किया है. इससे पहले वह इस पद पर 13 अक्टूबर 2017 से 24 जनवरी 2018 (करीब साढ़े तीन महीने) तक रह चुके थे. इस दरम्यान उन्हें यहीं प्रिंसिपल सीओएम बना दिया गया था. उल्लेखनीय है कि पीसीसीएम/पूर्वोत्तर रेलवे का पद उनके लिए लगभग छह महीनों से भी ज्यादा समय तक खाली रखा गया था. इसी पद पर वह डीआरएम/लखनऊ का कार्यकाल पूरा करने के बाद आए थे. बताते हैं कि प्रिंसिपल सीसीएम का पदभार ग्रहण करते ही उन्होंने अपनी सर्वज्ञात कदाचारी आदत के अनुरूप पूर्व पीसीसीएम द्वारा लिए गए निर्णयों और आपूर्ति संबंधी दी गई विभिन्न अनुमतियों का पुनरावलोकन करना शुरू किया. इसी में उन्हें पूर्व पीसीसीएम द्वारा पांच फर्मों को बोतल बंद पीने के पानी (पीडीडब्ल्यू) की आपूर्ति संबंधी 8 फरवरी 2019 को दी गई अनुमति के दर्शन हो गए और उनकी आंखें एकदम से चमक उठीं.

    विश्वसनीय विभागीय सूत्रों से ‘रेल समाचार’ को प्राप्त जानकारी के अनुसार पीसीसीएम आलोक कुमार ने सबसे पहले अपने एक खास वाणिज्य निरीक्षक के माध्यम से उक्त पांचो फर्मों को मीटिंग के लिए बुलाया और इधर-उधर की कुछ ऊलजलूल बातें करने के बाद उन्हें संबंधित वाणिज्य निरीक्षक से मिलकर जाने को कहा. सूत्रों का कहना है कि उक्त खास वाणिज्य निरीक्षक ने पांचो फर्मों के प्रतिनिधियों को पीसीसीएम का संदेश देते हुए उनसे कहा कि ‘उन्होंने इस अनुमति के लिए पूर्व पीसीसीएम को जितनी रकम बतौर ‘दस्तूरी’ भेंट की थी, उतनी ही रकम वर्तमान पीसीसीएम को भी उन्हें देनी पड़ेगी, अन्यथा उनको दी गई अस्थाई अनुमति रद्द कर दी जाएगी.’ सूत्र का कहना है कि पांचो प्रतिनिधियों ने तत्काल तो नहीं, मगर अगले दिन इनमें से चार लोगों ने दुबारा यह दस्तूरी देने से स्पष्ट मना कर दिया.

    सूत्रों का कहना है कि पूर्व पीसीसीएम ने यह अनुमति प्रत्येक फर्म से पांच-पांच लाख रुपये की ‘दस्तूरी’ वसूल करके प्रदान की थी. बताते हैं कि इसकी जानकारी आलोक सिंह को पीसीसीएम में ज्वाइन करने के तुरंत बाद अपने खास विभागीय विश्वस्तों से पहले ही मिल चुकी थी. इस बात की पुष्टि तीन फर्मों के प्रतिनिधियों ने भी उनका नाम उजागर न करने की शर्त पर की है. चूंकि लंबे समय यहां जमे आलोक सिंह को बखूबी मालूम था कि गर्मी का भीषण सीजन शुरू हो चुका है, अतः उक्त फर्मों द्वारा बोतल बंद पानी की आपूर्ति से इसी एक ही सीजन में मोटी कमाई कर ली जाएगी. यहां यह भी उल्लेखनीय है कि पूर्व पीसीसीएम उक्त पांचो फर्मों को यह अनुमति तीन-तीन साल के लिए एकसाथ प्रदान कर गए हैं, जो कि अमूमन एक या अधिकतम दो साल के लिए प्रदान की जाती है. इसके अलावा वह जीएसटी सहित करीब 2.36 लाख रुपये की ‘नॉन-रिफंडेबल’ सिक्यूरिटी डिपाजिट भी प्रत्येक फर्म से रेलवे के खाते में जमा करा गए हैं, जो कि नियम-विरुद्ध है.

    सूत्रों का कहना है कि वर्तमान पीसीसीएम आलोक सिंह ने उपरोक्त पृष्ठभूमि का पूरा फायदा उठाने की तैयारी के साथ ही पांचो फर्मों को मीटिंग के बहाने बुलाकर अपने खास वाणिज्य निरीक्षक के माध्यम से उन्हें निर्धारित राशि की दस्तूरी पहुंचाने का संदेश दिया था. सूत्र बताते हैं कि फर्मों द्वारा पुनः ‘दस्तूरी’ देने से मना करने के अगले ही दिन उन्होंने चार फर्मों को पूर्व पीसीसीएम द्वारा 8 फरवरी 2019 को तीन-तीन साल के लिए बोतल बंद पानी की आपूर्ति हेतु दिया गया ‘अस्थाई प्राधिकार’ 18 मार्च 2019 को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया. (देखें- पत्र सं.सी/57/सीआर/शार्टलिस्टिंग/पीडीडब्ल्यू/2018).

    निरस्त की गई फर्मों में मेसर्स इरा फ्लोर मिल्स प्रा. लि., गोंडा (ब्रांड - यू. पी. लाइफ), मेसर्स बोहरा सेल्स एंड ट्रेडिंग, लखनऊ (ब्रांड - किंग रॉयल), मेसर्स पान पराग इंडिया लि. कानपुर (ब्रांड - यस) और मेसर्स सुरभि एग्रीको प्रा. लि. वाराणसी (ब्रांड - बेली) शामिल हैं. पीसीसीएम का उक्त पत्र उसी दिन तीनों मंडलों - लखनऊ, वाराणसी और इज्जतनगर - को भेजा गया, जिसके आधार पर तीनों मंडलों ने अगले दिन स्थानीय आदेश निकालकर सभी संबंधित वाणिज्य निरीक्षकों को उक्त चारों ब्रांड के पानी की आपूर्ति तत्काल प्रभाव से बंद कर देने का फरमान जारी कर दिया.

    उपरोक्त पत्र में उक्त निरस्तीकरण के लिए कोई उचित कारण नहीं बताया गया है. पत्र में इसके लिए सिर्फ ‘अपरिहार्य कारणों से’ लिखा गया है. जानकारों का कहना है कि जब भीषण गर्मी का सीजन चल रहा है और जब पानी की ही सबसे ज्यादा मांग होती है, तब ऐसा कोई ‘अपरिहार्य कारण’ नहीं हो सकता है कि ऐसे समय में यात्रियों के लिए सबसे जरूरी पानी की आपूर्ति को निरस्त कर दिया जाए. उनका कहना है कि यह कथित ‘अपरिहार्य कारण’ ही इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि पीसीसीएम की ‘डिमांड’ पूरी नहीं किए जाने के कारण उक्त अनुमति को उन्होंने निरस्त किया है. उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान पीसीसीएम कि अब तक की तमाम कदाचारी गतिविधियों एवं भ्रष्ट हरकतों के मद्देनजर यह कहा जा सकता है कि उनकी ‘इच्छापूर्ति’ न होने के अलावा इसका अन्य कोई भी कारण नहीं हो सकता है. अब पता चला है कि निरस्त की गई उक्त चारों फर्मों ने पीसीसीएम के इस अनुचित आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती देने का निर्णय लिया है. अतः इस मामले में जल्द ही रेलवे को मुंह की खानी पड़ सकती है.

    उल्लेखनीय है कि निजी फर्मों द्वारा बोतल बंद पीने का पानी (पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर) 4 रुपये से 6 रुपये अथवा ज्यादा से ज्यादा 6.50 रुपये प्रति बोतल के हिसाब से आपूर्ति किया जाता है, जो कि प्लेटफार्मों पर स्थित अचल खानपान इकाईयों (स्टालों) और चलती गाड़ियों की पैंट्रीकारों को सीधे उपलब्ध कराया जाता है. चूंकि आईआरसीटीसी द्वारा ‘रेलनीर’ की आपूर्ति लगभग 10.50 रुपये से 11 रुपये प्रति बोतल के हिसाब से स्टालों और पैंट्रीकारों को की जाती है, अतः रेलनीर बेचने में उन्हें कम मुनाफा मिलता है, जबकि निजी फर्मों द्वारा आपूर्ति किया जाने वाला पानी बेचने पर उन्हें प्रति बोतल डेढ़ गुना से भी ज्यादा मुनाफा मिलता है.

    ज्यादातर वेंडर पानी की यह बोतल निर्धारित दर 15 रुपये के बजाय सीधे 20 रुपये में बेचकर 150% से ज्यादा मुनाफा कमाते हैं. इसके अलावा आपूर्तिकर्ता अवैध-अनधिकृत हाकरों को भी सस्ती दरों पर यही गुणवत्ताविहीन पानी बेचते हैं. आरपीएफ/जीआरपी के संरक्षण के चलते इस अंधेरगर्दी को कोई भी पीसीसीएम अब तक नहीं रोक पाया है. बहरहाल, यह स्पष्ट भ्रष्टाचार का मामला होने के बावजूद विजिलेंस सहित सभी जांच एजेंसियां सुशुप्तावस्था में हैं, क्योंकि बताते हैं कि पीसीसीएम आलोक सिंह को एक रेल राज्यमंत्री, जिन्हें खासतौर पर पूर्वोत्तर रेलवे का मंत्री कहा जाता है, का पूरा संरक्षण प्राप्त है!

    इस मामले में ‘रेल समाचार’ ने पूर्व पीसीसीएम से भी उनके मोबाइल पर संपर्क करके उनकी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की और उनसे पूछा कि पीसीसीएम/एनईआर का चार्ज छोड़ने से पहले क्या उन्होंने पांच फर्मों को पांच-पांच लाख रुपये की ‘दस्तूरी’ लेकर तीन साल के लिए बोतल बंद पीने के पानी की आपूर्ति की अनुमति प्रदान की थी? इस सीधे सवाल पर उनका जवाब था कि ‘उन्होंने ऐसा नहीं किया था, बल्कि उन्होंने तो प्रत्येक से लगभग ढ़ाई-ढ़ाई लाख रुपये बतौर सिक्यूरिटी डिपाजिट जमा करवाकर रेलवे का ही फायदा किया है.’ इस पर जब उनसे यह कहा गया कि उन्होंने उक्त सिक्यूरिटी डिपाजिट को ‘नॉन-रिफंडेबल’ कैसे किया, जबकि यह नियम विरुद्ध है? इस पर उनका कहना था कि ‘हो सकता है कि ऐसा ही हो, मगर उन्होंने तो रेलवे के फायदे को ध्यान में रखकर ऐसा किया था. यदि वास्तव में ऐसा नियम नहीं है तो वर्तमान पीसीसीएम को उसे सक्षम प्राधिकार की अनुमति से उसे हटा देना चाहिए.’

    कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि रेलवे में चौतरफा ‘अंधेर नगरी, चौपट राजा’ वाली स्थिति चल रही है और कहीं कोई देखने-सुनने वाला नहीं है. अंततः यदि कोई लुट-पिट रहा है, तो वह है भारतीय रेल का निरीह यात्री, जिसके सामने रेलवे के अतिरिक्त सुदूर यातायात का अन्य कोई विकल्प मौजूद नहीं है. अब देखना यह है कि विजिलेंस और महाप्रबंधक उपरोक्त संपूर्ण कदाचारपूर्ण प्रकरण पर क्या कदम उठाते हैं? क्रमशः - ‘वीपीयू प्रकरण’..!

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